श्रीश्री बगलामुखी सर्वतन्त्रसाधना ज्योतिष

श्रीबगलामुखी_रहस्यात्मक_वर्णन

#श्रीबगलामुखी_रहस्यात्मक_वर्णन.......
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||श्रीगुरुगणेभ्यो_नम: ||
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•||• ध्यानं •||•

या माता रविकोटिकोटि-सदृषा-
-स्फुट्याज्जगद्विग्रहाम् ।
हस्तै:र्दीपकपाशमंकुशवराम्
वल्गा:नमस्त्वं वराम् ।।
या विद्या वरदायिनि:स्त्रिनयनाम् ,
पीताम्बरां वन्दिताम् ।
नित्या:श्रीपरमेश्वरींभगवतीम् ,
ब्रह्मास्त्रविद्यांशिवाम् ।।

अर्थ:— हे माता ! आप अपने कोटि-कोटि सूर्यमय आभावान् श्रीविग्रह से सम्पूर्ण जगत् को स्फुटित करती है ।
आपके करकमलों में क्रमशः दीपक, पाश, अंकुश धारण कर वरमुद्रा धारण कर स्वभक्तों को वरदान देने वाली श्रीवल्गाम्बा को करबद्ध नमन करता हूँ ।
हे त्रिनेत्रधारिणी ! विद्याबल प्रदायिनी नित्यवन्दिता परमेश्वरी सदाशिवभामिनी श्रीभगवती पीताम्बरा ब्रह्मास्त्रविद्या माँ बगलामुखी में आपकी शरण ग्रहण करता हूँ ।।
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भगवती श्रीश्रीब्रह्मास्त्रविद्या माँ बगलामुखी (वल्गामुखी) का यह वर्णन अभूतपूर्व सिद्ध होगा एसा विश्वास है ।

सर्वप्रथम बगलामुखी - नाम का अर्थ जानते हैं ।
‘ब’ग’ला’मु’खि’ |

#ब” — बृहत् च बृहती ब्रह्माण्डबद्धा,
ब्रह्मास्त्रविद्या बहुदा:बकारा: ।
बाल्यां न वृद्धा:बलमध्यबाह्य,
ब्रह्मस्वरूपस्थित‘ब’मक्षराया: ।।

#ग” — गर्वस्थितानित्यमुन्मुक्तरुपम् ।
ग्यं ज्ञानतन्त्राश्चमधिष्टगंगाम् ।
गौरांगवर्णा: पटपीतवस्त्राम् ।
गायत्रीपीठस्त्व ‘ग’मक्षरायाम् ।।

#ला” — लाभा:स्त्वलक्ष्यां लिपिपत्रलेखाम् ,
लावण्यरूपस्थितमप्रमेयम् ।
लाकिण्यया:चक्रनिष्ठांलिकाव्याम् ,
लाघ्विंप्रवेशिश्च ‘ला’मक्षरायाम् ।।

#मु” — मुक्तिप्रदां मुक्तिमार्गा:मुनिंद्राम् ,
मूल्या:स्त्वमाल्यांविधिमन्त्रसिद्धिंम् ।
मुख्यां तु सर्वै:विविधानिविद्याम् ,
मुन्मादहंत्रींश्च ‘मु’मक्षरायाम् ।।

#खि” — खिल्याकृता:ऽखिल् नक्षत्रग्रह्याम् ,
खिन्ने:श्चकुर्यन्तिविध्वंससर्व्वम् ।
खिकाराह्लिकारा:श्चहूंकारनादाम् ,
खिलंस्तम्भवर्तिर्न ‘खि’मक्षरायाम् ।।

।। इति ‘ब’ग’ला’मु’खी’ = भाव:ऽक्षरार्थम् ।।

“ब” शब्द व्याख्या |
आप विस्तृत से भी अतिविस्तृत अनादि ब्रह्माण्ड को बाँधे रखने में समर्थ, ‘ब’कार युक्त अनेकरूपमय ब्रह्मास्त्रविद्या न बाल्यत्व तथा वृद्धत्व से मुक्त । बल को मध्य एवं बाह्य से दृढ़ता प्रदान करने वाली तथा ब्रह्म स्वरूप में स्थिति हि माँ बगलामुखी के प्रथम ‘ब’ अक्षर का अर्थ व प्रभाव है ।

“ग” शब्द व्याख्या ।
आप उन्मुक्त स्वशक्ति प्रभाव से गर्वित । अविरल गंगास्वरूप ज्ञानतन्त्र की अधिष्ठात्री गौरवर्णा पीतवस्त्रविभूषिता पापविमोचन पीठस्थिता हि माँ बगलामुखी के द्वितीय ‘ग’ अक्षर का अर्थ व प्रभाव है ।

“ला” शब्द व्याख्या ।
आप हि लेखनी, पत्र, लिपि तथा काव्य की सिद्धि रूपी लक्ष्य हैं । अप्रमेय लावण्य अर्थात् चिरयुवत्व से ओतप्रोत, लाकिणि स्वरूप कुण्डलिनी चक्रस्थिता, उपलब्धि प्रवेशलाभ हि माँ बगलामुखी के तृतीय ‘ला’ अक्षर का अर्थ व प्रभाव है ।

“मु” शब्द व्याख्या ।
आप हि समस्त विद्याओं में मुख्य, विधी, माला, मन्त्र तथा सिद्धियों का मूल्य व मूल, मुनियों की मुक्तिमार्ग तथा मुक्ति प्रदान करने वाली हैं - यहि माँ बगलामुखी के चतुर्थ ‘मु’ अक्षर का अर्थ व प्रभाव है ।

“खी” शब्द व्याख्या ।
आप हि प्रसन्न होने पर ग्रह नक्षत्रों को स्वस्थान पर खीलन (स्थिर) करने वाली, तथा क्रुद्ध होने पर सर्वत्र विध्वंस (विनाश) करने वाली । आकाश, वायु, पृथ्वी,अग्नि,जल सहित ब्रह्माण्ड का स्तंभन हि माँ बगलामुखी के अन्तिम पंचम ‘खी’ अक्षर का अर्थ व प्रभाव है ।

“बगलामुखी” यह शब्द बन्धन करने वाली एवं मुक्त करने वाली । गर्भमय ब्रह्माण्ड का पोषण करने वाली । लावण्यपरिपूर्ण लाभकरी । मुक्तिमार्ग प्रशस्त करने वाली ।
खिन्नतानाशिनी से सदाप्रसन्न रखने वाली भगवती हि माँ बगलामुखी है । जिसकी व्याख्या युगों-युगों तक सम्भव नहीं ।

“बगला” शब्द की व्युत्पत्ति “वल्गा” से अपभ्रंशित होकर हुई है ।
“वल्गा” का अर्थ
“व” — विश्वस्थापिता जलतत्वमयी ।
“अ” — अखण्ड़ अद्वितीय अखिल विश्वभर्त्री ‘अग्निवर्णा’ ।
“ल” — लक्ष्या लयकारिका ‘पृथ्वीतत्विणी’ ।
“ग” — ग्राह्या ग्रहक्षोभिणि वायुतत्वमयी ।
“आ” — आकाशचारिणी आनन्दा अंतरिक्षमयी नभतत्वमयी ।

यह पंचाक्षर पंचतत्वों से परिपूर्ण तथा उन पर स्वामित्व दर्शाते हैं ।

#पीताम्बरा नाम का क्या प्रयोजन ?

“पीताम्बरा” अधिक विस्तार न करते हुए , इसका अर्थ यह समझें की पीताम्बरधारी भगवान श्रीविष्णु के द्वारा पूज्य होने पर इन्हें पीताम्बरा कहा जाता है ।
पीत+अम्बरा अम्बर अर्थात् अंतरिक्ष में सूर्य के पीतप्रकाश का जो पुंज स्थित है , वही श्रीभगवतीवल्गा का आवरण है ।
जो की पीताम्बरा नाम से परिभाषित महाविद्या श्रीवल्गा है ।

अन्यविद्याओं का भजन , जप अथवा पूजन से साधक भक्त के ऊपर किए गए व्यभिचारों शमन होता है ।
किन्तु एकमात्र श्रीभगवती बगलामुखी” के नामोच्चारण मात्र से व्यभिचार व दुष्टशक्तियों का तत्क्षण नाश हो जाता है ।
इसका अनुभव प्रायः भगवती से समस्त भक्तों को नि:संदेह प्राप्त हुआ होगा ।

भक्तों के अनेकाऽनेक अपराधों को क्षमा करने वाली हृदयकमलवसिनी ईष्टेश्वरी माँ बगलामुखी के श्रीचरणों में बारम्बार वन्दन ।

भगवती “वल्गा” तन्त्र व योगक्षेत्र की स्तंभिनी, वश्या, एवं अचलाशक्ति है । यह साधक को च्युत (नीचे गिरने) के भय से सदा मुक्त रखती हैं ।

अधिकांश तथाकथित तांत्रिकों तथा अविद्या से ग्रसित ब्राह्मणों द्वारा भगवती श्रीबगलामुखी की महिमा का भयरूप देकर दुष्प्रचार किया जाता है ।
जिसके परिणाम स्वरूप जनसामान्य कामधेनु स्वरूपा वात्सल्यमूर्ति श्रीबगलाविद्या की कृपा व करुणा से भयवश वंछित हि रह गए ।
यह सत्य है की साधना दुष्कर है ।
किन्तु भक्ति तो अत्यन्त सहज हि है ।
यह भी सूर्य हि की भाँति सत्य है की सदासर्वदा से हि समस्त प्रयत्नों से भक्ति का मार्ग सर्वश्रेष्ठ कहा गया है - भक्ति का कोई परिहार्य नहीं हैं ।
भगवती “श्रीबगला” न केवल साधना सिद्धि प्रदान करती है अपितु भक्ति सायुज्यदात्री है ।
साधक परीक्षार्थी होता है । किन्तु वहीं भक्त निरन्तर उत्तीर्ण हि रहता है ।

तात्पर्य केवल यह है की....
हमें व्यर्थ के भय-सन्देह से मुक्त हो निरन्तर भगवती की भक्ति अवश्य करनी चाहिए ।

|| “न_हि_माता_समुपेक्षते_सुतम्” ||
माता के द्वारा कदापि पुत्र की उपेक्षा सम्भव नहीं ।

जब भक्त यह भाव प्रकट करता है——

यद् क्षरं पदंभृष्टं , मात्राहीनं च यद्भवेत् ।
तत्सर्वं क्षम्यतां माता , प्रसीद् परमेश्वरी ।।

में अज्ञानग्रस्त मात्रा, अक्षर, पद से हीन हूँ ।
हे माता ! हे परमेश्वरी ! मेरे इन दोषों को क्षमा करो मेरी रक्षा करो । यह आग्रहभाव है |

मत्सम:पातकी नास्ति , पापघ्निंत्वत्समानही ।
एवं ज्ञात्वामहादेवीं , यथा: योग्यंस्तथा:कुरु ।।

मेरे समान दूसरा कोई पापी मुझे नहीं दिखता,
किन्तु ,
हे माता ! पापों का नाश करने में भी आपके समान कोई अन्य हो एसा भी सम्भव नहीं , ईसी को कारण समझ कर ,
हे महादेवी ! मुझ दास हेतु जो आपको योग्य प्रतीत हो वही करें । यह परंश्रेष्ठ समर्पण भाव है ।
यहि भाव की स्थिति मन में धारण कर सभी प्राणी भक्ति करें । सत्य मानें की भगवती कृपा से अहित का किंचितमात्र भी स्थान न होगा ।

कुछ धूर्तों नें पाखण्ड की पराकाष्ठा का भी उल्लंघन कर मर्यादाहीन शब्दों को मन्त्ररूप दे दिया है — जो की निन्दनीय व अस्तित्वहीन है जिसका कोई प्रमाण उपस्थित नहीं |

वह तथाकथित मन्त्र नामक (अभद्र शब्द संग्रह ) है ।

ॐ बगला भगवती महाक्रूरी महाकराली राजमुख बंधनम् ग्राम मुख बंधनम् चौरमुख बंधनम् व्याघ्रमुख बंधनम् सर्वमुख बंधनम् वशिकुरु हूँ फट् स्वाहा ||

अर्थात् — हे महाक्रूरी (दयाहीन) महाकराली भयंकर स्वरूप वाली बगलामुखी राजामुख का, गाँवमुख का, चोरमुख का, बाघमुख का, व सभी का क्रोधित होकर मुख बन्धन करो ।

इस प्रकार के महत्वहीन व अप्रभावी शब्दों के समूह को शाबरमन्त्र का नाम देकर उच्चालाप कर होमाऽदि कर्मों में प्रयोग किया जा रहा है । इससे लाभ न होकर हानि हि है ।
अनेक स्थानों पर स्वयं प्रत्यक्षदर्शी हूँ की रक्षात्मक मन्त्रों द्वारा भी आहुतियाँ दे दी जाती है । कुंजिकास्तोत्र आदि की भी आहुतियाँ दि जा रही इसमें भी कोई संदेह नहीं ।
कहा गया है —

|| कुंजिका होम मात्रेण रावण: प्रलयं गत: ||

कुंजिका होम करने के दोषमात्र के परिणाम से रावण का सकुटुम्ब नाश हुआ ।

श्रीबगलामुखी होमकर्म में भी आहुतिमुद्रा दोषयुक्त होति जा रही है ।
देवकर्म में आहुति का मृगमुद्रा का हि विधान प्राप्त है । किन्तु वीराऽसन, वज्राऽसन में बैठ कर मुष्टिका प्रहार जैसी मुद्रा का प्रयोग किया जा रहा है -जो अतिनिन्दनीय व त्याज्य है । इस पापपूर्ण कुकृत्य का भी दुष्परिणाम अवश्य प्राप्त होता हि है ।

किसी भी यज्ञादिक महान् देवकर्म को वेद, शास्त्र, विधी के विरूद्ध सम्पन्न किया जाना “कर्ता” व “होता” दोनों के पुण्यनाश का कारक होता है ।

भगवती श्रीबगलामुखी “श्रीकुल” “कालीकुल” से सम्बंधित तथा “वामाम्नाय” , “दक्षिणाम्नाय” व “ऊर्ध्वाम्नाय” की ‘द्योतिनी’शक्ति है ।

श्रीबगलामुखी “ज्ञानतंत्राऽधिष्ठात्री” , “नादाऽधिष्ठात्री” , “वाक्याऽधिष्ठात्री” अर्थात् स्वामिनी होने के कारण हि देवर्षि श्रीनारद नें कहा की आपके प्रभाव से ।

वादी — मूक हो जाता है ।

रंक— राजा हो जाता है |

वैश्वानर (धनिक) — निर्धन हो जाता है |

क्रोधी — शान्त हो जाता है |

दुर्जन —सज्जन हो जाता है |

गर्वी — गर्वहीन हो जाता है ।

जड़बुद्धी — विद्यापारंगत चैतन्य हो जाता है ।

हे कल्याणकारिणि नित्या श्रीबगलामुखी ! में आपको प्रतिदिन नमस्कार करता हूँ ।

“श्रीकुल” से सम्बंधित “श्रीबगला” स्वभक्तों माता की भाँति पालन , पिता के समान रक्षा , गुरु के अनुरूप पथप्रदर्शन ज्ञान ,
वैद्य के जैसे रोगमुक्ति , ब्रह्मा की भाँति समान सृजनात्मक क्षमता , विष्णु की भाँति मोक्ष, शिव की भाँति ज्ञान निरन्तर प्रदान कर भोग-मोक्ष की स्थापना करती हैं |

“कालीकुल” से समबन्धित होने पर “पापविमोचन”, ‘कष्टभंजन”, “तापत्रयनिवारण”, “ग्रहानुकूलता”, “व्यभिचारिकरक्षा”, “कृत्यानिवारण”, “रिपुतापहरण”, “अरिदलनिवारण”, “राज्यबाधाहरण”, “बन्धनमोक्षण”, तथा सर्वाऽरिष्ट की शान्ति “स्वआभामण्डल” का निर्माण कर सदा हि निजभक्तों की रक्षा करती है |

क्रमशः —
समस्त मातृकाएँ उपविद्याओं में स्थित हो जाति है ।

उपविद्याएँ — विद्याओं में ।

विद्याएँ — उपमहाविद्याओं में ।

उपमहाविद्याएँ — महाविद्याओं में ।

महाविद्याएँ — सिद्धविद्याओं में ।

तथा त्रयसिद्धविद्याएँ अद्वितीय “ब्रह्मास्त्रविद्या” में निवास करती हैं ।
यहि कारण है की “ब्रह्मास्त्रविद्या” एकमात्र श्रीवल्गाम्बा हि हैं ।

भगवती भक्तों व साधकों को सदा हि कृपा प्राप्ति हेतु “हृदयस्तोत्र” का नित्य पाठ करना चाहिए ।

साधनाविधियाँ तो निश्चित हि गुरुगम्य हैं ।
किन्तु कुछ विशेष मन्त्र जो देविभक्तों निर्धारित किए गए उनका वर्णन अवश्य होगा ।

हमें किसी भी “मन्त्र” , “स्तोत्र” , “सूक्त” , “कवच” के अर्थ का ज्ञान होना अत्यावश्यक है ।
बिना अर्थ ज्ञान किए गए जप स्तोत्रादि का पूर्णफल प्राप्त नहीं होता ।
किस मन्त्र का क्या प्रयोजन , गुण अथवा दोष हो सकता है, उसका भी विचार अवश्य कर लेना चाहिए ।

प्रत्येक मन्त्र प्रत्येक व्यक्ति के लिए नहीं होता ।
देवता को अनुकूल करने से पूर्व हमें मन्त्र के अनुकूल हो जाना अनिवार्य है ।

समस्त देवि-देवता के अनेकों मन्त्र विद्यमान होते हैं ।
उसका यहि कारण है की- हम अपने उद्देश्य के अनुसार मन्त्र का चयन करें । मन्त्रबीजयुक्त होने के कारण शक्ति सम्पन्न होता है । मान्त्रिक मन्त्र अनुसार दैव-स्वरूप की कल्पना करता है ।

मेरे व्यक्तिगत अनुभव के कारण अनुरोध है की —
सामान्य स्थिति में — ३६ अक्षरी
|| ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा ||

मन्त्र का जप जप न करें ।
उपरोक्त मन्त्र का प्रभाव यदि उग्र हो जाए अनेक व्याधि एवं कष्टों का आविर्भाव होने लगता है ।

यह मन्त्र यौगिक मार्ग में आने वाले अवरोधों के विनशार्थ देवर्षि_नारद नें प्रकट किया था ।

मन्त्र के अनुसार हि देवता का ध्यान व स्वरूप भी भिन्न हो जाता है । यह साधक की कामना पर निर्भर करता है ।

#महांकाल_संहिता में देवि को चतुर्भुजा कहा गया है ।
जो की यश, कीर्ती, ज्ञान व ऐश्वर्यमय स्वरूप है ।

साधारणसुखी अवस्था में भक्त केवल हृदयस्तोत्र शत्-नाम सहस्त्रनाम अथवा नित्य अर्चन कर शान्तमन्त्रों का जप करें ।

•१• ॐ ह्रीं ऐं क्लीं श्रीं वल्गेसिद्धविद्ये स्वाहा ।

•२• ॐ ऐं ह्रीं क्लीं वल्गेश्रियं स्वाहा ।

•४• ॐ ॐ ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं बगलामुखी अमृतस्त्राविणीं ह्रीं ह्रीं
ह्रीं ॐ ॐ ॐस्वाहा ।

•५• ॐ नमो भगवत्यै पीताम्बरायै ह्रीं ह्रीं सुमुखी बगले विश्वं मे वशं कुरु कुरु स्वाहा ।

•|—••~••><••~••—==“अथवा”==••~••><••~••—|•
ॐ नमो ह्लीं क्रीं पीतकाल्यै ह्रीं क्लीं पीतचामुण्डे ह्रीं ह्रीं महामाये ग्रहनक्षत्रभेदिनिं सिद्धे-विद्ये-वरदे महाघोर घोररावे सिद्धिं देहि श्रियं देहि वरं देहि सर्वकष्टान् भंजय-भंजय हर रोगं हर दारिद्र्यतान् रिपुणाम् घातय मारय स्तंभय द्रावय मोहय शोषय अं कं खं गं रं वं सं लं क्षं ॐ ह्लीं ॐ ह्रीं ॐ क्लीं ॐ श्रीं माम् पोषय-पोषय बगलामुख्यै ॐ ॐ स्वाहा ||

यह १३५ अक्षरी मन्त्र शान्त व उग्र दोनों स्वभाव युक्त है ।
इस मन्त्र की माला कि अपेक्षा २१ या ३१ बार पाठ करें ।
अथवा घृत गुग्गुल से आहुति करें ।

अन्य ४ मन्त्रों का , अमृतसागर में उच्चाऽसनस्थिता शान्तमुद्रा में विराजित समस्तसिद्धियों द्वारा सेवित भगवती माँ बगलामुखी का ध्यान करें ।
तथा नित्यअर्चन में यथा शक्ति जप करें ।
यह भी सम्भव न हो तो —

•१• ॐ ब्रह्मास्त्रविद्याय विद्महे ,
सदाशिवाय धीमहे ।
तन्नो वल्गा: प्रचोदयात् ।।

•२• ॐ बगलामुख्यै च विद्महे,
स्तंभन वाणाय धीमहे ।
तन्नो बगला: प्रचोदयात् ।।

“श्रीवल्गा’गायत्री” का जप तो अवश्य हि करें ।
प्रत्येक देव की गायत्री स्वयं देवता का “तेज” रूपी महिमावर्णन होता है । जो सर्वदा स्मरणयोग्य व कल्याणकारी है ।
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र द्वारा “सूर्यगायत्री” के उपरान्त हि अन्य “देवगायत्री” का उद्भव किया गया |

भगवती श्रीवल्गा के प्राकट्य का वर्णन अन्यलेख में भी किया गया है - अर्थात् सर्वविदित हि है ।
( प्राकट्य का तात्पर्य जन्म अथवा उत्तपत्ति से नहीं है )

किन्तु पुनः सूक्ष्म परिचय लेख की दृष्टि से आवश्यक है ।

सत्-युग में “लवण्यऽसुर” महान दानव द्वारा जो कि स्वयं “नायिका-सिद्धि” द्वारा शक्तिबल से सम्पन्न था । अवध्य होने के मद से उसनें विशाल स्वभुजाओं से स्वड़ण्ड द्वारा हि स्वहेतु निधिपती समुद्र का बारम्बार अत्यन्त घोरनाद करते हुए मन्थन प्रारम्भ किया ।
उसके भयंकर नाद से चराचर ब्रह्माण्ड कम्पित होने लगा । तथा घर्षण से समुद्र सहित त्रैलोक्य में वात-क्षोभ उत्पन्न होने लगा ।

समस्त प्राणी त्राहि-त्राहि करने लगे - समस्त देवगण भी भयाकुल हो ब्रह्मदेव की शरण में जा पहुँचे ।
सदा की भाँति “ब्रह्मदेव” सदेवगण “श्रीहरिनारायण” की शरण में गए । अत्यन्त पराक्रमी भू-भार हन्ता भगवान श्रीनारायण’’
ब्रह्मासहित देवमण्डली को साथ लेकर “शशिशेखर_शूलपाणी देवाऽधिदेव पंचवक्त्र दशभुज स्वरूप भगवान् श्री सदाशिव समक्ष पहुँचकर सम्पूर्ण वृत्तान्त निवेदित कर ‘त्रैलोक्यरक्षा’ हेतु युक्ति की याचना की — तत्पश्चात् भक्तवत्सल सदशिव भगवान नें गम्भीर वाणी से कहा !
।। सदाशिव ऊवाच ।।

भो विष्णु:स्त्वं महाभाग , महायोद्धा:परंतप: ।
सर्वलोक हितार्थंस्त्व , कुरु माह्वाहन: शिवाम् ।।

यस्यंश्च माम् परांशक्ति: , महतीति वरियसी ।
वल्गानाम्नेतिगुप्तेति , मद्भार्या:वेदसंस्तुता: ।।

त्रैलोक्यस्तंभिनींवल्गा:स्तथा दिग्बन्धकारिणि: ।
रिपुसिद्धिं च सर्वाणि: , दृष्टिपातेननश्यती: ।।

क्रोधबीजं च वह्निश्च , युक्तंबीज:स्तव:प्रिया: ।
ईकारान्त:स्ततो:प्रोच्य , इतिबीजाक्षरं परम् ।।

तव संकल्प्यते:विष्णो , लवण्यवधनिश्चित: ।
शीघ्रंगच्छमहाबाहो , कुरु त्रैलोक्यसुस्थिर: ।।

हे महाभाग विष्णु ! आप तपस्वियों में श्रेष्ठ , योद्धाओं में अग्रगण्य हैं । आप त्रैलोक्य की रक्षा हेतु आप देवी शिवा का आह्वाहन करें ।
यह अत्यन्त महान महाविद्या वेदों द्वारा द्वारा पूजित “वल्गामुखी” नाम से गुप्त ‘पराशक्ति’ मेरी भार्या है ।
दशों दिशा सहित तीनों लोकों का स्तंभन करने में समर्थ, तथा दृष्टिपात मात्र से हि शत्रु की समस्त सिद्धियों का तत्क्षण नाश करने वाली है ।

|| बीजोद्धार: ||
क्रोध बीज “ह” | अग्निबीज “र” | पृथ्वीबीज “ल” | तथा अन्त में “ई”कार के संयोग से निर्मित “ह्र्र्लीं” बीज है ।

आपके संकल्पमात्र से “लवण्यऽसुर” का वध निश्चित हो गया है । हे महबाहो ! आप शीघ्र जाएँ त्रैलोक्य को व्यवस्थित व सुखी करने हेतु अविलम्ब देवी वल्गामुखी का आह्वाहन करें ।

| श्रीविष्णु कृत वल्गा पंचक: ||
<~••=•=•=•=•=•=•=•=•=•=•=•=•=•=•=•=•=•=•=••~>
अद्वेताक्षमयास्तुता:शशिशिखाम् ,
नेत्रत्रयोद्भासिताम् ।
सौन्दर्यांगविभूषिता:मितप्रभाम् ,
वल्गा:श्रियोद्भासिताम् ।।१।।

सकन्धेदिव्यकुमुद्भव:सुकुसुमम् ,
माल्यालया:ग्रंथिताम् ।
नानारत्नविनिर्मितंचनिमितम् ,
त्वष्टाद्रचा:निर्मिताम् ।।२।।

गोप्यागोपितगुप्तिताद्भूतनिताम् ,
योन्यांशिवांशाश्वताम् ।
प्राकृत्याकृतिमाकृतिकृतकृताम् ,
योग्यांसुयज्ञान्विताम् ।।३।।

विष्णुर्जिष्णुसुसिष्णुपूज्यवरदाम् ,
वैराग्ययवैवस्थिताम् ।
क्लिन्नाक्लिन्दतिविश्ववर्णवरुणाम् ,
मोह्याऽखिलाऽनन्तिताम् ।।४।।

विद्यायापरिहार्यताम्परिहराम् ,
सिद्धास्त्वमेवाश्रिताम् ।
वल्गेनित्यसुनित्यऽमिट्यकरुणाम् ,
विश्वांबिकाम् पाहि माम् ।।५।।

इतिपंचकानि विविधानि शुभानियानीम् ।
विष्णुर्मुखानिचरितानिपुराणितानिम् ।।
विश्वस्थितानि विमलानि श्रियानितानिम् ।
प्रणितानिसर्वजगतांतमनाशितानिम् ।।•||

यह पंचक के नित्य पाठे करने से भगवती माँ बगलामुखी की दृष्टि भक्त के ऊपर सदा रहती है ।

पंचक द्वारा देवी का अभिषेक किया जा सकता है ।
यदि मूर्ति न हो तो यन्त्र का अभिषेक करें । यन्त्र में देवता अपनी समस्त कला आयुधों शक्तियों का वास होता है ।

माँ बगलामुखी अमृतसागर में त्वष्टा द्वारा स्वर्णग्रंथित अनेक रत्नों व मणियों द्वारा निर्मित अत्यन्त मनोहर सिंहासन पर स्वर्णआभूषणों से सुसज्जित तेजरूपी पीतवस्त्र धारण किए विराजमान हैं । समस्त सिद्धियाँ व ‘रति’ श्रीमहाशक्ति की सेवा में करबद्ध उपस्थित रहती है ।

माँ बगलामुखी द्विभुजा, चतुर्भुजा, षड्भुजा, अष्टभुजा, दशभुजा, द्वादशभुजा, चतुर्दशभुजा, षोड़षभुजा, अष्टादशभुजा, शत्-भुजा, सहस्त्रभुजा, अयुतभुजा, लक्षभुजा, कोटिभुजा, पद्मभुजा, अनन्तभुजा धारिणी भी हैं ।
भुजाएँ केवल आयुध हेतु नहीं होति उनका एक स्वरूप व विशेष महत्व होता है ।
क्रमश: —

द्विभुजामाता — अरिकुल दलिनी ।
चरुर्भुजामाता — चतुर्वर्ग प्रदायिनी ।
षड्भुजामाता — षड्चक्रविभेदिनी ।
अष्टभुजामाता — राजवृद्धि कारिणि ।
दशभुजामाता — दिग्बंधिनी सर्वत्र रक्षाकारिणि ।
द्वादशभुजामाता — आदित्यस्वरूपिणि ।
चतुर्दशभुजामाता — चतुर्दश भुवनपालिनी ।
षोड़षभुजामाता — सर्वमातृकारूपिणि ।
अष्टादशभुजामाता — सिद्धिसेविता महाविद्या सर्वलोकपालिनी ।
शत्-भुजामाता — ईंद्रपूजिता सर्वपाषविमोक्षिणि ।
सहस्त्रभुजामाता — अपराजिता विजयजयदायिनी ।
अयुतभुजामाता — सिद्धविद्या ब्रह्मविष्णुरूद्रवन्दिनी ।
लक्षभुजामाता — तपतेज:स्वरूपिणि ।
कोटिभुजामाता — पराशक्ति सर्वविद्याधारिणी ।
पद्मभुजामाता — अनन्तब्रह्माण्ड प्रकृतिस्वामिनी ।
अनन्तभुजामाता — सर्वपिण्डस्वरूपा ब्रह्मास्त्रविद्या अवर्णिनी ।

हम केवल स्वार्थमय भाव से कामनापूर्ति के लोभ से ग्रसित होकर भगवती के दिव्यस्वरूपों को भ्रमपाष में बँध विस्मृत कर जाते हैं । यन्त्रों में यह स्वरूप स्थित रहता है ।
देवि भक्तों को यंत्रार्चन अवश्य करना चाहिए ।

“श्रीबगला” का सम्पूर्ण परिचय—
“श्रीकुल-कालीकुलचारिणी श्रीवल्गा”

भगवान् श्रीसदाशिव आपके पति हैं ।

मृत्युंजय शिव ( आनन्दभैरव ) आपके भैरव हैं ।

कालीकुल के अनुसार “विमुखशव” आपका आसन है ।

विड़ालाक्षी (विड़ालिका) आपकी सिद्धयोगिनी हैं ।

हायग्रीव हनुमान आपके ध्वजधारक हैं ।

हे माँ बगलामुखी ! आपको बारम्बार प्रणाम |

करुणामूर्ति “श्रीबगला” मंत्रो का जप, भक्ति, अर्चन, होम शान्तचित्त हो प्रसन्न मुद्रा से करें ।
होम इत्यादि में “वेदविरुद्ध” क्रोधमुद्रा में आहुति न देवें ।

अग्नि देवमुख •|| “हव्यभुक् -कव्यभुक्” ||•
अर्थात् द्रव्य एवं घृत आहुति को ग्रहण कर साध्यदेवता तक प्रेषित करते हैं ।
“स्वाहा” अग्निप्रिया (पत्नी) हैं । उसके नामोच्चारण पर अग्निमुख आहुति ग्रहण करते हैं । न पूर्व नहि पश्चात् सो प्रसन्न हृदय से “मृगीमुद्रा” द्वारा आहुति प्रदान करें ।

“मृगीमुद्रा” कैसे बनती है?
तर्जनी एवं कनिष्ठिका को मुक्त करें , व मध्यमा-अनामिका सहित अंगुष्ठ को ग्रंथित करने से देवआहुति मृगीमुद्रा हो जाती है । अन्य मुद्रा में दी गई आहुति अस्वीकार्य व त्याज्य है ।
क्रोधमुद्रा में की गई आहुति पुण्यकर्म का तत्क्षण नाश कर साध्यदेव को भी क्रुद्ध कर देती है ।

भक्ति में भी अज्ञानतापूर्ण कर्म हि क्षम्य हे । किन्तु अपराध कदापि क्षम्य नहीं होता ।

नियमपूर्वक भक्ति कर भगवती “श्रीबगलामुखी” सदाप्रसन्न करने का प्रयत्न करें ।

भगवती कृपा से अनेकों विषयों का हृदय में उद्गम होने से लेखन विश्राम का किंचितमात्र भी मन नहीं किन्तु पूर्व हि अधिक विस्तृत होने से विश्राम अनिवार्य है ।

माँ बगलामुखी की कृपा हम सब पर बनी रहे ।

||•|| सर्वे:भवन्तु सुखिन: ||•||
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यह लेख अत्यन्त विशेष है । आपसे आग्रह है की देवीभक्तों तक अवश्य पहुँचाएँ ।।

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#जयति_ब्रह्मास्त्रविद्या___

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