श्रीश्री बगलामुखी सर्वतन्त्रसाधना ज्योतिष

उच्छिष्ट_गणपति_प्रयोग_विधि_एवं_माहात्म्य

#उच्छिष्ट_गणपति_प्रयोग_विधि_एवं_माहात्म्य

#श्री_गुरुगणेभ्यो_नम: ।

आज का विषय अत्यन्त गूढ़ व समस्त सांसारिकों हेतु शुभकर जानते हैं #श्रीगणेश के अन्यस्वरूप #श्रीउच्छिष्ट_गणपति के अद्भुत प्रयोग व विधीवर्णन जो सर्वसुखकर हैं......

सर्वप्रथम वन्दना #श्रीउच्छिष्ट_गणपति का वन्दन करें ।

। वन्दना ।।

उच्छिष्टंघोररूपं सतत भयहरं दीर्घदेहं सुनित्यं ,
घं घं घं घर्घर:स्त्वं अकुलकुलकरं राजतन्त्र:स्वरुपं ।
क्लीं क्लीं क्लीं क्लिष्टघोषं वर वर वरदं देवदेवंप्रधानं ,
उत्पल्लोत्पट्टपट्टंलिखिलिखिलिखितंल्लेखितंहस्तिमंत्रं ।।

अर्थ:— भयंकर विशालदेह स्वरूप धारण कर समस्त भय का निरन्तर हरण करने वाले जो सदा नित्य हैं ।
जो राजकुलहीन सामान्य प्राणी को भी राज्यप्रदान करने में समर्थ हैं । वह जो देवताओं में प्रधान व प्रथम हैं, स्वभक्त के दुर्भाग्य को शब्दमात्र से सौभाग्य रूपी वर प्रदान कर संसार को उसके अधीन (अनुकूल) कर देते हैं ।
जो सदा निर्विघ्न व शांत स्वरूप में स्थित हो भक्तों के पापों व कष्टों का नाश कर कृपा रूपी लेखनी द्वारा भाग्यरूपी पटल पर सुख सौभाग्य मयमन्त्र लिखते हैं । उन परम उदार भगवान् श्रीउच्छिष्ट गणपति की में वन्दना करता हूँ ।

भगवान #श्रीउच्छिष्ट_गणपति एक मात्र एसे देव हैं ।
जो प्रसन्न होने पर भक्त के कर्म एवं कल्पना को भी फलित कर देते हैं, यह देव ! अपने समस्त उपासकों की त्रुटियों को तत्क्षण क्षमा पापों का नाश व विधिहीन पूजन कर्म को भी सार्थकता प्रदान कर देते हैं ।
“सकल ब्रह्माण्ड” में दो उच्छिष्टमुर्ती हैं । एक तो स्वयं
#श्रीउच्छिष्टगणपति एवं द्वितीय #श्रीउच्छिष्टचाण्डालिनी
अर्थात् नवम् महाविद्या #श्रीभगवतीमातंगी” ।

यह जानना आवश्यक हे की #उच्छिष्ट का अर्थ क्या है ।
“उच्छिष्ट” का अर्थ होता है — “शेष बचा हुआ” अन्यरूपों में
(झूठा,अ-ग्रहित,अतिरिक्त,भिन्न,विशेष ) आदि ।

#प्रश्न —भगवान “श्रीगणेश” के स्वरूप का उच्छिष्टगणपति नाम क्यूँ व कैसे हुआ?

#उत्तर— एक बार श्रीगणेश नें कुबेर के अहंकार से क्रुद्ध होकर सहस्त्रों रूप धारण अलकापुरी को अवरुद्ध कर, उसके सम्पूर्ण अन्न, धन, ऐश्वर्य सहित कुबेर की राज्यलक्ष्मी,जयलक्ष्मी,विजयलक्ष्मी आदि का भक्षण कर कुबेर का भी भक्षण कर लिया तदुपरान्त भी क्षुधा शान्त न होने पर श्रीगणेश नक्षत्रमालाओं अन्तरिक्ष सहित पूर्णचराचर ब्रह्माण्ड का भक्षण करने को उद्यत हुए । समस्त देवतागण भयातुर हो प्रजापिताब्रह्मदेव व शेषशायी विष्णु सहित शिवशक्ति की शरण में गए ।
भगवान् श्रीगणेश का स्वरूप अत्यन्त उग्र होने के कारण भयविह्वलित देवगण स्वयं का भक्ष्य बन जाने से भय से समीप न जाकर दूर से हि प्रार्थना करने लगे ।
श्रीकृतयज्ञ_भट्टाऽचार्य के “गणेशोद्दीपन“ के अनुसार “श्री_गणेश”अथर्वशीर्ष” उसी काल में समस्त देवताओं द्वारा की गई स्तुति है ।
तत्पश्चात् भगवान् श्रीगणेश प्रसन्न होकर समस्त देवताओं को भयमुक्त किया । तथा वरदान स्वरूप सम्पूर्ण ऐश्वर्य व राज्यलक्ष्मीयों सहित कुबेर को पुनःमुक्त किया ।
तदुपरान्त #श्रीगणेश नें अपनें सम्पूर्ण स्वरूपों को पुनः स्वयं में समाविष्ट कर लिया तथा । किन्तु श्रीगणेश नें उच्छिष्ट स्वरूप को पृथक् कर लिया जिस उच्छिष्टमुख से देवताओं को वररूप में राज्यलक्ष्मीयुक्त कुबेर को प्रकट किया था । वही स्वरूप उच्छिष्टगणपति के रूप में तीनों लोकों में पूज्य है । भगवान् शिव के अवतार व शिष्य श्रीदुर्वासा ऋषि भी गणपति के परमउपासक थे उन्होंने आग्रह किया कि
हे देव ! आप अपने ईस दिव्यस्वरूप को जो आपने पृथक् किया है । यह सम्पूर्ण ऐश्वर्यप्रद व भक्तों हेतु परम् कल्याणकारी है । आप इसे भक्तों हेतु गुप्त हि रहने देवें अन्यथा आप कृपालु स्वभाव वश महापातकियों का भी सहज हि कल्याण करते रहेंगे । आपका यह रूप मन्त्रमय है । यन्त्रस्वरूप हैं तथा तन्त्रवित् है । कृपया आप मेरे साथ सिद्धलोक पधारें एवं वहीं कुछ कालतक विश्राम करें ।
दुर्वासा के निवेदनयुक्त निमंत्रण पर भगवान् उच्छिष्ट गणपति श्रीदुर्वासा सहित सिद्धलोक की ओर प्रस्थान करते हैं ।
भगवान् दुर्वासा के #कंकोल नामक प्रिय शिष्य हुए । वहि #उच्छिष्टगणपति विद्या के प्रवर्तक हुए ।

प्राचीन काल में महात्मागण मुट्ठीभर अन्न द्वारा सहस्त्रों महात्माओं का भोज सम्पन्न कर दिया करते थे । यह महान् कार्य श्री उच्छिष्ट देव ! की कृपा से हि पूर्ण किया करते थे । वर्तमान काल में भी अनेकों स्थान पर महात्माओं द्वारा किया गया, ईस प्रकार चमत्कारिक वर्णन यदा-कदा सुनने को प्राप्त हो हि जाता है ।
श्रीउ.गणपति ! वृद्धि के मूल कारक हैं स्वभक्तों की अलक्ष्मी,कष्ट,दुर्भाग्य का भक्षण कर ऐश्वर्ययुक्त श्री , सौभाग्य तथा सिद्धियों का वमन करते हैं । उ.गणेश अत्यन्त आनन्दवर्धक व भयहारी हैं ।
देव ! के साधक भक्त को कदापि दारिद्र्यता व्याप्त नहीं होती । #अपह्रता_विद्या भी श्रीउच्छिष्टदेव की हि एक कला है ।
#श्रीउच्छिष्टगणपति हि #चतुरशीतितम_चेटकों के अधिनायक हैं ।
तथा महान् अष्टनायिकाओं का भी प्रतिनिधित्व करते हैं । किंबहुना ! यदि श्रीउच्छिष्टगणपति प्रसन्न हो जाएँ तो देव! की कृपा से ईंद्र्त्व प्राप्ति भी असम्भव नहीं है ।
#उच्छिष्ट_गणपति स्वभक्तों हेतु सदैव तत्पर रहते हैं । राजकीय कार्यों में वरीयता प्राप्ति हेतु श्री उ.गणपति अद्वितीय हैं ।
सभाओं में प्रधानता प्रदान करते हैं ।
निष्क्रिय बुद्धी के समस्त कोषों का भेदन भी श्री उ.गणपति की कृपा से सम्भव हो जाता है । भगवान् #श्रीउच्छिष्ट_गणपति के प्रयोग चतुर्वर्ण के समस्त वर्गों हेतु शुभकर सिद्ध होते हैं । समस्त क्षेत्रों में देव! हि व्याप्त हैं ।
त्रिविधतापों अर्थात्। अधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक का प्रशमन होता है ।
वाक् चतुर्यता का स्फुरण होता है ।
विद्यार्थियों की मेधा,स्मृति वर्धन होता है ।

आध्यात्मिक जगत् व तन्त्रप्रयोगों में श्रीउ.गणपति की अध्यक्षता स्पष्ट प्रतीत होती है ।
किन्तु गुरुकुलों की परम्पराओं के लोप एवं आधुनिकता में समावेश होने के कारण श्रीगणेश के अनन्य अवतारों एवं रहस्यों से अधिकांश विश्व अनभिज्ञ हि रह गया ।

#श्रीउच्छिष्टगणपति के एकमात्र एसे देव हैं जिनकी कोई भी मनुष्य भक्ति,जप,साधना कर सकता है । उ.गणपति अथवा अन्य गणेश से भी दीक्षित न होने पर भी अन्य किसी भी देवता , मत, सम्प्रदाय अथवा गायत्री द्वारा दीक्षित व्यक्ति भी कर सकता है । केवल #दीक्षितमात्र होना हि पर्याप्त है । गुरु आज्ञा लेकर अनुष्ठान, प्रयोग प्रारम्भ करें । यदि आप दीक्षित न हों तो पूर्ण फलप्राप्ति हेतु यह प्रयोग से पूर्व अवश्य दीक्षा ग्रहण करें ।
अतिआपत्ति काल उपस्थित होने पर भी अदीक्षित व्यक्ति प्रयोग न करें, करने पर यह विद्या फलवती नहीं होगी ।
महाकरुणाकर श्रीउ.गणपति भक्तों के अपराधों को तत्क्षण क्षमा कर पुण्योदय करते हैं ।

किसी भी हानि होने का भय न होने के कारण कुछ मन्त्र एवं प्रस्तुत किए जा रहे हैं ।
किन्तु स्वराशि हेतु मन्त्र का मित्र,सम,अरी आदि का विचार अवश्य कर लेवें ।
#श्रीउच्छिष्ट_गणपति देव की कृपा से स्वयं को कृतार्थ कर सकते हैं ।
यह प्रत्येक साधक हेतु सरल व हितकर मार्ग है ।
साधना में समर्पण भावना का सर्वाधिक महत्व होता है ।
“मनसा” , “वाचा” , “कर्मणा” श्रीचरणों में समर्पित करना हि श्रेष्ठ है ।

#विशेष—> #श्रीउच्छिष्ट_गणपति की साधना, प्रयोग, अनुष्ठान उच्छिष्ट मुख से की जाती है । किन्तु भक्षण वर्जित है ।
अन्याऽन्य कामना पूर्ति हेतु पृथक्-पृथक् वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है ।

विधि: — विधि अन्य अनुष्ठान की हि भाँति सामान्य है ।
किन्तु - #दीपदान व #राजोपचार पूजा अनिवार्य है ।

।। ध्यानं ।।

ध्यायेयं रक्तवर्ण:स्फटिकमणिप्रभम् ,
हस्तेस्व दंतांकुशम् ।
पाशंपात्रंश्चमुदकं हसिति गणपतिम् ,
नेत्र: स्त्रयोन्मुत्तमम् ।।

विनियोग: —
ॐ अस्य श्री उच्छिष्टगणपति मन्त्रस्य, कंकोल ऋषि: , विराट् छन्द: , ग्ल: बीजं , अं शक्ति: , श्रीउच्छिष्ट गणपतिर्देवता , श्री उच्छिष्टगणपति पृत्यर्थे जपे विनियोग: ।

न्यास: —
ॐ हस्ति अंगुष्ठाभ्यां नम: । हृदयाय नम: ।
ॐ पिशाचि तर्जनीभ्यां नम: । शिरसे स्वाहा ।
ॐ लिखे मध्यमाभ्यां नम: । शिखाये वषट्‍ ।
ॐ स्वाहा अनामिकाभ्यां नम: । कवचाय हुँ ।
ॐ हस्ति पिशाचि लिखे कनिष्ठकाभ्यां नम: । नैत्रत्रयाय वोषट्‍ ।
ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा । करतलकर पृष्ठाभ्यां नम: । अस्त्राय फट्‍ ।

•१• ॐ हस्ति पिशाचिलिखे स्वाहा ।
•२• ॐ पिशाचिलिखेहस्ति ठ:स्वाहा ।
•३• ऊं ॐ ऊं अं उच्छिष्टगणपते हूं श्रूं फट् ।
•४• ॐ ग्ल: अं गं हस्तिपिशाचिलिखे नम: ।

भेदप्रकारा: - •५• ॐ ग्लां ग्लीं ग्लूं ग्लैं ग्लौं ग्ल: वर वरद हस्तिपिशाचिलिखे ग्ल: ग्लौं ग्लैं ग्लूं ग्लीं ग्लां ॐ ।।

यह षड्विंशक्षरी माला मन्त्र अत्यन्त प्रभावी है ।

अनिवार्य— रुद्राक्ष की माला , रक्तकम्बल आसन , दिवस में पूर्व एवं रात्रि में पश्चिमाऽभिमुख हो जप करें । मोदक का भोग अर्पित करें ।

धन प्राप्ति हेतु — मिश्री व इलायची ।
संकट नाश हेतु — लविंग (लौंग) ।
बुद्धिप्राप्ति हेतु — पान ।
भूमिलाभ हेतु — पुंगीफल (सुपारी) ।
ऋणमुक्ति हेतु —बिल्वपत्र व तुलसीमंजरी ।
विघ्ननाश हेतु — निम्बपत्र ।
सन्तानप्राप्ति हेतु — वंशलोचन ।
व्यापारवृद्धि हेतु — गुढ़ ।

को मुख में रख कर मानसिक जप करें ।

पंचममन्त्र का छःमास तक नाभि पर्यन्त जल में स्थित हो जप करने से ।
वाचा सिद्धि व आगम निगम का ज्ञान प्राप्त होता है ।

साधना अथवा प्रयोग करने से पूर्व अपने गुरुदेव को सुचित कर आज्ञा अवश्य ले लेवें । गुरु के न कहने पर कदापि न करें ।
शान्त मन द्वारा एकाग्रचित्त हो जप करें ।

#श्रीमहागणपति हम सबका कल्याण करे ।

#जयति_ब्रह्मास्त्रविद्या:_____

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