श्रीश्री बगलामुखी सर्वतन्त्रसाधना ज्योतिष

महाविद्या नीलसरस्वती माँतारा


द्वितीय_महाविद्या_महातारिणी_नीलसरस्वती_माँ_तारा....

श्रीगुरुगणेभ्यो_नम: ।

।। अथ ध्यानं ।।

नीलवर्णाम् त्रिनयनां , शवाऽसनसमायुताम् ।
बिभ्रतीं विविधां भूषा , मर्धेन्दु शेखरां वराम् ।।

भावार्थ:— भगवती नीलवर्णा (नीलेरंग वाली ) त्रिनेत्रधारिणी, शवासन पर स्थित, पृथक्-पृथक् स्वरूप धारण कर भक्तों का उद्धार करने वाली, मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण चंद्र को तेज प्रदान सुशोभित करने वाली, वरदायिनी श्री महाविद्यातारा की मैं शरण ग्रहण करता हूँ ।

अकारण करुणा वरुणालया माँ भगवती द्वितीय महाविद्या श्रीनील सरस्वती तारिणी तारा अनन्तशक्ति की स्वामिनी अनेक रूप धारण कर स्वभक्तों को भोग-मोक्ष प्रदान करती हैं । आपके विभिन्न नाम-रूप प्रभाव अनुरूप अवस्थित हैं ।

प्रथम आद्यतारा । #परारूपा (भवतारिणी)

द्वितीय एकजटा । #उग्ररूपा ।
तृतीय #नीलसरस्वती । सत्-रजस्वरूपा ।

एवं अनेक रूपों द्वारा निजभक्तों का करुणामय स्वभाववश पोषण करती हैं ।
वेदों, शास्त्रों, पुराणों, तन्त्रग्रन्थों तथा सम्पूर्ण सनातन ग्रन्थों में माँ आपका प्रभावमय वर्णन निश्चितरुपेण विदित है ।

आप हि
।। ऐं-ह्रीं-क्लीं ।। स्वाहा-स्वधा-वषट् ।। सत्-रज-तम ।।
।। सृजा-स्थिता-लया ।। चित्त-गुण-रूप ।।
।। साध्य-साधक-सूत्र ।।

के रूप में सृष्टि को आदेश मात्र से नियंत्रित करती हैं ।
आपको द्वितीया की संज्ञा दी गई है ।

वधू के समान यशस्विनी त्वरित फलदायिनी होने के कारण आपके बीज को वधू बीज की संज्ञा दी गई ।

( यह गुप्त रहस्य है किन्तु भ्रम उत्पन्न न हो इस कारण इस रहस्य को प्रकाशित किया जाना आवश्यक हो जाता है)

द्वितीया अर्थात् पराशक्ति भगवती श्रीकामकलाकाली का स्वयं शिवकल्याण हेतु विभाजित द्वितीय रूप का धारण ।

प्रश्न —> शिवकल्याण क्यूँ व कैसे ?

उत्तर —> रहस्य होने के कारण इसे गुप्त रखा गया है । इसी कारण अधिकांश जन सामान्य को उपरोक्त विषय का ज्ञान होना कठिन है । गुरुकृपा तन्त्रग्रन्थों के गहन अध्ययन द्वारा हि ईस दुर्लभ रहस्य का ज्ञान सम्भव है ।

समुद्रमन्थन में सर्वप्रथम त्रैलोक्य को प्रभावित करने वाला हलाहल विष उपस्थित हुआ ।
उसके दर्शनमात्र से देव-दानवों हृदय में भय उपस्थित हुआ ।
देव-दानवों नें ब्रह्मा जी का आह्वाहन किया ।
तथा उन्हें विषधारण हेतु आग्रह किया ।
ब्रह्मदेव नें उन्हें भगवान विष्णु की शरण में जाने की प्रेरणा दी, तथा भगवान विष्णु द्वारा उन्हें सविष महादेव-शिव की शरण में जाने को कहा ।
समस्त देवताओं नें आर्तस्वर में महादेव की स्तुति की । महादेव-शिव के प्रकट होने पर वाक्चातुर्य देव-दानवों ने बारंबार स्तुति कर आग्रह किया, की
हे देवाऽधिदेव महादेव ! आप समस्त देवों में श्रेष्ठ तथा हम सब के स्वामी हैं ।
आपके सेवकों पर महान आपत्ति का आविर्भाव हुआक है ।
हे भोलेनाथ ! आप हि हमारी रक्षा करने में समर्थ हैं ।
रक्षा करें रक्षा करें रक्षा करें ।
हमारे द्वारा किए गए समुद्रमन्थन से प्रथम यह वस्तु की प्राप्ति हुई है । जिस पर प्रथम अधिकार केवल आप हि का है ।

सो हे नाथ ! आप इसे ग्रहण कर त्रैलोक्य सहित हमारा कल्याण करें ।
देवताओं के ईस प्रकार के आग्रह किए जाने पर भक्तवत्सल करुणानिधान श्रीमहादेव नें सर्वकल्याण हेतु उस हलाहल विष को सरलता से पान कर कण्ठ में धारण कर
अन्तर्ध्यान हो गए ।

किन्तु — उस महाविष के प्रभाव से भगवान शिव के शरीर में महान क्षोभ उत्पन्न हुआ ।
भगवान शिव के क्षोभहरण करने हेतु स्वयं भगवती परामुर्ती श्रीकामकलाकाली प्रकट हुई । एवं स्वयं महादेवशिव नें शावक का रूप धारण किया । तत्पश्चात् माँ नें भगवानशिव के बालरूप को अमृतमयी स्तनपान कर विष के ताप रूपी क्षोभ का अन्त किया । किन्तु विष के प्रभाव से स्वयं भगवती के देह की कान्ति नीलमणि के समान हो गई । ईसी कारण श्रीभगवती को नीलतारा-नीलसरस्वती भी कहा जाता है ।
श्रीभगवती नें अपने उस स्वरूप को विभक्त कर भगवानशिव को विषप्रभाव से तारण स्वरूप “श्रीभगवती तारा” के रूप में लोक कल्याण हेतु “तारा” नाम दिया ।
भगवानशिव क्षोभ मुक्त होने पर “अक्षोभ्य” कहलाए ।
तथा भगवानशिव का वही स्वरूप भगवती तारा के भैरव
“अक्षोभ्यभैरव” के रूप में स्थित हुए ।
“अक्षोभ्य-शिव “ हि अक्षोभ्य-भैरव हैं ।

भगवती श्री तारा, एकजटा, नीलसरस्वती, के तीनों स्वरूप त्रिगुणात्मक हैं ।
तथा तीनों स्वरूपों के मन्त्र तथा विधी-विधान भी भिन्न हैं ।

दयामयी माता की कृपा से साधक(भक्त) को नियमित होने पर चतुर्वर्ग की प्राप्ति निश्चित हि
मानी गई है । भगवतीतारा के साधकों पर विघ्नों का प्रभाव नहीं होता ।

देवीप्रभाव से साधक को वाक् सिद्धी , काव्यगुण, अद्भुतरचनात्मक क्षमता, आत्मज्ञान, तथा सिद्ध होने पर त्रैलोक्य व त्रिकालज्ञान हस्तामलक के समान सहज हो जाता है ।
भगवती “तारा” के प्रथम उपासक ब्रह्मर्षि-वसिष्ठ हुए उन्होंने चीन जाकर कैलाश-पर्वत के नीकट भगवती तारा की सहस्त्रों वर्षों घोर तपस्या की किन्तु भगवती नें उन्हें दर्शन नहीं दिया ।

तत्पश्चात् श्रीवसिष्ठ नें क्रोध में नियंत्रण न धारण कर पाने पर भगवती तारा को श्राप देने हेतु उद्यत हुए ।

उसी समय भगवती तारा प्रत्यक्ष न होकर आकाशवाणी द्वारा कहा की , हे वत्स ! तुम्हारे श्राप देने पर तुम्हारा सहस्त्रों वर्षों का तपबल समाप्त व निरर्थक हो जाएगा ।
( अनेक विद्वानों में श्रापोद्धार के कारण श्राप विषय में
मतभेद उपस्थित है —यद्यपि कृष्णाऽवतार के पश्चात्
महाविद्या का स्वतः श्रापविमोचन कहा गया है ) ।

सो ! तुम्हारे द्वारा दिए गए श्राप को स्वीकार करने पर मेरा भी लोप हो जाएगा । उसके प्रभाव से समस्त संसार असन्तुलन को प्राप्त कर अनियंत्रित हो जाएगा ।

यद्यपि श्रापिणी शक्ति स्वयं में हि हूँ ! मुझ पर किसी श्राप का प्रभाव नहीं होता ! किन्तु सिद्धपुरुषों के श्राप का पालन मेरे द्वारा पालनयोग्य हो जाता है ।

सो हे पुत्र ! तुम मुझे श्राप न दो, यद्यपि तुम श्राप देने को उद्यत हो हि चुके हो,
सो पुत्र वसिष्ठ ! मेरी शक्तियाँ तुम्हारे हृदय में समाहित हो जाएगी , तुम हि मेरी विद्याओं के प्रथम ऋषि के रूप में महानता को प्राप्त कर अजरत्व व अमरत्व को प्राप्त करोगे । एवं मेरे समस्त बीज से कोटि-युगाक्षर पर्यन्त मन्त्र कीलित न होने पर भी तुम्हारे द्वारा ही उत्कीलित मान्य होंगे ।

हे ब्रह्मनन्दन ! अब सुनो तुम्हारे द्वारा किए गए भयंकर कठोर तप साधना पर भी मेरे दर्शन तुम्हें क्यूँ प्राप्त नहीं हुए ।

क्यूँ की तुम मेरी अयोग्य-विधी द्वारा पूजन-अर्चन कर रहे थे ।

अब तुम सहस्त्र वर्षों तक मेरी चीनाऽचार-प्रयोग विधी द्वारा पूजन-अर्चन कर तप प्रारम्भ करो ।

उसके उपरान्त में तुम्हें दर्शन देकर मनोकामना पूर्ण कर दिव्यब्रह्मज्ञान प्रदान कर तुम्हें देवों द्वारा पूज्य कर दूँगी ।

तुमसे शास्त्रार्थ करने का सामर्थ्य स्वयं बृहस्पति में भी न रह जाएगा । तुम दिव्यता को प्राप्त कर मेरे अत्यन्त प्रिय हो जाओगे ।
तुम्हारा कल्याण हो ।।

ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के उपरान्त जिन महान् साधकों नें भगवती की उपासना की उनमें से मुख्य नामों का वर्णन ।
•१• देवर्षि नारद ।
•२• श्रीराम ।
•३• श्री भार्गवराम परशुराम ।
•४• श्रीकृष्ण ।
•५• हिरण्यकशिपु ।
•६• दशानन रावण ।
•७• श्री हनुमान ।
तथा भगवान् बुद्ध नें भी चीन जाकर भगवती की चीनाऽचार विधि द्वारा साधना सम्पन्न की । एवं अन्य अनेकों सिद्धों द्वारा साधनाबल पर सिद्धत्व की प्राप्ति की गई |
बौद्धतन्त्र में भगवती तारा का प्रधान महत्व है ।

कोई भी साधक भवतारिणी भगवती तारामहाविद्या से दीक्षित होकर स्वयं व अन्यों की सहायता करने योग्य हो पूज्य हो सकता है ।
यह प्राणदायिनी महाविद्या है ।


समस्त बीज तथा मन्त्र स्वयं में अनन्त ऊर्जा धारण किए हुए होते हैं । बीज द्वारा मन्त्र की सृष्टि एवं मन्त्र द्वारा हि देवता का प्राकट्य सम्भव होता है ।

अर्थात् — बीजमन्त्रों व तन्त्रमन्त्रों में भगवान शिव द्वारा अत्यन्त गोपनीयता का विधान निश्चित किया गया है ।
अत: उपरोक्त विधान (शिवाज्ञा) वश मन्त्रों को बोल अथवा लिखकर प्रकट नहीं किया जा सकता ।

मन्त्रों को केवल गुरुमुख दीक्षाविधान द्वारा हि प्राप्त किया जा सकता है ।
इसी कारणवश इस उल्लेख में मन्त्र अथवा विधी का उल्लेख नहीं किया गया है ।

हमारा उद्देश्य केवल के रहस्यात्मक देवीमाहात्म्यवर्णन को भगवती भक्तों साधकों के हितार्थ ज्ञानवर्धन का तुच्छ प्रयास मात्र हि है ।

विशेष: —> पाठकगण से विनम्र अनुरोध है की कोई भी साधना बिना गुरु अनुमति व “दीक्षा” के पुस्तक अथवा व्यक्ति से प्रभावित होकर कदापि न करें |
एसा करने पर निरन्तर अनर्थ की सम्भावना होती है ।

माँ भगवती श्रीतारा हम सबको दुःखादि बन्धनों से मुक्त कर कृपादृष्टि बनाए रखे ||

#जयति_ब्रह्मास्त्रविद्या_

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