श्रीश्री बगलामुखी सर्वतन्त्रसाधना ज्योतिष

ज्ञान परामर्श

अष्टसिद्धि एवं नवनिद्धि

.. * अष्टसिद्धि * ।।
अणिमा महिमा चैव, 
                  लघिमागर हिमस्तथा।
प्राप्ति: संकटमयीशांति,
                 वाशित्वं चाष्टसिद्धय: ।।
• 1 • * अणिमा *। से तेज की आरती।
• 2 • * महिमा *। से ख्याति (महिमा)।
• ३ • • * लघिमा *। । सूक्ष्मता।
• ४ • • * गरिमा *। ता महानता का विस्तार।
• the5 • * प्राप्ति * .से सर्वप्रमुख क्षेत्र (कल्पनासिद्धी)
• ऐस • * अमृतमय *। ता सर्वरूप। 
• • • * ईशित्व *। । देवतुल्यता।
• • • * वाशित्व * .जगत् मोहन (जगत् वश्य)।
यह अष्टसिद्धियाँ कही गई हैं।
              .. * नवनिधि * ।।
पद्मं चैव महापद्मं, 
                           निलामावत: मुकुंदकं।
नन्दन च मकरश्चैव, 
                        कच्छप: शंखयस्तथा।
और खर्वन निधी: सर्वं,
                      निशिंवधा: प्रकीर्तित: ।।
• 1 • * पद्मनिधि *। • २ • • * महापद्मनिधि *।
• ३ • * नीलनिधि *। • ४ • • * मुकुंदनिधि *।
• the5 • * नंदनिधि *। • ऐ • • मन्निधि *।
• • • * कच्छपनिधि *। • • • * शंखनिधि *।
और • ९ • * खर्वनिधि *।
यह * नवनिधियाँ * कहि गई हैं।
यह * चक्रवर्ती आभूषणों की * * राज्यलक्ष्मी * के रूप में शोभनधन करती हैं। देवताओं में यह * देवराज ईन्द्र *।
व * शिवकृपा पात्र श्री वैश्रवण कुबेर * के पास सदा स्थित रहते हैं।
* भगवती श्री महात्रिपुरसुंदरी * इनकी * यतात्रि * हैं।
इनकी प्राप्ति कर लेने पर साधक सभी * ऐश्वर्य * का * स्वामी * हो जाता है।
किन्तु * उच्चकोटि का साधक सिद्धी * व * निधियों * का * तिरस्कार * कर * दुखनामार्ग * में * अग्रसर * हो जाता है। यह * उपलब्धियाँ * * साधक * की * साधना * में * पूर्णविराम * का * कारण * भी बन सकती है। यही * कारण * हे की * साधक * व * योगीजन * इनका * बहिष्कार * कर देते हैं।

साधना के प्रमुख अंग

"साधना के प्रमुख अंग"

1 गुरु 
2 एकाग्र मन
3 शांतमन 
4 एकांत
5 शोधक 
६ अभ्युदय 
7 चैतन्य लोग
8 लघुआहार
9 जितेन्द्रियता
10 शुचिता 
11 अलोह
12 सत्यनिधान

तिरपन के साथ ईष्ट देव के छापन व्यवहार ।।

चरतु: श्लोकि श्रीदुर्गा: स्तुतिन

.चरतु: श्लोकि श्रीदुर्गा: स्तुतिन ।।

तिलविभंजिनीदुर्गाः, सर्वार्थः शतं।
दुर्भागनीयतापसंह्रति:, पाहि मां भयहारिणी: ।।

सर्वरोग निहंतरी, सर्व पाप: प्रणतीनिन।
सर्वदमंगला: पुण्यं, अभिभि: हरिशिवे ।।

कामदाकोमलाकान्ति: सर्वलोकमहीमतीं।
कालिकाकमलाकवि: खड्गहस्तेनसम्मतिं ।।

वल्गा: बालाश्चत्वंरौद्रिन, वायुमग्निनश्चविद्महे।
धीमहिलक्ष्मीरूपा: त्वं, महादुर्गा: प्रचोदयात् ।।

जलाधारी का मुँह सबसे उत्तर में ही क्यूँ जानें?

जलाधारी का मुँह सबसे उत्तर में ही क्यूँ जानें? 

वायु पुराण (शिवपुराण) में वृत्रुरसुर से पुनः राज्यप्रांत हेतु उपरोक्त विषय में देवर्षि पर्वत से देवराज ईन्द्र प्रश्न करते हैं की।

हे देवर्षि किस उपाय से हम अपना खोया हुआ राज्य (स्वर्ग) प्राप्त प्राप्त कर सकते हैं कृपा कर हमें उपहारार्थ कर सकते हैं।
तब महाशवव श्री देवर्षि कहते हैं,
हे देवेन्द्र आप कश्यप अदिति के पुत्र हैं व विष्णु (वामन) के जयंती भ्राता हैं,
भगवान शिव नें प्रसन्न होकर जब अपना दिव्यलिंग (तारकेश्वर) स्वर्ग में स्थापित किया था तो उसे आप वृत्रसुर के प्रभाव से आप खो चुके हैं, जिसका पूजन मात्र से ही व्यक्ति दिग्विजय हो जाता है,
अब शिवकृपा से मुझे जो ज्ञान प्राप्त हे उसे ध्यानपूर्वक सुनो,
हे देवराज आप भगवान शिव की परमप्रिय काशीपुरी में जाकर बालुका से एक शिवलिंग का निर्माण करें शिवलिंग कि जलधारा (योनि) का मुख उत्तर की ओर रखें क्यूँ की देवाधिदेव महादेव उत्तर दिशा में कैलाश पर्वत पर अपनी आद्यशक्ति पार्वती पुत्र गणेश + स्कंद व निजीरों और यक्षों से यक्ष हैं। इत्यादि सभी महाशक्तियों के साथ आनंदपूर्वक निवास करते हैं, सो हे देवेन्द्र उत्तर दिशा सदैव मंगलदायी मान्गई है भगवान श्रीशेष शाय महाविष्णु का वैकुण्ठ और आपका प्रियलोग अमरावती भी उत्तर दिशा में ही स्थित है,
इस बार आपका शत्रु वृत्रऽसुर भी उत्तर (स्वर्ग) में हि स्थित है सो हे देवेंद्र आप उत्तमप्रयत्नों द्वारा शुलपाणि शिव के बालुकिंद शिवलिंग का स्थापन उत्तर में करें उत्तर शिव की प्रियदिशा है। 
अब में आपके सामने अलग-अलग दिशाओं में जलाशय (अणुमुख) में विषय में दिशाफल का वर्णन करता हूँ,

पूर्व दिशा की ओरिनीमुख रखने शिवपूजन करने से ब्रह्महत्या, विद्याधर, गुरुद्रोह, चोरी, और व्यभिचार जैसे सभी पापों का नाश हो जाता है हे, 
दक्षिण की ओर पूजन से महामारी, अपस्मार, कुष्ठरोग, कृत्या, और अकालमृत्यु जैसी पीढ़ा को उसी प्रकार भस्म कर देती है जिस परपकार अग्नि समिधा को इसमें कोई संदेह नहीं है,

पश्चिम की ओर करने से दैविय कोप की तत्क्षण शांति हो जाती है,
उत्तर दिशा में पूजन करने से पूरे मनोभिलाषा पूर्ण होता हे राज्यलक्ष्मी भाग्यलक्ष्मी ऐश्वर्य की अभिवृद्धि होती हे दुर्भाग्य के ग्रसित महाअधम प्राणी भी भगवान शिव का कृपापात्र बन जाता हे।
सो हे देवराज आप अविलंब भगवान शिव की पुण्यभूमि काशिपुरी में जाकर ऊन परमउदार विश्वनाथ की पूजन कर उन्हें प्रसन्न करते हैं केवल वह ु करुणा सागर आपकी कल्याण करने में एकमात्र समर्थ हैं।




शिवलिंग के दस रहष्य

कनेक्शन शिवलिंग के दस रहस्य

शिवलिंग का शास्त्रों में अर्थ बताया गया है परम कल्याणकारी शुभ सृजन ज्योति है। संपूर्ण ब्रह्मांड और हमारा शरीर इसी प्रकार है। भृकुटी के बीच हमारी आत्मा या कहें कि हम स्वयं भी इसी तरह हैं ... बिंदु रूप। शिवलिंग का गलत अर्थ बताने वाले या तो अज्ञानी हैं या फिर वे जान-बूझकर ऐसा कर रहे हैं। खैर, आइए जानते हैं शिवलिंग के 10 अद्भुत रहस्य।
 
1.ब्रह्मांड का प्रतीक: - संपूर्ण ब्रह्मांड उसी तरह है जैसे शिवलिंग का रूप जिसमें जलाशय और ऊपर से गिरि जल है। शिवलिंग का आकार-प्रकार ब्रह्मांड में घूम रही हमारी लाश और उन पिंडों की तरह है, जहां जीवन होने की संभावना है। वातावरण सहित घूमती धरती या सभी अनंत ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्स / धुरी ही शिवलिंग है।
 
वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: शस्त्रिकाल में जिससे सृष्टि प्रकट होती है उसे शिवलिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही शिवलिंग की प्रतीक है। वस्तुतः: यह संपूर्ण ब्रह्मांड बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। यही सबका आधार है। बिंदु और नाद अर्थात ऊर्जा और ध्वनि। यह संपूर्ण संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है।
 
2.शिव का आदि और अनादि रूप: - ईश्वर निराकार है। शिवलिंग उसी का प्रतीक है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भगवान शंकर या महादेव भी शिवलिंग का ही ध्यान करते हैं। शून्य, आकाश, अनंत, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे 'शिवलिंग' कहा गया है। स्कंद पुराण में कहा गया है कि आकाश स्वयंलिंग है। धरती उसकी पीठ या आधार है और सब अनंत शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे शिवलिंग कहा गया है। शिव पुराण में शिव को संसार की उत्पत्ति का कारण और परब्रह्म कहा गया है। इस पुराण के अनुसार भगवान शिव ही पूर्ण पुरुष और निराकार ब्रह्म हैं।
 
3.निराकार ज्योति का प्रतीक: - पुराणों में शिवलिंग को कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है, जैसे प्रकाश स्तंभ, अग्नि स्तंभ, ऊर्जा स्तंभ, ब्रह्माण्डीय स्तंभ आदि। ज्योतिलिंग उत्पत्ति के संबंध में पुराणों में कई मान्यताएं प्रचलित हैं। वेदानुसार ज्योतिलिंग अर्थात 'व्यापक ब्रह्मात्मलिंग' जिसका अर्थ है 'व्यापक प्रकाश'। जो शिवलिंग के 12 खंड हैं। शिव पुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।
 
4.कब से प्रारंभ हुई शिवलिंग की पूजा: - भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद को सुलझाने के लिए एक दिव्य लिंग (ज्योति) को प्रकट किया था। इस ज्योतिर्लिंग का आदि और अंत ढूंढते हुए ब्रह्मा और विष्णु को शिव के परब्रह्म स्वरूप का ज्ञान हुआ। इसी समय से शिव को परब्रह्म स्वीकार करते हैं कि उनके प्रतीक रूप में ज्योतिर्लिंग की पूजा आरंभ हुई। हिन्दू धर्म में मूर्ति की पूजा नहीं होती है, लेकिन शिवलिंग और शालिग्राम को भगवान शंकर और विष्णु का विग्रह रूप मानकर इसी की पूजा की होनी चाहिए।
 
5.आसमानी पत्थर: - ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार विक्रम संवत् के कुछ सहस्राबदी पूर्व संपूर्ण पृथ्वी पर उल्कापत का अधिक प्रकोप हुआ। आदिमानव को यह रुद्र (शिव) का अविर्भाव दिखा रहा है। जहाँ-जहाँ ये पिंड गिरे, वहाँ-वहाँ ये पवित्र पिंडों की सुरक्षा के लिए मंदिर बना दिए गए हैं। इस तरह की धरती पर हजारों शिव मंदिरों का निर्माण हो गया। उनमें से प्रमुख 108 ज्योतिर्लिंग थे, लेकिन अब केवल 12 ही बचे हैं। शिव पुराण के अनुसार उस समय आकाश से ज्योतिति पिंड पृथवी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश गए हैं। इस तरह के कई उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे।
 
6.प्राचीन सभ्यता में शिवलिंग: - पुरातात्विक निष्कर्षों के अनुसार प्राचीन शहर मेसोपोटेमिया और बेबीलोन में भी शिवलिंग की पूजा किए जाने के सबूत मिले हैं। इसके अलावा मोहन-जो-दड़ो और हड़प्पा की विकसित संस्कृति में भी शिवलिंग की पूजा किए जाने के पुरातात्विक अवशेष हैं। सभ्यता के आरंभ में लोगों का जीवन पशुओं और प्रकृति पर निर्भर था इसलिए वह पशुओं के संरक्षक देवता के रूप में भी पशुपति की पूजा करते थे। संधव सभ्यता से प्राप्त एक सील पर 3 मुंह वाले एक पुरुष को दिखाया गया है जिसका आस-पास कई पशु हैं। इसे भगवान शिव का पशुपति रूप माना जाता है।
 
7.उषधि और सोने का रहस्य: - शिवलिंग में एक पत्थर की आकृति होती है। जलाधारी पीतल की होती है और नाग या सर्प तांबे का होता है। शिवलिंग पर बेलपत्र और धतूरे या आंकड़े के फूल चढ़ते हैं। शिवलिंग पर जल गिरता रहता है। कहते हैं कि ऋषि-मुनियों ने प्रतीक रूप से या प्राचीन विद्या को बचाने के लिए शिवलिंग की रचना इस तरह की है कि कोई उसके गूढ़ रहस्य को समझकर उसका लाभ उठा सकता है, जैसे शिवलिंग यानी पारा, जलाशय या पीतल की धातु, नाग अर्थात तांबे की धातु आदि को बेलपत्र, धतूरे और आंकड़े के साथ मिलाकर कुछ भी औषिषी, चांदी या सोने से बनाया जा रहा है।
 
8.शिवलिंग का विन्यास: - शिवलिंग के 3 भाग होते हैं। पहला भाग जो नीचे चारों ओर भूमिगत रहता है। मध्य भाग में आठों ओर एक समान पीतल बैठक बनी रहती है। अंत में इसका शीर्ष भाग, जो कि अंडाकार होता है, जिसकी पूजा की जाती है। इस शिवलिंग की ऊंचाई पूरे मंडल या परिधि की एक तिहाई होती है।
 
ये 3 भाग ब्रह्मा (नीचे), विष्णु (मध्य) और शिव (शीर्ष) के प्रतीक हैं। शीर्ष पर जल डाला जाता है, जो नीचे बैठक से बहते हुए बनाए गए एक मार्ग से निकल जाता है। प्राचीन ऋषि और मुनियों द्वारा ब्रह्मांड के वैज्ञानिक रहस्य को समझनेकर इस सत्य को प्रकट करने के लिए विविध रूपों में इसका स्पष्टीकरण दिया गया है।
 
9.शिवलिंग के प्रकार: - प्रमुख रूप से शिवलिंग 2 प्रकार के होते हैं- पहला आकाशीय या उल्का शिवलिंग और दूसरा पारद शिवलिंग। पहला उल्क वसुंड की तरह काला अंडाकार के लिए। ऐसे शिवलिंग को ही भारत में ज्योतिर्लिंग कहते हैं। दूसरा मानव द्वारा निर्मित पारे से बना शिवलिंग होता है। पारद विज्ञान प्राचीन वैदिक विज्ञान है। इसके अलावा पुराणों के अनुसार शिवलिंग के प्रमुख 6 प्रकार होते हैं- देवलिंग, असुरलिंग, अर्लिंगिंग, पुराणलिंग, मनलिंग और स्वयंभू लिंग।
 
10.देश के प्रमुख शिवलिंग: - सोमनाथ (गुजरात), मल्लिकार्जुन (आंध्रप्रदेश), महाकाल (मध्यप्रदेश), ममलेश्वर (मध्यप्रदेश), बैद्यनाथ (झारखंड), भीमाशंकर (महाराष्ट्र), केदारनाथ (उत्तराखंड), विश्वनाथ (उत्तरप्रदेश), त्र्यंबकेश्वर (देहरादून) महाराष्ट्र), नागेश्वर (गुजरात), रामेश्वरम् (TN), घृश्नेश्वर (महाराष्ट्र), अमरनाथ (जम्मू-कश्मीर), पशुपतिनाथ (नेपाल), कालेश्वर (तेलंगाना), श्रीकलाहट (आंध्रप्रदेश), कम्बरेश्वर (TN), अरुणाचल (TN), तिलई नटराज मंदिर (TN), लिंगराज (ओडिशा), मुरुदेश्वर शिव मंदिर (कर्नाटक), ब्रो मंदिर, महाबलीपुरम् (TN), कैलाश मंदिर एलोरा (महाराष्ट्र), कुम्भेश्वर मंदिर (TN), बादामी मंदिर (कर्नाटक) आदि सैकड़ों प्राचीन और चमत्कारिक मंदिर हैं।

शिव अर्थ कल्याण

शिव संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, कल्याणकारी या शुभकारी। यजुर्वेद में शिव को शांति देने वाले को कहा गया है। 'शि' का अर्थ है, पापों का नाश करने वाला, जबकि 'व' का अर्थ देने वाला यानी दाता।

शिव की दो काया है। एक वह, जो स्थूल रूप से व्यक्त किया जाए, दूसरा वह, जो सूक्ष्म रूपी अव्यक्त लिंग के रूप में होना चाहिए। शिव की सबसे ज्यादा पूजा लिंग रूपी पत्थर के रूप में ही की जाती है। लिंग शब्द को लेकर बहुत भ्रम होता है। संस्कृत में लिंग का अर्थ है चिह्न। इसी अर्थ में यह शिवलिंग के लिए इस्तेमाल होता है। शिवलिंग का अर्थ है: शिव यानी परमपुरुष का स्वभाव के साथ समन्वयित-चिह्न।

शिवलिंग का अर्थ है शिव का आदि-अनादि स्वरुप। शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। स्कन्द पुराण में कहा गया है कि आकाश स्वयं लिंग है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो में में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है।

शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं - शिव शंकर भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। मूलतः में, दोनों की प्रतिमाएँ अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते दिखाया गया है। शिव ने सृष्टि की स्थापना, पालना और विनाश के लिए क्रमशः: ब्रह्मा, विष्णु और महेश (महेश भी शंकर का ही नाम है) को तीन सूक्ष्म देवताओं की रचना की है। इस तरह शिव ब्रह्मांड के रचयिता हुए और शंकर उनकी एक रचना। भगवान शिव को इसीलिए महादेव भी कहा जाता है। इसके अलावा शिव को 108 अन्य नामों से भी जाना और पूजा जाता है।

शिव पुराण में एक शिकारी की कथा है। एकबार उसे जंगल में देर हो गई। तब उसने एक बेल वृक्ष पर रात रुकने का निश्चय किया। जगे रहने के लिए उसने एक तरकीब सोची। वह सारी रात एक-एक पत्ता तोड़कर नीचे फेंकता रहा। कथ के रूप में, बेल के पत्ते शिव को बहुत प्रिय हैं। बेल वृक्ष के ठीक नीचे एक शिवलिंग था। शिवलिंग पर प्रिय पत्तों का अर्पण होते देख शिव प्रसन्न हो उठे, जबकि शिकारी को अपने शुभ कार्य का अहसास न था। उन्होंने हंटर को दर्शन देकर उसकी मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया। कथा से यह साफ है कि शिव इतनी आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं। शिव महिमा की ऐसी कथाएँ और बखनों से पुराण भरे हुए हैं।

इस तरह शिव-स्वरूप हमें बताता है कि उनका रूप विराट और अनंत है, महिमा अपरंपार है। उनमें ही सारी सृष्टि समाई हुई है।

महामृत्युंजय मंत्र 
शिव के साधक को न तो मृत्यु का भय रहता है, न रोग का, न शोक का। शिव तत्व उनके मन को भक्ति और शक्ति का सामर्थ्य देता है। शिव तत्व का ध्यान महामृत्युंजय मंत्र के माध्यम से किया जाता है। इस मंत्र के जाप से भगवान शिव की कृपा मिलती है। शास्त्रों में इस मंत्र को कई कष्टों का निवारक बताया गया है। 

यह मंत्र ~ मंत्र त्र्यम्बकं यजामहे, तर्पणं पुष्टिवर्धनम्। अलवरुकमिव बन्धनात्, मृत्योर्मुलीय मृतातात् ।।

भावार्थ: हम भगवान शिव की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो हर श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं और पूरे जगत का पालन-पोषण करते हैं, उन्हें हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, ताकि मोक्ष की प्राप्ति हो जाए, उसी तरह से जैसे एक खर बूजा अपनी बेल में पक जाने के बाद उस बेल रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाता है।

शिव तत्व



शिव समान तत्त्व है जो सभी प्राणियों के विश्राम का स्थान है। 'शीड् स्वप्ने' धातु से 'शिव' शब्द की सिद्धि है। 'शेरते प्राणिनो यत्र स शिव:' - - अनन्त पाप-तापों से उद्विग्न होकर मनोरंजन के लिए प्राणी जहाँ भी शायन करें, बस उसी सर्वाधिष्ठान, आलश्रय को शिव कहा जाता है। वैसे तो- '' शान्तं शिवं चतुर्थमद्वैत मन्यन्ते। '' इत्यादि श्रुतियों के अनुसार जाग्रत, स्वप्न, सुपुर्पन तीनो अवसेष रहित, सर्व प्रवृत्तिविवर्जित, स्वप्रकाश, सच्चिदानन्दघन परब्रह्म ही शिव तत्त्व, फिर भी वही परमतत्व की दिव्यता के दिव्यांग होने का दिवस होगा। पालन ​​और संहार करते हुए ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि संज्ञाओं को धारण करते हैं। यद्यपि कहीं ब्रह्मा जीव भी कहा जाता है, '' सोभविभतेत्की न रीमे जाओ से दृदथ कर्म कुर्वी '' इत्यादि श्रुतियों के अनुसार भय, अरमण आदि युक्त होने से हिरण्यगृहभ एव विराट को जीव ही कहा गया है, हालांकि वह एक-एक ब्रह्माण्ड के उत्पादक मुख्य ब्रह्मादि के साथ तादात्म्यभिमानी जीव ब्रह्मा ने कहा है। वास्तव में तो जैसे किसान ही क्षेत्र में बीज को बोकर अंकरादि रूप में उत्पादक होता है, उसी सक्षमण्डी द्वारा पालक और अंतर में वही काटने वाला होता है, उसी प्रकार अनन्त-अचिन्त्य-शक्ति सम्पन्न भगवान विश्व की उत्पादक, पालक और संहारक होते हैं हैं। '' सर्वभूतेषु कौन्तेय मूर्त्तयः सम्भवन्ति या:। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजपूर्ण: पिता। '' भगवान का कहना है कि समस्त भूतों में जितनी भी मूर्तियां उत्पन्न होती हैं, उन सबकी महद्मा (प्रकृति) योनि (माता) है और बीज प्रदान करने वाला पिता मैं हूं। '' पिता हीहमस्यतरः '' - मैं ही सर्वत्र का पिता उत्पादक- हूँ। '' ममिनीर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधिमहम्। संभव: सर्वभूतानन ततो भवति भारत। '' अर्थात प्रकृतिरूप योनि में जब मैं गर्भाधान करता हूँ, तब तक उसे समस्त विश्व की उत्पत्ति होती है। वही पूछनाडी द्वारा पालक और अंतर में वही काटने वाला होता है, उसी तरह अनन्त-अचिन्त्य-शक्ति सम्पन्न भगवान विश्व के उत्पादक, पालक और संहारक होते हैं। '' सर्वभूतेषु कौन्तेय मूर्त्तयः सम्भवन्ति या:। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजपूर्ण: पिता। '' भगवान का कहना है कि समस्त भूतों में जितनी भी मूर्तियां उत्पन्न होती हैं, उन सबकी महद्मा (प्रकृति) योनि (माता) है और बीज प्रदान करने वाला पिता मैं हूं। '' पिता हीहमस्यतरः '' - मैं ही सर्वत्र का पिता उत्पादक- हूँ। '' ममिनीर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधिमहम्। संभव: सर्वभूतानन ततो भवति भारत। '' अर्थात प्रकृतिरूप योनि में जब मैं गर्भाधान करता हूँ, तब तक उसे समस्त विश्व की उत्पत्ति होती है। वही पूछनाडी द्वारा पालक और अंतर में वही काटने वाला होता है, उसी तरह अनन्त-अचिन्त्य-शक्ति सम्पन्न भगवान विश्व के उत्पादक, पालक और संहारक होते हैं। '' सर्वभूतेषु कौन्तेय मूर्त्तयः सम्भवन्ति या:। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजपूर्ण: पिता। '' भगवान का कहना है कि समस्त भूतों में जितनी भी मूर्तियां उत्पन्न होती हैं, उन सबकी महद्मा (प्रकृति) योनि (माता) है और बीज प्रदान करने वाला पिता मैं हूं। '' पिता हीहमस्यतरः '' - मैं ही सर्वत्र का पिता उत्पादक- हूँ। '' ममिनीर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधिमहम्। संभव: सर्वभूतानन ततो भवति भारत। '' अर्थात प्रकृतिरूप योनि में जब मैं गर्भाधान करता हूँ, तब तक उसे समस्त विश्व की उत्पत्ति होती है। पालक और संहारक होते हैं। '' सर्वभूतेषु कौन्तेय मूर्त्तयः सम्भवन्ति या:। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजपूर्ण: पिता। '' भगवान का कहना है कि समस्त भूतों में जितनी भी मूर्तियां उत्पन्न होती हैं, उन सबकी महद्मा (प्रकृति) योनि (माता) है और बीज प्रदान करने वाला पिता मैं हूं। '' पिता हीहमस्यतरः '' - मैं ही सर्वत्र का पिता उत्पादक- हूँ। '' ममिनीर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधिमहम्। संभव: सर्वभूतानन ततो भवति भारत। '' अर्थात प्रकृतिरूप योनि में जब मैं गर्भाधान करता हूँ, तब तक उसे समस्त विश्व की उत्पत्ति होती है। पालक और संहारक होते हैं। '' सर्वभूतेषु कौन्तेय मूर्त्तयः सम्भवन्ति या:। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजपूर्ण: पिता। '' भगवान का कहना है कि समस्त भूतों में जितनी भी मूर्तियां उत्पन्न होती हैं, उन सबकी महद्मा (प्रकृति) योनि (माता) है और बीज प्रदान करने वाला पिता मैं हूं। '' पिता हीहमस्यतरः '' - मैं ही सर्वत्र का पिता उत्पादक- हूँ। '' ममिनीर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधिमहम्। संभव: सर्वभूतानन ततो भवति भारत। '' अर्थात प्रकृतिरूप योनि में जब मैं गर्भाधान करता हूँ, तब तक उसे समस्त विश्व की उत्पत्ति होती है।
इस तरह ब्रह्माण्डोत्पादक ब्रह्मा भी भगवान ही है, अत एव- '' यतो वा इमानि भूतानि गन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसवि-शान्ति '' इस श्रुति से जो ब्रह्म का लक्षण कहा गया है, उससे विश्व के उत्पादक, पलक और संहारक को भगवान मानेंगे। समझना चाहिए। यदि तीनो पृथक-पृथक हों तो तब भी भगवान नहीं सिद्ध हो सकते हैं। क्योंकि निरूपित ऐश्वर्य और विज्ञानज्ञ-गुण-सम्पन्न को भगवान ने कहा है। यदि यह तीनों ही सबक्ति सम्पन्न भगवान हैं, तो यह प्रश्न होगा कि यह तीनों मिलकर सलाह से कार्य करते हैं या स्वतन्त्रता से अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार? यदि सलाह से ही करते हैं यह माना जाता है, तब तो ये भगवान कोई भी न हुआ। किंतु, ये तीनों की पर्षद या पंचायत ही भगवान है, क्योंकि अकेले कोई भी कोई कार्य करने में स्वतन्त्र नहीं है। यदि तीनो की इच्छा समान ही होती है और तीनों की अर्थव्यवस्था के रूप में ही उनकी शक्तियाँ कार्य में प्ररित होती है तो तब भी तीन का मानना ​​ही व्यर्थ है। फिर से एक से भी वह सब कार्य सम्पन्न ही हो सकता है। यदि द्वितीय पक्ष स्वीकार किया जाए अर्थात स्वतन्त्रता से भी तीनों कार्य कर सकते हैं, तो भी इनमें से कोई भी भगवान नहीं सिद्ध होगा, क्योंकि स्वतन्त्रता से यदि इच्छा उत्पन्न होगी, तो संभव है कि जिस समय एक को जगत्पालन की रुचि हुई, उसी समय दूसरा हार संहार की रुचि उत्पन्न हो। अब यहाँ जिसकी इच्छा सफल होगी, उसी का निरंकुश ऐश्वर्य समझा जायगा। जिसका मनोरथ भोग हुआ, उसकी ईश्वरता स्वभाव ही रहेगी। एक विषय में विरुद्ध दो प्रकार की इच्छाओं का सफल होना असंभव ही है। इस तरह कई ईश्वर का होना किसी के भी मत में कथमपि संभव नहीं, अतः एकेश्वरवाद ही सबको मानता है। इसीलिये महानुभावों ने एक ही अवस्था में-भेद से उत्पादकत्व, पालकत्व और संहारकत्व माना जाता है। '' बिल्वपत्रमस्य वेदा वीक्षमेत्स्य पंचभूतम्। स्मितमेतस्य चराचरमस्य च सुप्तं महाप्रलयः। ’’ भगवान के निःश्वास से ही वेदों का प्रादुर्भाव हो जाता है। वीक्षण (देखने) से आकाशादि अपंचित पंच महाभूत की सृष्टि होती है। स्मित (मन्दहास, मुस्कुराहट) से भौतिक अनन्त ब्रह्माण्ड बन जाते हैं और सुमित से ही निखिल ब्रह्माण्ड का प्रलय हो जाता है।
इस दृष्टि से एक ब्रह्माण्ड के उत्पादक, पालक, संहारक, ब्रह्मा, विष्णु और शिव में किंचितन्मात्र भी भेद नहीं है। जैसे एक ही गगनस्थ सूर्य अनन्त घटोदकों और तड़ागोदको में रेफम्बित होता है, उसी प्रकार एक ही अखण्ड, अनन्त, निर्विकार चिदानन्द परमात्मतत्व अनन्त अन्तःकरणों और माया जागरों में प्रतिव्यम्ब होते हैं। अन्तःकरणगत प्रतिबिंबन ही जीव कहलाते हैं। मायागत रिफम्ब ही ईश्वर कहलाते हैं। जैसे अन्तःकरण के स्वरूछतिदि-ताराम्य से जीवों में काल्पनिक भेद होता है, उसी प्रकार माया की उत्पादकत्व, पालकत्व, संहारकत्व शक्ति के भेद से ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र में काल्पनिक भेद होता है। अनन्त ब्रह्माण्ड की कल्पना में अनन्त ब्रह्माण्ड की उत्पादिनी शक्तियाँ भी अनन्त हैं। उन एक-एक शक्तियों, अनन्त अंतरः- करण और उत्पादकत्व, पालकत्व, संहारकत्व शक्ति से युक्त माया।] इस तरह एक-एक शक्ति से ब्रह्माण्ड और उसके अनारत अनन्त जीव और उत्पादक, पलक, संहारक ब्रह्मा, विष्णु रुद्र एक्सप्रेस होते हैं। लेकिन ये सभी रिफामन्स का मूलभूत जो बिम्ब है, वह तो सर्वथा एक ही है। वही विष्णु भक्तों को विष्णुरूप से, रामभक्तों को रामरूप से, शिवभक्तों को शिव-स्वरूप से दृष्टिगोचर होता है। जैसे एक ही गगनस्थ सूर्य बिल्लियाँ से नीले पीले से पीले दिखलायी देता है, उसी ही विष्णु-भावना से भावित अन्तःकरण विष्णुभक्त उसी परम तत्त्व को विष्णु कहते हैं, शिव संभावना से भावितमनस्क उसी रावतत्व को शिव कहते हैं और वही श्रीकृष्ण, श्रीराम आदि रूप में। उपलब्ध होता है। वही गगनस्थसूर्यस्थानीय परम तत्त्व 'शिवस्कंदादि' पुराण का शिव है वही 'विष्णुपुराण', 'रामायण', 'भागवत' आदि अष्टगन्थों में विष्णु, राम, कृष्ण रूप से दौड़ा गया है। भक्त की भावन के अनुसार ही परम तत्त्व की ही विशुद्धसत्वमयी दिव्य शक्ति के योग से मधुर मनोहर मूर्त्ति भी व्यक्त होती है। इस प्रकार रेटिंग शिव और विष्णु एक ही है, फिर भी उनके अपर रूप में सत्त्व के योग से विष्णु को सात्विक और तम के योग से रुद्र को तामस हो जाता है। वस्तुतः सत्त्वनित्यता विष्णु और तमनित्यता रुद्र है। तम ही मृत्यु है, काल है, अतः उसके नियन्ता महामंत्रंजय महाकलेश्वर भगवान रुद्र हैं। दूसरी दृष्टि से भी जैसे तमःप्रधान, सुषुप्ति से ही ज्ञात, स्वप्न की सृष्टि होती है, उसी प्रकार तमःप्राप्ति प्रलवस्था से ही सभी प्रपंच की सृष्टि होती है। 
कृष्ण के अनन्य प्रेमी भक्तगण तम ​​को बहुत ऊँचा किंवा सबसे उत्कृष्ट मानते हैं। प्रेममयी आसक्ति मोह, मूर्च्छा सात्त्विक विवेक, प्रकाश से कहीं अधिक महत्त्व की होती है। वास्तव में किसी भी कार्य में अवष्टम्भ (रुकावट) प्रकाश और हलचल की अपेक्षा होती है। तीनों में से एक के बिना भी कार्य नहीं होता है। प्राकृत या अप्राकृत दिव्य से दिव्य कार्यों में भी अवष्टम्भ की अपेक्षा होती है, वही दिव्य अवष्टम्भ तम है, इसी तरह तमस और तामस-तामस भावना का अत्यंतन्त महत्त्व माना जाता है। ता श्रीभागवत ’का तामस फल की अवधि सर्वथाया अपना अधिक महत्त्व रखता है। वैसे भी विश्राम के लिए तामस सुषुप्ति की ऐसी महिमा है कि इन्द्रादि दिव्य भोग-सामग्री-सम्पन्न साथ भी उसे छोड़कर सुषुप्ति चाहते हैं। चिन्तन, मनन सात्त्विक होने पर भी सुषुप्ति का प्रतिबन्धक होने के उदभवन को समझा जाता है। जब जागरादि अवस्था में द्वैत-दर्शन से जीव उद्विग्न हो उठता है तब उसे विश्राम के लिए सुषुप्ति का आश्रयण अनिवार्य हो जाता है। इसी तरह जब शस्त्रिकल के उपद्रवों से जीव व्याकुल हो जाता है तब उसकी दीर्घ सुषुप्ति में मनोरंजन के लिए भगवान सर्वसंहार द्वारा प्रलवस्था व्यक्त करते हैं। यह संहार भी भगवान की कृपा ही है, जैसे दुग्धित्स्य व्रण से व्याकुल को देखकर चिकित्सक करुणा से ही व्रण-छेदन के लिए तीक्ष्णशस्त्र को ग्रहण करता है, उसी प्रकार दुर्निवार्य पाप-ताप बढ़ जाने पर करुणा से ही भगवान विश्व का संहार करते हैं। - '' जिमि शिशु-तनु वरण होइ गुसाईं। भातु चिराव कठिन की नाईं। ’’ कार्यावस्था से कारणवस्था का महत्त्व स्पष्ट ही है तमः प्रधानवत् है, उसी से उत्पादवस्था और पालवस्था व्यक्त होती है। अन्त में फिर सबको प्रलवस्था में जाना पड़ता है- '' भूतग्रामः स एवाय भूत्वा भूत्वा प्रलयते। '' अर्थात यह समस्त भूतग्राम अनन्त काल से उत्पन्न हो-युक्त पुनः-पुनः प्रलवस्था को प्राप्त होता है। कारण से ही सबको उत्पत्ति और उसी में पालन और पुनः उसी में सबका संहार होता है।
निःस्तब्ध समुद्र से ही तरंग की उत्पत्ति, उसी में उसका अनुसरण, अन्त में फिर भी उसी में संहार होता है। उत्पादवस्त के साथ ब्रह्मा, पलवस्था के दर्शन विष्णु और संहारावस्था और कारणावस्था के प्रोग्रामिंग शिव हैं। पहले भी करणावत रहता है, अंत में भी वही रहता है। इस प्रकार प्रथम भी प्रथम भी शिव ही, अन्त में भी शिव ही तत्त्व अवशिष्ट रहता है- '' अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सत्परम्। पश्चादहं यदेतचो योऽवशिष्येत सो्यस्म्यहम्। '' तत्त्वज्ञ लोग वही में आत्मभाव करते हैं, जो चराचर प्रपंच की उत्पत्ति के पहले होता है। उसकी महिमा और वीर्यवत्ता प्रसिद्ध ही है। अतः वही मुख्य निरूपित चरित ईश्वर या महेश्वर होता है। अतः शिव जी ही केवल ईश्वर शब्द से कहे जाते हैं। '' ईशान: सर्वविद्यामीश्वरेश्वर सर्वभूतानाम्। '' '' महेश्वरस्त्र्यम्बक् & नापेर:। वही सर्व प्राणियों के हृदय में रहते हैं। हृदय में ही सुषुप्ति होती है, वहाँ कारणवस्था के अधिपति का होना निहित भी है। कहीं उपनिषदों में एकादश प्राणों को 'रुद्र' कहा गया है। वे निकलने पर प्राणियों को रुलाते हैं, इसलिए रुद्र कहे जाते हैं। अतः दस इन्द्रियाँ और मन ही एकादश रुद्र हैं। लेकिन, ये आध्यात्मिक रुख हैं। आधिदैविक एव सर्वोपाधिविनर्मुक्त रुद्र येसे पृथक हैं। जैसे विष्णु पाद केतेताता हैं, वैसे ही रुद्र अहंकार के खेताता हैं- '' एको रुद्रो न द्वितीयोोवतस्थे। '' अर्थात एक रुद्र ही तत्त्व था, द्वित्वसंख्यापूर्त्यित्यार्थ का दूसरा तत्त्व ही न था। ये आध्यात्मिक ठहराव हैं। आधिदैविक एव सर्वोपाधिविनर्मुक्त रुद्र येसे पृथक हैं। जैसे विष्णु पाद केतेताता हैं, वैसे ही रुद्र अहंकार के खेताता हैं- '' एको रुद्रो न द्वितीयोोवतस्थे। '' अर्थात एक रुद्र ही तत्त्व था, द्वित्वसंख्यापूर्त्यित्यार्थ का दूसरा तत्त्व ही न था। ये आध्यात्मिक ठहराव हैं। आधिदैविक एव सर्वोपाधिविनर्मुक्त रुद्र येसे पृथक हैं। जैसे विष्णु पाद केतेताता हैं, वैसे ही रुद्र अहंकार के खेताता हैं- '' एको रुद्रो न द्वितीयोोवतस्थे। '' अर्थात एक रुद्र ही तत्त्व था, द्वित्वसंख्यापूर्त्यित्यार्थ का दूसरा तत्त्व ही न था।
इन श्रुतियों से प्रोक्त रुद्र तो महाकारन या कार्यकारण रहित शुद्ध ब्रह्म ही है। यह भी 'रोदनात् रुद्र' है, प्रलयकाल में सबको रुलाने वाले हैं। '' यस्य ब्रह्म च क्षत्रंचोभे भवत ओदनः। मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः। ’’ अर्थत ब्रह्मक्षत्रोपलक्षित समस्त प्रपंच जिसका ओदन (भात) है, मृत्यु जिसका उपसेचन (दूध, दही, दाल या कढ़ी) है, उसे कौन, कैसे, कहां जा रहा है? जैसे प्राणी कढ़ी, भात सहित खा लेता है, बस विश्वसंहारक काल और सभी प्रपंच को मिलाकर खाने वाला परमात्मा मृत्यु का भी मृत्यु है, अतः महामृत्युंजय है; काल का भी काल है, अतः कालकाल या महाकलेश्वर है। यदि कोई भी बच जाता है, तो तब उसकी सर्वसंहार्यता में बाधा उपस्थित होती है, अत एव '' योवशिष्यते '' ​​वही एक ब्रह्म है। इसीलिये विष्णु भी वही है, यदि वे शिव या रुद्र से पृथक हुए अभय, तब महामृत्युंजय, महाकालेश्वर, सर्वान्धक से सत्चर हो जायँगे, अन्यथा एक को छोड़कर सभी की सहकर्ता ही शिव में समझी जायगी। सर्वसंहर्ता के सामने दूसरी जो भी बात उपस्थित होगी, वह उसका निश्चित संहार करेगा। अतः यदि कोई बचेगा तो उसकी आत्मा ही बचेगा, क्योंकि अपने में संक्रामक-संहारकभाव नहीं बनता है। इसीलिए शिव की आत्मा विष्णु और विष्णु की आत्मा शिव है। वहाँ भिन्नता ही नहीं है, जिससे परमवेतृशालित्वरूप कर्मत्व का योग हो। सर्वसंहारक में ही निरतिशय प्रोबल्य और परमेश्वरत्व, सर्वोकृत्त्व सिद्ध होता है। शेष जो भी उससे भिन्न अवशिष्ट होते हैं, उन सबका संहार हो जाता है। अतः उनका अनीश्वरत्व, निकृष्टत्व, लिंगायत्व, तद्वशवर्त्तित्व सुत्तंत सिद्ध होता है। जो भगवान भक्तों, प्रेमियों और ज्ञानियों के निरतिशय, निरुपाधिकर परप्रेम के आज्ञात्मक होते हैं और परमान बंदरसरूप होते हैं, वही अभक्तों के लिए प्रचंड मृत्यु रूप में उपलब्ध होते हैं और उन्हें सब भयभीत होते हैं। संहार और शासक से सबको भय होना स्वाभाविक है। इसीलिये कहा गया है कि, '' महृगय वज्त्रमुद्यतम्। '' अर्थात भगवान वत्त्ज्ज्र के समान महाभयानक है। उसी के भय से सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वायु, इन्द्र नियम से अपने-अपने कार्य में लगे हुए हैं। उसी से मृत्यु भी दौड़ रही है- '' भीषास्माद्वा तोलेजे भीषोदेति सूर्यः। भीषाावग्निश्चेन्द्रश्च मृत्युर्धवति पंचमः। ''
यही प्रचंड कोपरूप भी है, कोप का कार्य मृत्यु है। फिर जो मृत्यु का भी मृत्यु है उसकी कोपरूपता में क्या अनुमानित है? सर्वसंहार प्रचंड उग्र शासक परमात्मा ही ईश्वर, ईशान, उग्र, रुद्र, चंड एवं चंडिका आदि शब्दों से व्यवहृत होता है। वेदान्त की दृष्टि से अज्ञानी लोग सर्वविध भेदभाव से प्रभावित, स्वप्रकाश, अद्वैत ब्रह्म से डरते है। '' योगिनो बिभ्यति ह्यमादभ्रये भयदर्शिनः। '' जैसे नीम के कीड़े को सिता शर्करा से उद्वेग होता है, वैसे ही सप्रपंच द्वैतसुख के कीट अज्ञानियों को प्रत्याप्रापंच अद्वैतसुख से भय होता है, क्योंकि उनके अभिलाषी, कान्तति द्वेषी द्वेष और द्वेष के कारण। परन्तु, ज्ञानियों को तो वही परमानन्दरसरूप है। इसी तरह अज्ञानियों को उद्भवक होता हुआ भी वह तत्त्वज्ञानियों को परमरसामृतरूप के रूप में प्रकट होता है। विवेकियों की दृष्टि में प्रमाद ही मृत्यु है- '' प्रमद वै मृत्युमहं ब्रवीबली। '' उन सभी प्रमादों की जड़ मोह या अज्ञान ही है और उसका अन्त करने वाला ब्रह्माकार अत्यधिक वृत्ति पर आरम्भिक शुद्ध ब्रह्म ही है। इस तरह मृत्युरूप अज्ञान का नाशक होने से सर्वसंहरक महामृत्युंजय महाकालेश्वर परम तत्त्व शिव ने कहा है। वे ही लीलया दिव्यमंगलमयी मूर्ति वरण करते हैं, भक्तों की अपनी उपासना में चहुमुखी प्रवृति देख, कुतुहलवशात स्वयं भी भक्तिरस का आस्वादन करने के लिए अपने आपको उपास्य-उपासक दो रूप में व्यक्त करते हैं। बाल रामचंद्र, बाल मुकुंदरूप से निजी हस्तारविन्द के अंगुष्ठ को मुखारविन्द में ऋवेशित कर चरणारविन्द-मकरन्द-लुब्ध भावोमिलिन्दों के लोभी भाग्य को समझनेकर स्वयं भी भक्त होकर श्रीशिव की उपासना करते हैं और शिव जी के रूप से विष्णुरूप की उपासना करते हैं। शिव के हृदय में राम, राम के हृदय में शिव हैं। साम्राज्यसिंहासनसमासीन भगवान राम के हृदयकमल में प्रकटित श्रीशिव का प्रत्यक्ष दर्शन महर्षियों ने किया और शिव के हृदय में राम के प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। इस तरह 'सेवक स्वामि सखा सिय पिय के' शिव सर्वाराध्य परम दैवत हैं।

【ब्रह्मलीन याटिकुलचक्रुड़मणि धर्म धर्म्राट स्वामी करपात्री जी महाराज प्रणीत 'भक्तिसुधा' से संग्रहित य

प्रकृति भग + वन (धारण करने वाला) भगवान पर्णति इति भगवान

(प्रकृति) भग + वन (धारण करने वाला)
भगवान पर्णति इति भगवान 

वास्तव में जिन सभी समर्थताओं में ईश्वर ने प्रकृति की परिधि से पृथक् होकर प्रकृति रूपी भग को धारण, नियंत्रण, सृजन, पालन, पालन, लय पुनः निरंतर शून्यावस्था में लीन होकर योगनिंद्रा में स्थित हो जाते हैं,
वहीं सर्वप्राणियों की आधारभूता आद्यशक्ति, प्रकृति, जिन्हें हम महालक्ष्मी, दुर्गा, काली नवदुर्गा, महाविद्या इत्यादि भिन्न भिन्न नामों द्वारा स्मरण, आह्वान, पूजन करते हैं, 
वह भगवती परमशक्ति कि सर्वसमर्थ पुरुष (भगवान + ईश्वर + ब्रह्म) श्रीविष्णु महादेवशिव के अंत: करण में योग निंद्रा का आश्रय लेकर अनंतगणों या कल्पों तक स्वानंद में स्थिर हो जाते हैं,

यह सृष्टि का क्रम सृष्टि की स्थिति संहार निरंतर चलता रहता है।
चारों युगों में भिन्न भिन्न नामों द्वारा उस सर्वसमर्थ ईश्वर का यजन भजन व पूजन किया जाता है।
शक्ति के उपासकों द्वारा प्रत्येक कल्प युग या काल में शक्ति के उपासकों द्वारा कई पद्धति प्रयोग मंत्र इत्यादि की सृष्टि की जाती रहती है हे ओर निरंतर रहेंगे।
* परमनवनाथ * 
1 आनंदानंदनाथ 
2 नीलासनंदनाथ
३ प्रमर्सानंदनाथ 
४ प्रकाशानंदनाथ
५ अंतरानंदनाथ 
६ परमानंदनाथ 
७ सुआगनानंदनाथ 
८ भुवनानंदनाथ 
9 विश्वानंदनाथ 
व युगों के अनुसार प्रथक प्रथकतार नाम 
जैसे जैसे तत्कालीन 
नवनाथ 
श्री मत्स्येन्द्रनाथ गोरक्षनाथियाँ नवनाथ जो की सर्वविदित हे,
प्रत्येक कल्प या युग में नवनाथ का अवतार होता हे पुनः अपने पूर्वावस्था को धारण करते हुए हैं,
इन्ही के द्वारा युगकालीन तन्त्रआदि विविध प्रकरणों का सृजन होता है हे,
जो तत्काल उपयोगी प्रभावी होते हे,
यह गुरुपरम्परा अंतर्गत व दीक्षा पद्धति द्वारा गुरुपूर्णत्त मंत्र व आदेश से हि कार्य करते है,

पुस्तकेंके पठिते विद्याः,
         कुतोर्सिद्धि: र्कुतो फलम् ।।
पुस्तक में पड़ी गई विद्या (मंत्रजाप) से कहाँ तक सिद्धि व फल प्राप्त होता है,

परमात्मा वह प्राणवायु हे जो जीवन देते भी दृष्टिगोचर नहीं होता,
उसके साक्षात्कार के लिए आत्मसाक्षात्कार होता है।
वह सर्वत्र समान रूप से विद्यमान तो हे,

किंतु उसे देख कोई अविरल (भक्त, योगी, सिद्ध-साधक) हि कैन हे,
यह अनुनयविनय या केवल मूर्तिपूजन यज्ञइत्यादि द्वारा ही प्रसन्न नहीं होता 
उसके लिए उदासीनयोग व सर्वत्र एकमेव भाव द्वारा हि प्रसन्न (दर्शन) किया जा सकता हे,
वह मनुष्य के बिना भी सर्वसम्पन्न सर्वसमर्थ और सर्वशक्तिमान था।
किन्तु इस नश्वर देह में उस सर्वसत्ताधारी ईश्वर का अय्यर्मिव जो भव के भ्रम में उलझ कर आत्म समर्थ देहूमन की समझ में हे,
मूर्तिदर्शन, पूजन, घर, यज्ञ, जप आदि हम देवऋण से उऋण होने और उनकी कृपा बनी रही इसलिए करते हे,
यह दैनिक नित्यमन हे,
जिससे हमारे पित्र व भाग्य पुष्ट होते हैं।

ईष्ट की महनीय कृपा के लिए मन में शंका का सर्वथा त्याग कर भक्ति में प्रत्येक स्थिति में स्थित रहते हुए हमारी कर्मपरायणता,
जिसका निर्वाहन करना हमारा धर्म हे।




ब्रह्मास्त्र ओर ब्रह्मास्त्रविद्या भ्रान्ति एवम कटाक्ष

एक महान # भ्रान्ति व # कटाक्ष

# ब्रह्मास्त्र ओर # ब्रह्माविविद्या के परिपेक्ष्य में एक सबसे एक भ्रान्ति प्रवचन हे,
उसका आज विस्तृत वृत्तान्त पूर्वक शांति का प्रयत्न आवश्यक हे,
साझा करें और दूसरों तक भी साझा करें,
संभावना: व्यक्ति # ब्रह्मास्त्रविद्या को # ब्रह्मास्त्र 
(ब्रह्मा जी का अस्त्र) समझो हे,
किंतु # ब्रह्मास्त्रविद्या स्वयं आद्यशक्ति स्वरूपा सकलत्रल्लोक्यमोहिनी स्तंभिनी श्रीवल्गा हे,
यह कोई अस्त्र नहीं है जिस पर समरभूमि में महाबली प्रतियोगी पर सम्पूर्ण विनाशार्थ संज्ञा किया गया था,

सम्पूर्ण उपविद्या, विद्या, उपमहाविद्या, महाविद्या, दशमविद्या, 
(श्रीमातागी, हल्लितास्त्रिपुरसुंदरी, बगलामुखी) -
त्रीयसिद्धविद्याओं में एकमात्र # ब्रह्मास्त्रविद्या
श्रीपीताम्ब्रवल्गाम्बा हे,

अब जानें # श्री_वल्गा को ब्रह्मास्त्रविद्या क्यूँ कहा गया हे, व उसका भावार्थ क्या हे,

# अथ_कस्मादुच्यते_ब्रह्मास्त्रविदद्या: 

यह प्रश्न वेद नें किया,
की संकेत क्यूँ # श्रीवल्गा को # ब्रह्मास्त्रविद्या कहा जाता है हे?

स्वयं वेदमूर्ति नें हि हमारे लिए उसका उत्तर भी प्रदान किया,

अथ कस्मादुच्यते ब्रह्मास्त्रविद्या: यस्मा दृष्यं भिनोन्येर्भक्तेरश्च तमस्य।
रूपमुपबल्यते तस्मादुच्यते ब्रह्मास्त्रविद्या :।

वेद कहते हे, 
यह सम्पूर्ण सृष्टि को अन्यान्य रूपों में विभक्त होने पर दृष्टिमात्र से स्तंभित (रोके हुए) किए गए हे,
स्वभक्तों के तम (अंधकार-पाप) विनाशिनी व परमसौता क्रूजिनी, स्मरणमात्र से रक्षाकरने वाली पापघातिनी, अनुपमसौन्दर्य (रूपलवान्य) से सम्पन्न होकर आदि से अंत तक, पूर्ण हे। 
इसी प्रकार # श्रीवल्गा को # ब्रह्मास्त्रविद्या कहा गया हे,
श्रीवल्गा हि स्थूल, सूक्ष्म, कृष्ण, श्वेत, रक्त, पीत, अणु, परमाणु, सर्वांग की जननी हे,
ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र रूप धारण कर सृष्टि, स्थिति, लय की कारक हे, 

# ब्रह्मास्त्र प्राप्त या एक लोक के विध्वंस की शक्ति का सामर्थ्य रखता है,
किंतु # श्रीब्रह्मास्त्रविद्या सभी लोकों को दृष्टिसंकेत मात्र से लय कर सकता है,
सभी शक्तियों में परं बने वसुतिरहस्यमयी पर अपरिपक्वता # श्रीब्रह्मास्त्रविद्या_वल्गा को गुप्त से भी अत्यंत गुप्ततम कहा गया हे,

# अनुक्रम मानने वालों (महर्षियों) के अनुसार श्रीनारायण की स्तुति पर भगवती नें प्रकट होकर राष्ट्रभक्त थे,
किंतु सृष्टि रचना से पूर्व भी भगवती शुद्धचैतन्य स्वरूप में # श्रीसदाशिव_भगवान के हृदय में अवस्थित रहती हैं,
मान्यता के अनुसार 
चारों ब्रह्मपुत्र ब्रह्मर्षि (सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमार) 
जो सनातन धर्म के प्रथम स्नातक हे,
उन ब्रह्मकुमारों नें,
सर्वप्रथम अपनी आयु स्तंभन (सदाशय वर्ष की आयु)
का संकल्प बारे में # श्रीब्रह्मास्त्रविद्या_वल्गा का हिश्रय लेकर किया था परिणाम स्वरूप सनकादि ब्रह्मर्षि आज भी १२ वर्ष की आयु हि धारण किए हुए हैं, 
पुनः लोक हितार्थ व योगियों में अग्रगण्य श्री ब्रह्मनंदन देवर्षि भगवान नारद जी को,
चारों ब्रह्मर्षि सनत्कुमारों नें हि श्रीनारद को बगलामुखी महाविद्या प्रदान की थी।
प्रमाणार्थ श्रीबगलामुखी मंत्र के ऋषि श्रीनारद @ कहे गए हैं,
यह भी स्पष्ट करना आवश्यक हे की श्रीनारद जी नें यह महाविद्या का आश्रय योगसिद्धी में अवरोधक कामक्रोधादि अष्टशत्रुओं से संहिताकरण व इंद्रियों पर विजयप्रधान हेतु स्तम्भनार्थ उपरोक्त मंत्र की सृष्टि की ओर से सफल हुआ,

आज के परिपेक्ष्य में प्रत्येक व्यक्ति केवल उसी मंत्र का जप करता हे जो की प्रत्येक परिस्थिति में कद भूमि उचित नहीं हे,

इसलिए निवेदन करता हूँ, किसी साधना को सद्गुरुदेव की अनुमति और उनके मार्गदर्शन में हि आदेशित होकर पूर्ण करें,

आशा हे की भगवती के भक्तों के लिए उपरोक्त विषय ज्ञानवर्धन में सहायक सिद्ध हुआ हो, तो यह उनके स्वजनों मित्रों व भगवती के चरणों में अनुरक्ति रखने वालों तक अवश्य ही प्रतिमा को समर्पण करना,

माँ हम सबका कलचर 

# जयति_ब्रह्मास्त्रविद्या_



वेदमाता गायत्री माहात्म्य

# श्री_भगवती_वेदमाता_गायत्री मृतसंजीवनी और अन्य 
# देवी_देवता की गायत्री के विषय में वर्णन,
सभी को प्राथमिकता: @ # गायत्री के विषय में ज्ञान तो अवश्य ही होता है हे,
# हंसासना हरुध_माता_गायत्री को # वेद_भाव_पुराणऽदि में # ब्रह्मशिखा (श्रेष्ठ) स्थान प्राप्त हे,
सर्वप्रथम श्रीगायत्री माता के प्राकट्य की संक्षिप्त कथा से अवगत होना आवश्यक हे,

यह उत्तम कथा भगवान ब्रह्मनंदन ब्रह्मर्षि वसिष्ठ और भगवान श्री ब्रह्मर्षि विश्वामित्र महामुनि से प्रारम्भ हो चुके हे,

 # विश्वामित्र_वसिष्ठ संवाद तो प्रायः सभी को ज्ञात ही होगा,
जब ब्रह्मर्षि वसिष्ठ जी के ब्रह्मदण्ड से महाशक्तिशाली महाराज गाधिनन्दन विश्वामित्र दिव्यास्त्रों के प्रयोग के साथ विश्वामित्र के सौ पुत्रों का नाश हो गया और स्वयं विश्वामित्र पराजित हो गए। 
तब उन्होंने कहा,

धीग बलं क्षत्रियबलं, ब्रह्मतेजोबलं बलम्।
एकेन ब्रह्मदण्डन, आलस्त्राणि हतानि मे ।।

# भावार्थ: - क्षत्रिय के बल को धिक्कार हे। ब्रह्मतेज से प्राप्त होने वाला बल हि वास्तव में बल हे, क्यूँ की आज एक ब्रह्मदण्ड नें मेरे सारे अस्त्र नष्ट कर दिये ।।
अपने एकमात्र शेष बचे पुत्र को राज्यभार सौंप कर श्रीविश्वामित्र जी वन में तपस्या करने के लिए चले गए,
सहस्त्रों वर्षों की तपस्या पर उन्हें पितामह ब्रह्मदेव द्वारा क्रमशः: राजर्षि, महर्षि अंत में ब्राह्मणत्व (ब्रह्मर्षि) पद प्राप्त हुआ,
तत्पश्चात भागवान श्री विश्वामित्र नें वर्णमातृकाओं को प्रसन्न कर, सर्वतेजोमय भगवान सूर्यदेव की महती (महिमा) शक्ति जो की अमूर्त स्वरूप में सम्पूर्ण भू:, भुव:, स्व:, मह, जन:, तप: व सत्य लोकों की मैत्रीत्री हें (आत्महत्या) ) का अपना तपोबल के द्वारा लोकहितार्थ प्रकट हुआ, 
संसार को सभी छंदों में श्रेष्ठ गायत्री छंद व ब्रह्मतेज वर्धक गायत्री कलाकारों व स्वरूप प्रदान किया,
गायत्री के कई भेद हैं, जैसे की, अनुलोम, विलोम, प्रतिलोम, आदी श्रीविश्वामित्र महामुनि नें भगवान श्रीराम के पूर्वज त्रिशंकु को सजीव स्वर्ग प्रदान करने का संकल्प लेने पर और ईश्वर द्वारा त्रिशंकु को स्वर्ग योग्य न देने पर ईन्द्ररहित अनेकनक्षत्रभूमि युक्त नव स्वर्ग का निर्माण किया। कार्य प्रारम्भ कर दिया गया था देवताओं और ब्रह्माजी के निवेदन करने वाले निर्माणकार्य को संरक्षित किया और त्रिशंक किया को देवताओं के समान पूज्य बनाया (यह कार्य श्रीगायत्री बल से हि सम्भव किया था) तन्त्रग्रंथों में भगवती गायत्री के आश्चर्यचकित कर देने वाले अनेकों प्रयोग वर्णित हे,
अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के उपरान्त श्रीवसिष्ठ_विश्वामित्र के परस्पर सम्मुख होनें पर ब्रह्मर्षिष्ठी नें ब्रह्मदेव की प्रेरणा से गायत्री (मंत्र) को श्रंगी (कीलित) कर दिया (कुयोगी क वचनबद्ध के उद्देश्य के किया जगया) पुनः वसिष्ठ विश्वामित्र के अनुरोध पर ब्रह्माजी निति की प्रार्थना की। विद्या द्वारा संजीवित किया गया,
केवल से श्रापोद्धार में 

.. # ब्रह्मविष्ठविश्वामित्र_श्रापद_विमुक्ता_भव: ।।

प्रयोग किया जा रहा है, 

गायत्री के एक छन्द भी है जो की प्रथम ऋग्पुरुष के अंक ऋग्वेद के सात प्रसिद्ध छंदों में से एक है, उन्हीं सप्तछंदों छंदों के क्रमानुसार नाम हैं - गायत्री, स्वभाव, अनुष्टुप्, बृहती, विराट, त्रिष्टुप् व जगती।
तेजसम्पन्न-गायत्री छन्द में आठ-आठ वर्णों के तीन चरण होते हैं,
ऋग्वेद के मंत्रों में त्रिष्टुप् के अतिरिक्त सर्वाधिक संख्या गायत्री छंदों की है, गायत्री के तीन पद बताए गए हैं (त्रिपदा वै गायत्री),
अतएव जब छंद या वाक् के रूप में सृष्टि के प्रतीक की कल्पना की जाने लगी तब इस विश्व को त्रिपदा गायत्री का स्वरूप माना गया है, जब गायत्री के रूप में जीवन की प्रतीकात्मक व्याख्या होने लगी तब गायत्री छंद की “महति” के अनुरूप उपरोक्त विशेष महाश्रमण। की रचना हुई, जो की इस प्रकार है:

तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गोदेवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्। (ऋग्वेद ३,६२२,१०)

प्रणव (नियुक्त) को नाद स्वरूप घोषरूप नियुक्त किया क्यूँ की नाद हि सृष्टि का प्रारम्भ माना गया हे, पश्चाताप। 
भू:। भुव:। स्व: 
नव लोकों की सृष्टि व स्थायित्व हेतु मन्त्र में प्रतिष्ठित किया गया,
यथानुसार 
.. त्रिपदजचरश्चतुष्पदा ।। 
हिसाब से किया गया,
ब्राह्मण। क्षत्रिय। वैश्वया या
आदि विद्याओं में गायत्री हि         
     .. ब्रह्मतेजमय: प्रदा: ।। 
मान गया,
यह प्रथमशास्त्रीय शोध ब्रह्मर्षि श्रीविश्वामित्र महामुनि द्वारा ब्राह्मण (लोककल्याणार्थ) ने इसे प्रथम व सबसे महान अविष्कार कहा जाना अनुचित नहीं ।।

विदित हो जो की कई सिद्ध महात्माओं नें मृतसंजीवनी महाविद्या के द्वारा द्वारा हि कई प्राणियों को पुन: जीवन प्रदान किया,
यह कार्य वही कर सकता है जो जो मंत्र के मर्म को समझ कर देवमय हो जाता है, 
इसकी प्रयोग विधि भी कोई विरला सिद्धगुरुदेव हि जानते हें व प्रदान कर सकते हैं,

प्रत्येक गायत्री स्वदेवता की महतीशक्ति (महिमा) हि होती हे हे पूर्णत्व का परिचायक हे,
गायत्री प्रभाव से हिम्त्व, तेज, आयु, यश, कीर्ति की वृद्धि होति हे,
गायत्री न केवल सांगोपांग ब्राह्मणों के वरन समस्त भूतों की अधीश्वरी आश्रिता-हे, 
उच्चकोटि का साधक गायत्रीभाव से हिरणत्व भी प्राप्त कर सकता है हे ,,

माँ गायत्री को हम बारम्बार नमन करते हैं ।।

# जयति_ब्रह्मास्त्रविद्या: __



भगवान नृसिह माहात्म्य

भगवान_श्रीराजसिंह जोखिमट्योत्सव की शुभकामनाएँ सहित,
महात्म्य वर्णन व प्रयोग।

भगवान श्रीनरहरि को संसार की अत्यंतउग्र शक्तियों में मुख्य माना जाता है हे,
यह परसौम्य भगवान श्रीहरि के एकमात्र उग्ररूप हे,
श्रीनृसिंह के सम्मुख असुर, यक्ष, राक्षस, गंधर्व, काल, मृत्यु, शोक, दुःख, दारिद्र्य तो क्या देवता भी क्षणभर स्थिर नहीं रह सकते,
हिरण्यकश्यप जैसा महाऽसुर जो ब्रह्मदेव के वरदान रूपी कवच ​​द्वारा रक्षित व अजेय था,
स्वभक्त प्रह्लाद के वचन व आस्था की रक्षार्थ स्वयं श्रीनारायण 
स्तम्भ (खंबा) से प्रकट होकर भक्त प्रहलाद की रक्षा व लोकदैत्य का विनाश करते हैं,  

हे नर्हरि आप हमारी भी रक्षा करें।

श्रीनृसिंहदेव का जैसा रौद्ररूप उतने हि कोमलहृदय भक्तवत्सल इतने दयालु की भक्त प्रहलाद की रक्षा तो की हि वरन उन्हें कभी च्युत न होने वाले स्वप्रर्षद के परंमण पद प्रदान करते हैं, जिसके लिए देवता भी ललायित रहते हैं, हें,

लक्ष्मीपति होने से श्री, कीर्ति, पुष्टि, सिद्धी, आदि सभी 
यश-वैभव प्रदान करने वाले वैकुंठादि सभी लोकों के अधीश्वर कृठिंधु श्रीनृसिंहनारायण हि हे।

उग्र रूप की शान्ति के लिए सभी देवादि नें भगवान श्रीनृसिंह की जो स्तुति की उसकी श्रीमद्भागवत में वर्णन इस प्रकार हे।

                     .. श्रीनृसिंह: स्तुतिअन ।।

ब्रह्मोवाच

 
नतोन्तस्म्यनन्ताय दुरन्तशक्तये,
विचित्रवीर्य पवित्रमने।
विश्ववास सर्ग-स्थिति-समन्वयन,
गुणै: स्वलीलया सँधतेत्मय्यात्मने ॥1 ल
 
श्रीरुद्र उवाच

कोपकालो युगन्तस्ते हतोकालयमसुरोःल्पकः।
तत्सुतं पाहुपसृतं भक्तं ते भक्तवत्सल ं2 ाह
 
इंद्र उवाच

प्रत्यभिज्ञाः परम वैभव त्रायतां नः स्वभागा।
दैत्याक्रान्तं हृदयकमलं स्वदगृहं श्रद्धाबोधि।
काल अव्यय कियड्डी पुरुषो नाथ शुश्रुततां ते।
मुक्तिस्तेषं न हि बहुमता नारसिंपरपरैः किम् ॥३ हि
 
ऋषय ऊचः

त्वं नस्तपः परममात यदात्मतेजो,
                       येनेदमादिपुरुषात्मगतं ससरो।
तद्विप्रलुप्तमनुनाऽन्य शरण्यपाल,
                      रक्षागृतेवपुष्पा पुनरुत्मांसत: ॥4 प
 
पितर ऊच:

श्राद्धि नोऽधिबुभुजे प्रसभं तनुजे-
                  रद्रत्तानि तीर्थस्यप्यपिबत्तितलम्बु।
तस्योदरान्नखविदीर्णवपाद्य अरच्छ-
                 -ट्टस्मै नमो नृहरयेऽखिल धर्मगोप्त्रे ॥5 ो
 
सिद्ध ऊँ

यो नो गतिं योगसिद्धम् अवुरुषस्य उद्योगपदोबलेन।
नानादर्पं तं नखैरनिर्देशददार तस्मै तुभ्यं प्रणताः स्मो नृसिंह ं6 ं
 
विद्याधर ऊचु:

विद्यां पृथक्वाद्यस्यऽनुराद्धं न्यशधद्गो बलवीर्यदिष्टः।
स येन संचिते पशुवद्धतस्तं मायानृसिंहं प्रणताः स्म नित्यम्॥7 पशु
 
नागा ऊहु:

येन पापेन रत्नानि स्त्रीरत्नानि हृतानि नः।
तद्वक्षःपत्तिनासन दत्तानन्द नमो॥स्तु ते।। टने
 
मनव उहु:

मनवो वयं तव निर्देशककारिणो,
                   दितिजेन देव स्तूतसेतवः।
भवता खल: स उपसंहृत: प्रभो,
             कर वाम ते किमनुशाही कि मकरान्क्ष। ु

प्रजापतय ऊचु:

प्रजिशा वयं ते परिशाभिसृष्टा न येन प्रजा वै सर्जमो निषिद्धः।
स एव त्वया भिन्नवक्षऽनुशेते जगन्मंगलं सत्त्वमूर्ते त्ववतारः ॥10 भिन्न

गन्धर्वा ऊचु:

वयं विभो ते नतिट्यगायका येनात्मसाद् वीर्यबलौजसा कृताः।
स एव नीतो भवता दशमीमां किमुत्पथस्थ: कुशलाय कल्पते ॥11 ो

चारणा ऊचु:

हरे तवांग्शीपंकजं भवापवर्गमाश्रिताः।
यदेष साधु हृच्छयस्त्वयायासुरः समर्पयामि ॥12 हृ

यक्ष ऊच:

अतमनुचरमुच्चा: कर्मबस्ते मनोज्ञैस्त इह दितिसुतेन प्रापिता वाहकत्वम्।
स तु जानपरितापं तत्कृतं ते ते नरहर उपनि तो पंचतां पंचविंशः ॥13 प

किंपुरुषा ऊचु:

वयं किंपुरुषास्त्वं तु महापुरुष ईश्वरः।
अयं कुपुरुषो नष्टो धिक्कृतः साधुभिर्यदा ॥१४ ो

वैतालिका ऊचू:

सभासु सत्रेषु तवामलं यशो गीता सपर्यं महतीं लभामे।
यस्तां व्यानैषीद भृशमेष दुर्जनो दिष्ट्या हस्तेस्ते भगवन् यथा॥म्: ऽऽ15 ै

किन्नर ऊहु:

व्यमीश किन्नरगनास्तवानुगा दितिजेन विष्टिमुनाकुकारिताः।
भवता हरे सृजिनोऽवसादितो नरसिंह नाथ विभाय नो भव ॥16 जिन

विष्णुपर्धा उध:

अपैतद्धिरिनरूपमृगुतं ते दृष्टं नः शरणद सर्वलोकशर्म।
सोयं ते विधिकर ईश विप्रशप्तस्तस्येद निधानमनुग्रहाय विद्मः ॥17 धिक

इति श्रीमद्भागवतान्तगते सप्तमस्कन्धेधस्तमध्याये नृसिंहस्तोत्रं संपूर्णम् ं

इस स्तोत्र को पढ़ने से श्रीनृसिंह प्रसन्न होते हैं हे, व उनकी प्रसन्न होने पर कुछ दुस्कर नहीं रह जाते,

अब कुछ प्रयोग का वर्णन करो हे,
 जिससे ग्रहादि दोषों की शान्ति व प्रसन्नता एश्वर्य में वृद्धि होति हे,
ऋणनाश व जीवन में स्थिरता हेतु भी यह प्रयोग सर्वोत्तम हे,

नृसिंह मूर्ति या यन्त्र या दोनों हि न उपलब्ध होने पर,
श्रीशालिग्राम लेवें कांसे (ताम्बे-पीतल) की थाली में चंदन द्वारा 
अष्टदल बनाकर स्थापित करें,
पंचोपचार पूजन करें, 
गौदुग्ध पंचादुमृत पंचगव्य अभिषेक करें रक्तपुष्प अर्पित करें,
केसरचन्दन से तिलक करें 
सपरिवार वहाँ बैठकर 
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, श्रीमन्नारायण, नमोच्चार करें,
या, "क्षरौं उग्रवीराय नृसिंह सौभाग्य सौभाग्य देही देह स्वाथा"
मंत्र का यथा शक्ति जप करें,
धूप, दीप, (तुलसीदल) नैवेद्य, ताम्बुल अर्पित कर आरती करें पश्चाताप श्रीगणवान को मन्दिर मे पुनः स्थापित कर देवें,
पुनः आरती करें व पुष्पांजलि अर्पित करें,
यह क्रिया व पूजन सपरिवार प्रवेशद्वार पर करें,
यह प्रयोग निश्चित रुपेणफलदायक सिद्ध होगा व श्रीहरि की कृपा अवश्य होगी,
यह विशेष ध्यान रखें की श्रीभगवान का प्रमुख दृष्टि घर के भीतर हो वापस घर से बाहर की ओर हो,
क्यूँ की भगवान की पीठपर अधर्म, काल, पाप, दुःख आदि का निवास होता है हे, पीठदर्शन अशुभ मन्त्र चलते हैं,

.. श्रीनारायण नृसिंह हम सबका काल करे ।।

# जयति_ब्रह्मास्त्रविद्या: __



नवनाथ चौरासी सिद्ध भाग 1

क्या_आप_श्रीनवनाथ_सिद्धों_के_विषय_में_जनते_नहीं?

नवनाथ कलियुगधर नहीं सृष्टि संरचना से भी पूर्व से शिवावतार स्वरूप प्रतियुग में तंत्र शक्तियों से हम भूतल वासियों को कृतार्थ करते हुए अवतार धारण करते हैं।
आज हम आपको परमनवनाथ के नाम बताते हैं। 

१ प्रकाशानंद नाथ
2 नीलासनंद नाथ
३ आनंदानंद नाथ
४ ज्ञानानंद नाथ
५ सत्यानन्द नाथ
६ पूर्णानंद नाथ
७ स्वभावानंद नाथ
८ प्रतिभानंद नाथ
9 सुग्रीनंद नाथ

इन्ही नवनाथो द्वारा नाथक्रम की उत्तपत्ति हुई।

नाथ सम्प्रदाय नवनाथ, चौरासी, सिद्धबारह पंथ।

                             नाथ सम्प्रदाय 

सिद्धों की भोग-प्रधान योग-साधना की प्रतिक्रिया के रूप में आदिसिकल में नाथपंथियों की हठयोग साधना भक्त हुई। इस पंथ को चलाने वाले मत्स्येन्द्रनाथ (ममिंदरनाथ) और गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) माने जाते हैं। इस पंथ के साधक लोगों को योगी, अवधूत, सिद्ध, औघड़ ने कहा है। कहा यह भी जाता है कि सिद्धमत और नाथमत एक ही हैं। 

सिद्धों की भोग-प्रधान योग-साधना की प्रवृत्ति ने एक प्रकार की स्वच्छंदता को जन्म दिया जिसकी विकलांगता में नाथ संप्रदाय शुरू हुआ। नाथ-साधु हठयोग पर विशेष बल देते थे। वे योग मार्गी थे। वे निर्गुण निराकार ईश्वर को मानते थे। सभी जातियों में से कई पहुंचे हुए अनुक्रम और नाथ हुए हैं। नाथ-संप्रदाय में गोरखनाथ सबसे महत्वपूर्ण हें। आपकी रचनाएँ प्राप्त होती हैं। इसके अतिरिक्त चौरन्गीनाथ, गोपीचंद, भरथरी (भृर्तहरि) आदि नाथ पन्थ के कवि कवि हैं। इस समय की रचनाएँ साधारण तो दोहों या पदों में प्राप्त होती हैं, कभी-कभी चौपाई का भी प्रयोग मिलता है। परवर्ती संत-साहित्य पर सिध्दों और विशेषकर नाथों का गहरा प्रभाव हुआ है। 

गोरक्षनाथ के अवतारकाल पर विद्वानों में मतभेद हैं। सांकृत्यायन इनका अवतारकाल 845 ई। की 13 वीं शताब्दी का मानते हैं। नाथ परम्परा का आरम्भ अत्यंतप्राचीन है, किंतु गोरखनाथ से इस परम्परा को सुव्यवस्थित विस्तार मिला। गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ थे। दोनों को चौरासी सिद्धों में प्रमुख माना जाता है। 

गुरु गोरखनाथ को गोरक्षनाथ भी कहा जाता है। उनके नाम पर एक नगर का नाम गोरखपुर है। गोरखनाथ नाथ साहित्य के आरम्भकर्ता माने जाते हैं। गोरखवादी साहित्य के अनुसार आदिनाथ स्वयं भगवान शिव को माना जाता है। शिव की परम्परा को सही रूप में आगे बढ़ाने वाले गुरु मत्स्येन्द्रनाथ हुए। ऐसा नाथ सम्प्रदाय में माना जाता है। 

गोरखनाथ से पहले कई सम्प्रदाय थे, जिनकी नाथ सम्प्रदाय में विलय हो गया है। शैव और शाक्तों के अतिरिक्त बौद्ध, जैन और वैष्णव योग मार्गी भी उनकी संबद्धप्रदाय में आ मिले थे। 

गोरखनाथ ने अपनी रचनाओं और साधना में योग के अंग क्रिया-योग अर्थात तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रज्ञा कर्म को अधिक महत्व दिया है। उनके माध्‍यम से ही उन्होंने हठयोग का उपदेश दिया। गोरखनाथ शरीर और मन के साथ नित्यनवीन प्रयोग करते थे। गोरखनाथ द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या ४० बताई जाती है किंतु किसी विद्वान ने केवल १४ रचनाएँ ही उनके द्वारा रचित मानी है जिसका संकलन गोर गोरखबरी ’मे किया गया है। 

जनश्रुति के अनुसार उन्होंने कई कठीन (आड़े-तिरछे) आसनों का सूचक भी किया। उनके कपड़े पहने आसनों को देख लोग अचम्भित हो जाते थे। आगे चलकर कई कहावतें प्रचलन में आईं। जब कोई उल्टे-सीधे कार्य करता है तो कहा जाता है कि 'यह क्या गोरखधंधा रखा गया है।' 

गोरखनाथ का मानना ​​था कि सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य होना चाहिए। शून्य समाधि अर्थात समाधि से मुक्त हो जाना और उस परम शिव के समान स्वयं को स्थापित कर ब्रह्मलीन हो जाना, जहाँ पर परम शक्ति का अनुभव होता है। उन हठयोगी की मान्यता थी की प्रकृति को चुनौती देकर प्रकृति के सभी नियमों से मुक्त हो जाता है और जो अदृश्य प्रकृति है, उसे भीLghkar परम शुद्ध प्रकाश हो जाना। 

सिद्ध योगी: गोरखनाथ के हठयोग की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले सिद्ध योगियों में प्रमुख हैं: - चौरंगीनाथ, गोपीनाथ, चुन्नकरनाथ, भर्तृहरि, जालन्धर्रीपव आदि। 13 वीं शताब्दी में उन्होंने गोरख वाणी का प्रचार-प्रसार किया था। यह एकेश्वरवाद पर बल देते थे, ब्रह्मवादी थे और ईश्वर के साकार रूप शिव के अतिरिक्त कुछ भी सत्य नहीं मानते थे। 

नाथ सम्प्रदाय गुरु गोरखनाथ से भी पुरातन है। गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय के बिखराव और इस सम्प्रदाय की योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया। पूर्व में इस समप्रदाय का विस्तार असम और उसके आसपास के स्थानों में ही अधिक रहा, बाद में समूचे प्राचीन भारत में उनके योग मठ स्थापित किए गए। आगे चलकर यह सम्प्रदाय भी कई भागों में विभक्त होता चला गया है। 

यह सम्प्रदाय भारत का परम प्राचीन, उदार, ऊँच-नीच की भावना से परे एव अवधूत या योगियों का सम्प्रदाय है।

इसका आरम्भ आदिनाथ शंकर से हुआ है और इसके वर्तमान रूप देने वाले योगाचार्य बालयती श्री गोरक्षनाथ भगवान शंकर के अवतार है। उनके प्रादुर्भाव और अवसान का कोई लेख अब तक प्राप्त नहीं हुआ न ही सम्भव हे।

पद्म, स्कन्द शिव ब्रह्मण्ड आदि पुराण, तंत्र महापर्व आदि तांत्रिक ग्रंथ, बृहदारण्यक आदि उपनिषदों में और अन्य प्राचीन ग्रंथ रत्नों में श्री गुरु गोरक्षनाथ की कथनों बडे सुचारु रूप मिलते हैं।

श्री गोरक्षनाथ वर्णाश्रम धर्म से परे पंचमाश्रमी अवधूत हुई है जिन्होने योग क्रियाओं द्वारा मानव शरीरस्थ महा शक्तियों का विकास करने के अर्थ संसार को उपदेश दिया और हठ योग की प्रक्रियाओं का प्रचार करके भयानक रोगों से बचने का अर्थ जन समाज को एक बहुत बड़ा साधन प्रदान किया है। ।

श्री गोरक्षनाथ ने योग सम्बन्धी अनेकों ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखित जिनमे बहुत से प्रकाशित हो चुके हैं और कई अप्रकाशित रूपों में योगियों के आश्रमों में सुरक्षित हैं।

श्री गोरक्षनाथ की शिक्षा एव चमत्कारों से प्रभावित होकर अनेकों बड़े-बड़े राजा इनसे दीक्षित हुए। उन्होंने अपने अतुल वैभव को त्याग कर निजीानंद प्राप्त किया और जन-कल्याण में अग्रसर हुए। ये राजर्षि बड़े-बड़े कार्य करते थे।

श्री गोरक्षनाथ ने संसारिक मर्यादा की रक्षा के अर्थ से श्री मत्स्येन्द्रनाथ को अपना गुरु माना और चिरकाल तक दोनों के मध्य शंका-समाधान के रूप में संवाद चलता रहा। श्री मत्स्येन्द्र को भी पुराणों और उपनिषदों में शिव-विष्णु (भेदहीन) स्वरूप माना गया है कई ग्रन्थों में इनकी कथनों को भी उल्लेखित हैं।

वैसे तो यह योगी सम्प्रदाय अनादि काल से चला आ रहा है कि लेकिन इसकी वर्तमान परिपाटियों के नियत होने के काल भगवान-शंकराचार्य से 200 वर्ष पूर्व है। ऐस शंकर दिग्विजय नामक ग्रन्थ से सिद्ध होता है।

# बुद्धकाल में वाम मार्ग का प्रचार बहुत प्रबलता से हुआ जिसके सिद्धान्त बहुत अधिक थे, कि साधारण बुद्धि के लोग इन सिद्धान्तों की वास्तविकता न समझ कर भ्रष्टाचारी होने लगे थे।

इस अवधि में उदार चेता श्री गोरक्षनाथ ने वर्तमान नाथ सम्प्रदाय का निर्माण किया और तत्कालीन ४४ सिद्धों में सुधार का प्रचार किया। यह प्रज्ज्वलनान मतानुयायी थे।

इस सम्बन्ध में एक दूसरा लेख भी मिलता है जो कि निम्न प्रकार है :-
1 ओंकार नाथ,
2 उदय नाथ, 
3 सन्तोष नाथ, 
4 स्थिर नाथ, 
5 गजबेली नाथ, 
6 ज्ञान नाथ, 
7 चौरंगी नाथ, 
8 मत्स्येन्द्र नाथ, 
9 गुरु गोरक्षनाथ।

सम्भव है यह उपयुक्त नाथों के ही दूसरे नाम है।

यह योगी सम्प्रदाय बारहनाथ में विभक्त है, यथाः-
1 सत्यनाथ,
2 धर्मनाथ,
3 पास जैयानाथ,
4 आई पेजैथी,
5 रास के,
6 वैराग्य के,
7 कपिलानी,
8 गंगानैथी,
9 मानेथी,
10 रावल के,
11 पाव पेजैथी, 
12 पागल "पन्थी"।

ये बारह पन्थ की प्रचलित परिपाटियों में कोई भिन्न नहीं हैं। भारत के प्रायः सभी डोमेनों में योगी सम्प्रदाय के बड़े-बड़े वैभवशाली आश्रम है और उच्च कोटि के विद्वान इन आश्रमों के संचालक हैं।
श्री गोरक्षनाथ का नाम नेपाल क्षेत्र में बहुत बड़ा था और अब तक भी नेपाल का राजा इनको प्रधान गुरु के रूप में मानता है और वहाँ पर उनके बड़े-बड़े प्रतिष्ठित आश्रम हैं। यहाँ तक कि नेपाल की राजकीय मुद्रा (संकेतक) पर श्री गोरक्ष का नाम है और वहाँ के निवासी गोरक्ष ही कहलाते हैं। 
काबुल-गंगधर सिन्ध, बलुचिस्तान, कच्छ और अन्य देशों और द्वीपों में यहाँ तक कि # मक्का_मदीने तक श्री गोरक्षनाथ ने दीक्षा दी थी और ऊँचा मान पाए थे।
इस सम्प्रदाय में कई भाँति के गुरु होते हैं यथाः- शीर्ष गुरु, चीरा गुरु, मंत्र गुरु, टोपा गुरु।

श्री गोरक्षनाथ ने कर्ण छेदन-कान फाडना या चीरा चढ़ाने की प्रथा प्रचलित की थी। कान फाडने को तत्पर होना कष्ट सहनशीलता की शक्ति, दृढ़ता और वैराग्य का बल प्रकट करता है।

श्री गुरु गोरक्षनाथ ने यह प्रथा प्रचलित करके अपने अनुयायियों शिष्यों के लिए एक कठोर परीक्षा नियत कर दी। कान फडाने के पश्चात मन बहुत से सांसारिक झंझटों से स्वभाव तो या लज्जा से बचता हैं। चिरकाल तक परीक्षा करके ही कान फाड़े जाते थे और अब भी ऐसा ही होता है। बिना कान फटे साधु को 'ओघड़' कहते हैं और इसका आधा मान होता है।

भारत में श्री गोरखनाथ के नाम पर कई विख्यात स्थान हैं और इसी नाम पर कई त्योहार मनाये जाते हैं।
यह सम्प्रदाय अवधूत सम्प्रदाय है। अवधूत शब्द का अर्थ होता है "स्त्री रहित या माया प्रपंच से रहित" जैसा कि "सिद्ध सिद्धान्त पद्धति" में है :-

"सर्वान् प्रकृति प्रकृतिं वधु नोतित्यधवधुतः।"
अर्थात् जो पूरे प्रकृति विकारों को त्याग देता है या झाड़ देता है वह अवधूत है। 
पुनश्चः-

"वचने वचने वेदास्तीर्थिन च पडे पडे।
शेडे ट्यूटोरियले च कैवल्यं सोऽवधूतः श्रिये स्तुनः।)
“एक हेस्ते धृतस्त्यगो भोगश्चैक स्वयम्
अलक्षस्त्यग भोगाभ्यां सोधवधूतः श्रियस्तुनः। "

श्री-नाथ सम्प्रदाय में नव नाथ पूर्ण अवधूत हुए थे और अब अनेकों अवधूत सशरीर विद्यमान भी हैं।

नाथ लोग अलख (अलक्ष) शब्द से अपने ज्ञान महादेव “शिव” का ध्यान (स्मरण) करते हैं। परस्पर आदेश या आदीश शब्द से अभिवादन करते हैं। अलख और आदेश शब्द का अर्थ प्रणव या परम पुरुष होता है जिसका वर्णन वेद और उपनिषद आदि में किया गया है।

योगी लोग अपने गले में काला ऊन का एक जनेऊ रखते हैं जिसे 'सिले' कहते हैं। गले में एक सींग की नगरी रख रही है। ये दोनों को सीगी सेली कहते हैं यह लोग शैव हैं यानी शिव की उपासना करते हैं। षट् विचारों में योग का स्थान अत्युच्च है और योगी योगमार्ग पर चलते हैं अर्थात योग क्रिया करते हैं जो कि आत्म दर्शन का साधन है। जीव ब्रह्म की एकता का नाम योग है। चित्त वृत्ति के पूर्ण निरोध को योग कहता है। 

वर्तमान काल में इस सम्प्रदाय के आश्रम अव्यवस्थित होने लगे हैं। इसी प्रकार "अवधूत योगी महासभा" का संगठन हुआ है और यत्र तत्र सुधार और विद्या प्रचार करने में इसके संचालक लगे हुए हैं। "
प्राचीन काल में स्याल कोट नामक राज्य में शंखभाट नाम के एक राजा थे। उनके पूर्णमल और रिसालु नाम के पुत्र हुए। यह श्री गोरक्षनाथ के शैले बनने के पश्चात क्रमश: संगी नाथ और मन्नाथ के नाम से प्रसिद्ध होकर उग्र भ्रमण शील रहें। 

"योगासन वृत्ति निरोध:" 
सूत्र की अन्तिमावस्था को प्राप्त किया और इसी का प्रचार एव प्रसार करते हुए जन कल्याण किया और भारतीय या माननीय संस्कृति को अक्षुण्ण बने रहने का बल प्रदान किया। उर्पयुक्त १२ पंथो में जो "मन्नाथी" पंथ है वह इन्ही का श्री मन्नाथ पंथ है। श्री मन्नाथ ने भ्रमण करते हुए वर्तमान जयपुर राज्यंतर्गत शेखावाटी जंक्शन के बिसाऊ नगर के समीप आकर अपना आश्रम निर्माण किया। यह ग्राम अब 'टाँई' के नाम से प्रसिद्ध है। श्री मन्नाथ ने यहीं पर अपना शरीर त्याग दिया था, वही पर इनका समाधि मन्दिर है और मन्नाथी योगियों का गुरु द्वार हैं। 'ताँई' के आश्रम के अधीन प्राचीन काल से २००० बीघा जमीन है, बड़ा मकान है और इसमे कई समाधियाँ बनी हुई है। यह ज्ञात है कि श्री मन्नाथ के पश्चाताप यहाँ पर कालकाल तक अच्छे सन्त रहते रहे हैं। इस स्थान में बाबा श्री ज्योतिनाथ जी के शिष्य श्री केशरनाथ रहते थे। अब श्री ज्ञाननाथ रहते हैं। इन दिनों इस आश्रम का जीर्णोद्वार भी हुआ। श्री मन्नाथ के परम्परा में आगे चल कर श्री चंचलनाथ अच्छे संत हुए और इन्होने संचित संज्ञा की। 1700 वि.स. के आस पास झुंझुनु (जयपुर) में अपना आश्रम बनाया गया है।

इससे आगे का इतिहास विवरण है। यदि सम्भव हुआ तो श्री गोरक्षनाथ की शिक्षाओं ने एकत्रित कर उल्लेखित करने की चेष्टा की जायगी।

नाथ लक्षण: -
"नाकरो नानादि रूपंच'थकारः 'स्थापयते सदा"
भुवनत्रय में वैकः श्री गोरक्ष नमोस्तुते।
।। "शक्ति संगम तंत्र" ।।

अवधूत अद्वैत वादी योगी होते हैं जो कि बिना किसी भौतिक साधन के यौगग्नि प्रज्वलित करके कर्म विपाक को भस्म कर निजीानन्द में रमण करते है और अपनी सहज शिक्षा के द्वारा जन कलयाण करते रहते है। केवल उपयुक्त नाथ शब्द सार्थक होता है।

इनका सिद्धान्तः-
न विष्णु रुद्रौ, न सुरतिं सुरा :,
पृथ्वी पृथ्वी न आर्कौ।
नैवैग्निनर्पि वायुः न च गगन तलं,
नो डोंस की अवधि:।
नो वेदा और यज्ञ न च राव शशिनौ,
नो मेथिंग कल्पपा:।
स्व ज्योति: सत्य मेकं जयति तव पदं,
सच्चिदानन्दमूर्ते,

               "नवनाथ"

नवनाथ नाथ सम्प्रदाय के सबसे आदि में नौ मूल नाथ हुए हैं। वैसे नवनाथों के सम्बन्ध में अत्यंत भिन्नता है, किन्तु वर्तमान नाथ सम्प्रदाय के १ों-२० पंथों में प्रसिद्ध नवनाथ क्रमशः इस प्रकार हैं -

१ आदिनाथ - कार-कार शिव, ज्योति-रूप
२० उदयनाथ - पार्वती, पृथ्वी रूप
३ सत्यनाथ - ब्रह्मा, जल रूप
४ सन्तोषनाथ - विष्णु, तेज स्वरूप
५ अचलनाथ (अचम्भेनाथ) - शेषनाग, पृथ्वी भार-धारी
६ कंठडीनाथ - गणपति, आकाश रूप
७॰ चौरंगीनाथ - चन्द्रमा, वनस्पति रूप
८॰ मत्स्येन्द्रनाथ - माया रूप, करुणामय
९। गोरक्षनाथ - अयोनिशंकर त्रिनेत्र, अलक्षित रूप

चौरासी क्रम

जोधपुर, चीन इत्यादि के चौरासी सिद्धों में भिन्नता है। अस्तु, यहाँ कलम साहित्य में प्रसिद्ध नवनाथ के अतिरिक्त ना४ सिद्ध नाथ इस प्रकार हैं -
१ क्रमिक छीपवत्थ, 
२ कपिलनाथ, 
३ गंगानाथ, 
विचारनाथ, 
जालंधरनाथ, 
ाद श्रंगारिपाद, 
७॰ लोहिपद, 
पाद पुण्यपाद, 
९। कान्नी, 
१० १ तुषी, 
११ १ कृष्णपाद, 
१२ १ गोविन्द नाथ, 
१३ १ बालगुंदाई, 
१४ १ वीरवंकनाथ, 
१५ १ सारंगनाथ, 
१६ १ बुद्धनाथ, 
१ विभाण्डनाथ, 
१ वनखंडिनाथ, 
१ ९। मण्डपनाथ, 
२० २ भोगभंडनाथ, 
२१ २ धूर्मनाथ
२२ २ गिरिवरनाथ, 
सरस्वतीनाथ, 
२४ २ प्रभुनाथ, 
२५ २ पिप्पलनाथ, 
२० २ रत्न, 
२ संसारनाथ, 
२ भगवंत नाथ, 
२ ९। उपांतनाथ, 
३० ३ चन्दननाथ, 
३१ ३ तारानाथ, 
३२ ३ खार्पुनाथ, 
३३ ३ हेचरनाथ, 
३४ ३ छयानाथ, 
३५ ३ शरभनाथ, 
३६ ३ ३ नागार्जुननाथ, 
३७॰ सिद्ध गोरिया, 
३ मनोमहेशनाथ, 
३ ९। श्रवणनाथ, 
४० बालकनाथ, 
४१ शुद्धिकारक, 
४२॰ कायनाथ।
४३ भावनाथ, 
४४ पाणिनाथ, 
४५ वीरनाथ, 
४६ इ सौइथ, 
४ तुक नाथ, 
ब्रह्मनाथ, 
४ ९ ४ शील नाथ, 
५० शिव नाथ, 
५१ ज़वलानाथ, 
५२ नागनाथ, 
५३॰ गम्भीरनाथ, 
५४॰ सुंदरनाथ, 
५५॰ अरनाथ, 
५६ चिड़ियानाथ, 
५ गेलरवाल, 
५ जोगरावल, 
५ ९ ५ जगमरावल, 
६०॰ पूर्णमल्लनाथ, 
६१॰निमलनाथ, 
६२॰ मल्लिकानाथ, 
६३ मल्लिनाथ
६४॰ रामनाथ, 
५५॰ आम्रनाथ, 
६६िनी मेंहिनीनाथ, 
, ज्ञाननाथ, 
६ मुक्तानाथ, 
६ ९ ६ विरुपाक्षनाथ, 
७0७ रेवनाथ, 
७11ड अड़बंगनाथ, 
॰२॰ धीरजनाथ, 
७3७ घोरीचोली, 
७4॰ अर्थनाथ, 
७5नाथ हंसनाथ, 
७६॰ गैबीनाथ, 
नाथ मनुनाथ, 
७८॰ सनकनाथ, 
७ ९ ७ सनन्दननाथ, 
८0॰ सनातननाथ, 
८11त् सनत्कुमारनाथ, 
८२द नारदनाथ, 
८3चिक नचिकेता, 
८4॰ कूर्मनाथ।
================================================== ========================================

बारहवें पं

नाथ सम्प्रदाय के अनुयायी मुख्य तो बारह शाखाओं में विभक्त हैं, जिन्हें बारह पंथ कहते हैं। ये बारह पंथों के कारण नाथ सम्प्रदाय को 'बारह-पंथी' योगी भी कहा जाता है। प्रत्येक पंथ का एक-एक विशेष स्थान है, जिसे नाथ लोग अपना पुण्य क्षेत्र मानते हैं। प्रत्येक पंथ एक पौराणिक देवता या सिद्ध योगी को अपना आदि प्रवर्तक मानता है। नाथ सम्प्रदाय के बारह पंथों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है -

१ सत्यनाथ पंथ - इनकी संख्या ३१ १ बतलायी गयी है। इसके मूल प्रवर्तक सत्यनाथ (भगवान ब्रह्माजी) थे। इसीलिये सत्यनाथी पंथ के अनुयायियों को "ब्रह्मा के योगी" भी कहते हैं। इस पंथ का प्रधान पीठ उड़ीसा प्रदेश का पाताल भुवनेश्वर स्थान है।

२ धर्मनाथ पंथ - इनकी संख्या २५ है। इस पंथ के मूल प्रवर्तक धर्मराज युधिष्ठिर माने जाते हैं। धर्मनाथ पंथ का मुख्य पीठ नेपाल राष्ट्र का मंगलुदेलक स्थान है। भारत में इसकी पीठ कच्छ प्रदेश धिनोधर स्थान पर हैं।

३ राम पंथ - इनकी संख्या ६१ है। इस पंथ के मूल प्रवर्तक भगवान श्रीरामचन्द्र माने गए हैं। इनका प्रधान पीठ उत्तर-प्रदेश का गोरखपुर स्थान है।

४ नाटेश्वरी पंथ या लक्ष्मीनाथ पंथ - इनकी संख्या ४३ है। इस पंथ के मूल प्रवर्तक लक्ष्मणजी माने जाते हैं। यह पंथ का मुख्य पीठ पंजाब प्रांत का गोरखिलला (झेलम) स्थान है। इस पंथ का संबध दरियानाथ व तुलनाथ पंथ से भी कहा जाता है।

५ कंथड़ पंथ - इनकी संख्या १० है। कंथड़ पंथ के मूल प्रवर्तक गणेशजी कहे गये हैं। इसका प्रमुख पीठ कच्छ प्रदेश का मानफरा स्थान है।

६ कपिलानी पंथ - इनकी संख्या २६ है। इस पंथ को गढ़वाल के राजा अजयपाल ने कहा। इस पंथ के प्रमुख प्रवर्तक कपिल मुनिजी बता चुके हैं। कपिलानी पंथ का प्रधान पीठ बंगाल प्रदेश का गंगासागर स्थान है। कलकते (कलक) के पास दमदम गोरखवंशी भी इनका एक मुख्य पीठ है।

७॰ वैराग्य पंथ - इनकी संख्या १२४ है। इस पंथ के मूल प्रवर्तक भर्तृहरिजी हैं। वैराग्य पंथ का प्रधान पीठ राजस्थान की नागौर में राताढुंढा स्थान है। पंथ का सम्बन्ध भोतंगनाथी पंथ से कहा जाता है।

८॰ माननाथ पंथ - इनकी संख्या १० है। इस पंथ के मूल प्रवर्तक राजा गोपीचन्द्रजी माने गए हैं। इस समय मानाथ पंथ का पीठ राजस्थान की जोधपुर महा-मन्दिर नामक स्थान बताया गया है।

९ है आई पंथ - इनकी संख्या १० है। इस पंथ की मूल प्रवर्तिका गुरु गोरखनाथ की शिष्या भगवतीमला देवी हैं। आई पंथ का मुख्य पीठ बंगाल प्रदेश के दिनाजपुर जिले में जोगीव या गोरखकुई नामक स्थान हैं। इनका एक पीठ हरिद्वार में भी बताया गया है। इस पंथ का सम्बन्ध घोड़ा च

नवनाथ चौरसि सिद्ध भाग 2

नवनाथ_चौरासी_सिद्ध_नाथपन्थ  
                      (लेख क्र .२) 
 विषय_तन्त्रप्रभाव_शाबर_योग_सेवा_कुण्डलिनी ...

सभी वेद, शास्त्र_योग_तन्त्र के उद्गमकर्ता व प्रवर्तक स्वयं भगवान श्रीवृषभध्वज महादेव शिव का हिव्यतीयरूप सर्वगुरु श्रीदक्षिणामूर्ति भगवान शिव हे,
जो की सम्पूर्ण चराचर जगत के एकमात्र गुरु हें।

हमें एक "सूत्र" गुरुकुलों में पढ़ाया जाता है की।

वेद: शिवो शिवोवेद:,
                 वेदा वेध्यायी: सदाशिव:।
तस्मात् सर्व: प्रयत्नेन,
                 वेदमेव: सदा: पठेत् ।।

नाम == वेद हि शिव हेंड। शिव हि वेद हेंड। वेदा वेध्ययन करने वाला भी शिवसमन (शिवप्रिय) हि होता है हे।
इसलिए किसी को भी प्रयत्न द्वारा वेद का पाठ (अनुसरण) अवश्य ही करना चाहिए।

वेद हि धर्म का मूल और ज्ञानविज्ञान का प्रकाशक हे,
वेदों द्वारा हि सृष्टि की परिकल्पना सम्भव हो पाती हे,

# एको_हि_वेद: # वेदपुर ग्रंथस्वामीक:।
  त्रय: विभक्त: स्तम्भ और भेद: ।।

अर्थात् == आप एकमात्र एकमात्र वेद (# ऋग) और वेद के प्रथम पुरुष आप (शिव) हि हेंड।
अन्य तीन रूपों (# साम_यजु_अथर्व) में विभक्त आप हि के भिन्न-भिन्न भेद (प्रकार-स्वरूप) हें।

भगवान् शिव नें स्व कहा हे।

# आबैवपरब्रह्म: मसिरूप: कलां कलं ।।

अर्थ == में हि # परब्रह्म हूँ अनन्त ब्रह्माण्ड और समस्त देवि-देवता भी मेरी कलात्मक हि हे।

वेदों को चार भागों मे विभक्त होने पर अद आध्यात्मिक जगत् में शिव इच्छा से ब्रह्मर्षियों सिद्धों व परम नवनाथों द्वारा अद्भुत परिवर्तन होने लगे अर्थात् वह पृथक्-पृथक् श्रेणियों का निर्माण होना प्रारम्भ हुआ।
जैसे की 
# ऋग से सर्वसूक्त और स्तुति। 
# यजुः से कर्मकाण्ड यज्ञऽदि दैवकर्म। 
# साम से गायन और पितृमन। 
# अथर्व से तन्त्र, युक्तिकर्म, दिव्यौषधि विधि, सर्वदेवशीर्ष और रक्षात्मक प्रयोग आदि अपना प्रभाव प्रकट कर कर विजयी मत व सम्प्रदायों का सृजन होने लगा,
जैसे .....
 # शैव_शक्त_गाणपत्य_विष्णव आदि अनेक।
वैदिक उपासकों द्वारा चारों पुरुषार्थों के चार देवता नियुक्त हुए जो कि नित्य व सनातन हें।
# शास्त्र_मान्यतानुसार ....

आरोग्यं भास्करादिच्छेत्, धनमिच्छेत्हुताशनः।
मोक्षं तु केशवदिच्छेत्, ज्ञानं तच्छेत्तुशंकरात् ।।

भावार्थ: == आरोग्य की इच्छा करने वाले सूर्य की उपासना करें, भगवन् सूर्य हि आरोग्य के वस्त्रात्र देव माने गए हैं, 
क्यूँ की आरोग्य शरीर द्वारा हि # काम_पुरुषार्थ सिद्ध होता है।

धन के इच्छुक भगवान हुताशन (अग्नि) की उपासना करें, अग्निदेव हि देवमुख हें उन्हीं के द्वारा हमारा यज्ञादि का भाग देवताओं तक पहुँच जाता है हे यहीं से # अर्थ_पुरुषार्थ की सिद्धि हे। मोक्ष के अभिलाषी भगवान केशव, विष्णु, राम की उपासना (पूजन-भक्ति) करें श्रीहरि हि मोक्ष केवोंतात्र देव हें, उन्हीं की कृपा से # मोक्ष_पुरुषार्थ सम्भव हे।
ज्ञान के अभिलाषित प्राणि भगवान महादेव शिव की उपासना (पूजन-अभिषेक) करें क्यूँ की ज्ञान के बिना धर्म सम्भव नहीं, उन्हीं की कृपा से # धर्म_पुरुषार्थ सम्भव हो पाता है।

# अब_उपरोक्त_विषय_की_परिपथ ••••
भगवान श्री महादेवशिव के परम्ल्स साक्षात् श्रीविष्णु के अवतार भगवान् श्रीपादवल्लभ अवधूतदत्त हुए जिन्होंने भगवान शिव द्वारा सभी सिद्धियाँ प्राप्त की। 
जिसमें वेद, शास्त्र, योग सहित तन्त्र, यन्त्र व सम्पूर्ण कलाएँ सम्मिलित हे,
भगवान श्रीदत्त हि नाथ सम्प्रदाय के प्रवर्तक हुए।
कालिकाल के महत्व का वर्धन करने के लिए भगवान विष्णु नें बुद्धरूप में अवतार लेकर बौद्धधर्म की महिमा को चहुँमुख कर कर दिया, राजा राजा भी बौद्धधर्मावलम्बी होने लगे स्वस्ति हे की ।।

.. प्रजानामृष्टिं विष्णु रथराज और प्रजा: ।।

प्रजा में राजा विष्णु के समान माना गया हे जैसा राजा वैसी प्रजा का होना स्वभाव: गुण हे।
प्रजा भी बौद्धधर्म परायण होने लगी,
यज्ञ आदि वैदिक धर्म का ह्रास होता देख भगवान श्रीहरिविष्णु नें स्वयं को पुनः पृथ्वी पर अवतरित किया,
# दादा_गुरु_श्री_मत्स्येन्द्रनाथ_भगवान के जगमंगल दायक योगी रूप में।
कहा जाता है हे की पहली बार एसा हुआ की ।।

.. # विष्णुर्विष्णुस्य: 

श्रीविष्णु हि (मत्स्येन्द्रनाथ) श्रीविष्णु (श्रीदत्त) के शिष्य हुए।
किसी भी युग या कल्प में यह अद्भुत संज्ञा है 
पहली बार बना।
श्री मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्यों में शिव के अवतार महागुरु श्रीगोरक्षनाथ जी हुए जो की नवनाथों में सर्वत्र प्रसन्न होते हैं 
हुआ है। भगवान गोरखनाथ की महिमावर्णन करना ऐनी जन्म से सम्भव नहीं,
भगवान श्री गोरखनाथ नें, पुनः सनातन धर्म के प्रमुख अंग योग आदि का विस्तार किया और अनेकों बौद्धों व अन्यों को सनातन धर्म में स्थित किया, 
(इस विषय में पिछले लेख में विस्तृत लिखा जा चुका है हे)

भगवान गोरक्ष नें सभी सिद्धियों के चर्म को भी पार किया 
उनका "हठयोग" सर्वविदित हे हि।
श्रीगुरुगोरक्ष नें अनंत शाबर मंत्रों की सृष्टि की व अनेकों बार ईंद्राऽदि देवताओं को स्वविद्या द्वारा बांधा व परजित किया।
भगवान गोरख न केवल शाबरी अपितु 
सभी तन्त्रों व विद्याओं में प्रवीण हें।

भौतिक सुखों को लेषमात्र भी स्थान न देकर प्रकृति की परिधि का उल्लंघन कर निजांदनंद में स्थिर हो जाना @ योगियों का ध्येय होता है,
# भगवान_श्रीआनंदभैरव (शिव) # श्रीआनंदभैरवी (मातापिता) 
नें रुद्रयामल में तन्त्र से पूर्व कुण्डलिनी व योग का हि अतिविस्तारित महावर्णन किया हे, योग के बिना तन्त्र का भी पालन व साधन असम्भव हे, योग से हि इंद्रियों का भेदन और वणसिद्ध किया जाता है।
किन्तु दुर्भाग्यवश मॉडर्न के भ्रमजाल में वरीयता: सभी सम्प्रदाय के कई महात्मा लोकाचार में आ गई दिव्यता समाप्त होति जा रही हे, तेजक्षोनिया हो रहे हे, जिनके धर्म अलक्षाटन द्वारा स्वयं के अहंकार के नाश को रोक दिया था।
वह सत्यता अब सर्वत्र देखने को नहीं मिलती,

कहा जाता है हे ...
# रमे_सो_जोगी_बहे_सो_पानी "
अर्थात् ध्यान में बैठने पर घोर विद्युतगर्जना पर भी विचलित न होकर स्थिर रहे। अनेकों राजाओं द्वारा पूजित होकर भी क्षणभर न रुके।
आज उच्च अट्टालिकाओं में सम्पूर्ण आधुनिक सुखों का उपभोग करने लगे।
किन्तु उन्हें अधिक संख्या सम्पूर्ण धर्म का पालन करने वाले महात्मा भी पृथ्वी की शोभा का वर्धन किया हुआ जगत् काल में कार्यरत हें।
किंतु जो सिद्ध होते हैं वह एकान्तवास का हिश्रय लेकर अर्जितपुराणों को पृथ्वी को अर्पित कर हमें उपहारार्थ करते हैं।
एकान्त का कारण पृथ्वी पर उठता हुआ पापाचार और असत्यवादिता हे, की हम उन दिव्यमहात्माओं_सिद्धों का साक्षात्कार प्राप्त नहीं कर पाते हैं।
पूर्वकाल में गुरुशिष्य संवादों के लिए कलकारी होती थी।
गुरुल्स को सदाचारी व देहकष्ट दायक एकांत वास की साधनाएँ प्रदान करते थे जिससे कील्स
स्वयं सक्षम बन # विश्वकल्याण में सहभागी बने।
वह परम्परा भी अब लुप्त के समान हि हे।
अब प्रश्नों के उत्तर पर आते हें।
# सवाल • १ • २ • क्या नाथ व सिद्ध एक हि हें या भिन्न नाथों के सिद्ध४ अनुक्रम एक हि हें या भिन्न-भिन्न?
# उत्तर ==> नाथों से हि हुए4 सिद्ध हुए हें जैसे की गोरक्षनाथ मत्स्येन्द्रनाथ आदि भी सिद्धों की श्रेणी में आते हें। सभी ४४ सिद्ध नाथों द्वारा हि चयनित व पूजित हें, ४४ सिद्ध नाथों से कद अन्य भिन्न नहीं एकयम हि हें।

# प्रश्न • ३ • तन्त्र का सात्विक ज्ञान क्या नाथ व सिद्धों के पास हे?
# उत्तर ==> तत्कालीन परिपेक्ष्य में यह कहना अनुचित होगा कि सभी के पास हे। किंतु हाँ कई नाथों के पास यह विद्या सुलभ व सुरक्षित हे, तन्त्र स्वयं शिव संवाद हे शंका का तो किंचितमात्र भी स्थान हि नहीं वह अक्षरश: प्रमाणित हे, सात्विकता या तामसिकता साधक के स्वभाव के तरीके पर निर्भर करता हे, तंत्र में सम्पूर्ण प्रयोगों का। साधक को दृष्टिगत रखते हुए प्राप्ति प्रयोग सभी प्रकार के उल्लेखित हें।
सिद्धों की तुलना तो की हि नहीं जा सकती क्यूँ की जो # स्वयंसिद्ध हे उनके पास सर्वसुलभ हे सिद्धियाँ स्वयं उपस्थित होकर उनकी सेवा के लिए आतुर रहती हे लेकिन सिद्ध उनको बारंबार अस्वीकार कर शून्यभाव में स्थित होकर उस # ब्रह्म की उपासना में @ स्वयं को निष्ठित रखता है। हे। 
नाथ सम्प्रदाय तो मध्यम योग-ध्यान-समाधि-तन्त्रसिद्धि हेतु हि उदय हुआ था # कुण्डलिनी_जागरण तो इसके # योगसिद्धी के पश्चात पहला लक्षण था।
अब इसी नाथ “योगी” का दर्शनार्थ भी किसी अविला को सौभाग्य से हि सम्भव हो जाए तो महाकृष्ण जानें ।।

# जयति_ब्रह्मास्त्रविद्या: ___



महागणपति का महावर्णन

वरद_मुर्ती_श्रीगणेश_व_आद्यमहागणपति_का_महावर्णन ....

जयति जय गणेशो: देवसर्वस्वालोक:,
          प्रणमतिशिवसुतो: स्त्वं आद्यशक्त आत्माजस्य:।
 सिद्धिबुद्धिश्चतुष्ठिपुष्ट्यमेक्षस्वनाथः,
          लभतिक्षेमप्रमोद: लोकसरवान्मुमोद: ।।
 
भाग्यवान: सकामंगल लोकाय:,
           भद्रंनमोद्रस्तु जय स्वस्तिवृजन्तिलोक:।
स्कन्दुंज: परमंगलमूर्ति रूप:, 
          तुभ्यं नमामि गणपति: स्त्वमयोनिजस्य: ।।

          
# भगवान_श्रीगणेश आप सिद्धी, बुद्धी, वृद्धि, पुष्टि के एकमात्र स्वामि व लाभ, क्षेम (शुभ), आमोद, प्रमोद के जनक हे,
सकबालुवन के अधिपति # श्रीमहादेवशिव पाप्वती आपके माता पिता हे, # देवसेनापति_श्रीस्कंद के अनुज परममंगल सूत्र # अयोनिज_श्रीगणेशपति_देव आपको हम 
बारम्बार प्रणाम करते हैं।
सभी # सनातन_ग्रंथ वेद, शास्त्र, पुराण, तन्त्र, उपनिषद, श्रुतियाँ आदि श्रीगणेश "" अथ_श्री "श्री श्रीगणेश हें।

आज के उल्लेख में # भगवान_श्रीगणेश और उनके सनातन स्वरूप # महागणपति_आद्यगणेश के विषय में अनेकों एसे वृत्तान्त प्राप्त होंगे, जो संतचित् अधिकांश भगवत्भक्तों के कर्णस्पर्श न न हो हो।)
यह सब मेरे # शिवस्वरूप_सद्गुरूदेव_भगवान के स्नेहमय आशीर्वाद # श्रीगणेश व # माता_सरस्वती की कृपा व अनेकों ग्रन्थों के अध्ययन अध्ययन द्वारा सम्भव हो पाया है।

सर्वप्रथम श्रीगणेश व उनके परिवार का सम्पूर्ण विवरण।
भगवान श्रीगणेश का "विवाह" प्रजापति विश्वकर्मा की "नौ" पुत्रियों सिद्धि (अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति अमृतमय इस दायित्व, वशित्व) और वृद्धि (अपभ्रंशीता) से सम्पन्न हआ।
पश्चाताप श्रीगणवती सरस्वती नें अपने तेजद्वारा प्रकट सर्वपूज्य # बुद्धि नामक कन्या प्रदान की - और विश्वपालिका # माता_लक्ष्मी नें भी अपने हि तेजद्वारा निर्मित # पुष्टि नामक कन्या प्रदान की इस प्रकार श्रीगणेश सिद्धि, बुद्धि, वृद्धि, पुष्टि के भी अधिपति हुए। 
क्रमशः - सिद्धि से क्षेमादि अष्टपुत्र हुए उनके नाम इस प्रकार हें।

क्षेमभद्रं च मांगलः, वात्सल्यं वा सुमिरनः।
महादिव्य: दिग्विजं च, महाशौर्य: प्रकीर्तित: ।।

• १ • क्षेम अपभ्रंश (शुभ)।
• २ • भीर।
• ३३ • मांगपत्र।
• ४ • वात्सल्य।
• ५० • सुस्मिन्या
• इ • • महादी।
• • • दिग्विजय।
• • • महाशौर्य।

# भगवतीश्रीबुद्धी के # लाभ को कल्याणकारी पुत्र कहा जाता है।

वृद्धि के # श्रुतकीर्त व # सन्तुष्टि अपभ्रंश (सन्तोषी) नामक दो सन्तानें हुई।

और # श्रीपुष्ति_देवी के # पुत्र (महाबल) पुत्र हुए।
(कई ऋषियों में सर्वथा व महाबल नामों को लेकर कई मतभेद हैं) 
यह # सपरिवार_श्रीगणेश विवरण था।

श्रीगणेश के स्वरूप, वाहन, के कोटि-कोटि हें उनका पूर्णवर्णन 
तो सम्भव नहीं किंतु कुछ मुख्य स्वरूपों का वर्णन यदि # श्रीगणेश की कृपा आप # विद्वान_पाठकों की रुचि रही तो "भविष्य" में अवश्य प्रयास किया जाएगा।
 
अब समझने का प्रयास करते हें की # वेदों नें # श्रीगणपति को सभी देवों को # सकल_ब्रह्माण्ड की संज्ञा क्यूँ दी? 

त्वम्ब्रह्मा त्वंविष्णु: त्वंरूद्र: त्वंइन्द्र: त्त्वंअग्नि: त्वंवायु: त्वंस्वर्य: त्वचंद्रेंद्रमा: त्वम्ब्रह्म भू: भुव: स्वरूपोम्।

आप हि ब्रह्मा हें। आप विष्णु हें। आप हि रुद्र हेंड। आप हि ईन्द्र हें। आप ही अग्नि हें। आप हि वायु ह। आप सूरज सूरज। आप हि मून हें। आप हि पूर्णब्रह्म हें। सम्पूर्ण लोकों में समान व्याप्त एकमात्र प्रणव “आप कार” आप ही हैं।

पुनः वेदों नें कहा की।

.. गणमत्ने पूर्व उच्चार्या वर्णस्यंस्तदनन्तर: ।।

भावार्थ: - प्रथम गणपति नामोच्चार करें तन्नन्तर अन्यवर्णों (नामों-मंत्रों) का उच्चरण - क्यूँ की की 

"ग" ँ "प" ति "यह चार सूत्र ही # ब्रह्मविनीकरण का मूल हे।
(ऋषियों नें भावार्थ के सम्मुख अर्थ को "च्युत" कहा हे) 

वेदों नें श्रीगणपति को सभी देवों और "सकलब्रह्मंद" और "पूर्णब्रह्म" जिस कारण से उनका "सूक्ष्मवृत्तान्त" सुनीए।

सम्पूर्ण शक्तियों का पुंज “परब्रह्म” हि हे 
हेइ अल्स्तमा “ब्रह्म” हि स्वयं को सृष्टि-स्थिति-संहार हेतु 
"ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र" रूपों में विभक्त कर "निर्गुणब्रह्म" से "सगुणब्रह्म" की अपनी "विशिष्टअंश" से यात्रा कर पुनः शक्तियों को स्वयं में निहित कर "शून्य" हो जाता है हे।

सृष्टि के आरम्भकाल में # प्रत्यसुता_भगवती_श्रीसती और
# भगवान_महरूद्र_शिव ने परब्रह्म की दर्शनार्थी की दिव्यांकाओं तक तपस्या की प्रसन्न होकर # परब्रह्म नें परंतेजोमय स्वस्तिक स्वरूप में दिव्यवाणी द्वारा वर माँगने की बात कही। 
किन्तु भगवानशिव व मातासती नें दर्शन की याचना की पश्चाताप प्रदान करने के लिए कहा।
परब्रह्म्याद्यगणपति नें अपना सर्वदुर्लभ स्वरूप का दर्शन प्रदान कर पुनः वर हेतु कहा।
परब्रह्म्याद्यगणपति के स्वरूप को देखकर शिवशक्ति अत्यंत मोहित हो गई की परब्रहम आद्यगणपति को हि पुत्र रूप में प्राप्त करने की वरदान स्वरूप या साधना कि।
तब श्रीआद्यगणपति नें कहा की ......
हे महादेव और महादेवी में पूर्णब्रह्म हूँ।
मेरा जन्म लेना कद अन्य सम्भव नहीं हो सकता कि लेकिन आप दोनों भी मेरे तेज से प्रकट हुए और सभी देवताओं व देवियों में श्रेष्ठ हो। आप दोनों नें अपने तपबल द्वारा मुझे सन्तुष्ट किया हे, वरदान स्वरूप में आप दोनों के पुत्र रूप में अवश्य अवतीर्ण लिंगदेव हैं।
हे महाभाग देविसती आप अगले जन्म में पर्वतराज हिमवान् व पित्रति आर्यसुता मैनादेवी के यहाँ पार्वती नाम से अवतार ग्रहण करेंगी और # महादेव_शिव मेरा हि ध्यान कर समाधिस्थ रहेंगे। तत्पश्चात आप दोनों का विश्वोद्धर व मेरे आगमन के लिए पुनर्मिलन होगा। मेरी कृपा से आपको शिव संयोग प्राप्त होते हैं इस जन्म का भी स्मरण हो जाएगा।
आप दिल में मेरा ध्यान कर के चंदनादि द्रव्यों द्वारा मातृत्व से पुत्र रूप में मेरी कल्पना कर मेरा पार्थिव रूप का निर्माण, में
इसमें प्रकट होकर अपने वरदान की रक्षा करूँगा और आपको निरंतर मातृत्व का सम्पूर्ण सुख प्रदान कर अनेक लीलाएँ प्रकट करूँगा।
हे महादेव आप मृत्युंजय हें आपका कल्याण हो।
किंतु में देस (मनमुख) धारण नहीं कर सकता क्यूँ की 
वह तो मेरी स्वयं की कल्पना का रूप है हे 
(सम्भव हे भिन्नता हेतु)
आपने तपबल से मेरे दुर्लभ दर्शन को प्राप्त किया हे। 
सो हे महादेव। मुझे मेरा गजमुख हि अतिप्रिय हे आप मेरी हिना से देविप्वती द्वारा दिए गए देवमुख का शिरच्छेदन कर मुझे मेहंदी बना सकते हैं। मेरा यही मगलकारी रूप प्रथमपूज्य त्रैलोक्यनायक विघ्नहर्ता गणेश के नाम से सुप्रसिद्ध व पूजित होगा।
मेरे एनीर्स रूप होंगे वह सभी पूज्य व # सिद्धिप्रद होंगे।
सभी रूपों के कर्मों पद्धति और सिद्धांतों का शुभफल व सिद्धि में हि प्रदान करूँगा।
देविपाद्वतीपुत्र के रूप में हि # गौरीगणेश नाम द्वारा हि प्रत्येक शुभकार्यों में हम मातापुत्र का हि प्रथम आह्वाहन किया जाएगा व सभी के अभीष्ट की पूर्ति करता रहेगा।
इन्हीं शुभवचनों के पश्चात # श्रीआद्यगणपति अंतर्हित हो गए।

वेद, शास्त्र, पुराण, योग, तंत्र हो शस्त्र हो या व्यापार विवाह आदि कोई अन्य शुभकर्म बिना “श्रीगणेश” पूर्णता व सिद्धी प्रसिद्धि प्राप्त नहीं होती ।।
 
.. भजामि गणेश: नमामि गणेश: ।।

शास्त्रों में अनेकों भेद हे “सो” उपरोक्त विषय पर कुछ विद्वानों में मतभेद हो सकते हैं, जो की कोई विस्मय की बात नहीं ।किन्तु यह लेख भी पूर्णरुपेण प्रमाणित हे “यदि किसी भी महानुभव को आप हो या प्रमाण की जिज्ञासा हो तो वह आदरणीय है। प्रथम तो स्वयं गहनअध्ययन करें, ग्रन्थों के अध्ययन का प्रयत्न करने पर निश्चित रूप से आपको स्वचालित उत्तर प्राप्त हो जाएगा, उसके पश्चाताप भी यदि न हो तो प्रत्यक्ष दर्शन ाभ देकर कृतार्थ करें सेवा में तत्पर रहूँगा।

यदि विषय आकर्षक व ज्ञानवर्धक लगा तो जितनी सम्भव हो सभी को लाभान्वित करें ।।

मन्त्र का सूक्ष्म परिचय

मन्त्रविज्ञान_यन्त्रमहिमा_तन्त्रयुक्ति_तथा_सर्वविद्या_वर्णन ....

श्रीगुरुगानेभ्योनम:।
आज का विषय, आकर्षक व साधकों के लिए, अत्यंत ज्ञानवर्धक, व हितकर सिद्ध होगा।

मन्त्र का सूक्ष्म परिचय।
# मननं_विश्वविज्ञानं_त्राणं_संसार_बंधनात् 
नाम -> एहलोक और परलौकिक, संसार में आने वाले सम्पूर्ण विघ्नबधाओं का समूल विनाश के लिए, ऋषिगण दिव्य बीजात्मक विश्वमनन कर, जिन विज्ञानमय शब्दों की सूत्रमय बीजाक्षरकृत करते हें, हे मन्त्र हे।
जिनके पृथक्-पृथक् ऋषि कहे जाते हैं।
सभी यंत्रों व मंत्रों के आदिसृष्ट स्वयं भगवान शिव हें।
जिन्होंने, मातापापवती व अन्यसिद्धों को, जिज्ञासात्मक संवाद के रूप में सृष्टि काल हेतु प्रकट किया।
भगवान शिव जब एकांत में भगवती माता पार्वती के साथ उपस्थित होते हें। तो संसार व साधकों की रक्षा व कल्याण के विषय में परस्पर सहभागिता करते हें। और लोकशंकानिवारणार्थ, परस्पर प्रश्न प्रवर्तन करते हें, कई विषयों पर भगवान शंकर ने भी भगवती से बात की।
यह संवाद भूरी भूरी प्रशंसनीय व वंदनीय हे।
आइए हम त्रैलोक्य मंगलकारी श्रीउमहेश्वर को प्रणाम करें।
एवं गुरुशिष्य परम्परा को, महानता प्रदान करने हेतु, भगवान श्रीदक्षिणामूर्ति स्वरूप धारण कर, सिद्धवटवृक्ष के मूल में स्थित पाषाणशिला पर चर्मासन पर विराजमान होकर, ब्रह्मा, नारायण सहित - सिद्धों, चारणों, देवों, यक्षों, बृहस्पति, भृगुनंदन शुक्र इत्यादि को दिव्यज्ञान से कृतार्थ करते हैं।
हम सर्वगुरु श्री दक्षिणामूर्ति भगवान को भी दण्डवत् प्रणाम करें।
जो समस्त ज्ञान के आदिमूल व कारक हें।

श्री भगवान के मुख से हि सभी वर्णमातृका प्रकट हुए। जो सर्व मंत्रों की फलधारिणी हे।
तन्त्र में शक्तियाँ (देवियाँ) का प्रभाव अत्यधिक हे।
इसी कारण तन्त्र शिवशक्तियम के साथ अत्यंत प्रभावी प्रभावीफलदायी कहा गया हे।
शिवशक्ति के परस्पर संवादात्मक संग्रह हि तन्त्रग्रन्थ हें। जो शिवशक्ति कृपा से अविभूत होकर साधकों के अभीष्ट की सद् हिरणी और कल्याण करते हें।
सर्वशक्तिमयी श्रीआद्य शक्ति जगदंबा हि तंत्रो की स्वामिनी मंत्रों का प्रभावरूपी तेज, और यंत्रों की जेटात्रि हे।
वह श्रीगणवती # ब्राह्मी_विष्णवी_माहेश्वरी आदि स्वरूपनाथ शक्तितन्त्र में साधकों के लिए कुलादि स्वरस्थ प्रकट हुई।
कुल ऐनक वालों द्वारा भेदक्रम के अनुसार प्रकट व अस्त हुई।
आद्यशक्ति के मुख्य दो कुल अतिसिद्ध व प्रभावी हुए,
• १ • # श्रीकुल और द्वितीय # कालाकुल।
यद्यपि दोनों कुलों का मूल एक हि हँ, गुरुदेव की आज्ञा के अनुसार उसका वर्णन किया जाने की योग्यता मुझे तुच्छबुद्धी के वश में नहीं - इसलिए “महमूर्तिरहिस” भेदन नहीं किया जा सकता (दोनों में प्रयोग व पद्धति भिन्न-भिन्न हे और मतों में भी) भिन्नता पाई जाती है)। 
जिस प्रकार श्रीशालिग्राम और शिवलिंग पर किसी भी देवता के निमित्तार्थ पूजन अभिषेक किया जा सकता है, हे 
वैसे ही भगवती # श्रीआद्यत्रिपुरसुंदरी_ललिताम्बा व श्रीयन्त्र पर भी किसी भी शक्ति (देवि) का अर्चन, पूजन, अभिषेक आदि किया जा सकता हे, 
# श्री_ललिताम्बा # श्रीकुल की गेहूंरात्र देवि हें।
सभी शक्तियाँ श्रीमठत्रिपुरसुंदरी_ललिताम्बा की हि मूर्तियों हें।
"श्रीकुल" के तीन मत हें।
• १ • "कादि"
• २ • "हादी"
• ३ • • "कहादि" 
उपर्युक्त तीनों मतों का काडी, 'हादी', और 'कहादि'का निष्कासन निम्न प्रकार है —'कादि' में मन्त्र के क 'अक्षर से प्रारम्भ होता है हे। 'हादी' में "ह" से और "कहादि" में 'कह' से प्रारम्भ होता है हे। "श्रीविद्या" का १५ अक्षरों का मन्त्र है।
वही की आराधना ३ मतों के अनुसार की जाति हे।
'काडी' मत के नव "प्रमुखग्रनाथ"।
• १ • चन्द्रज्ञान।
• २ • मंटका।
• ३ • सम्मोहन
• ४ • वामकेश्वर
• द • • बहुरूपाष्टक।
• इ • • प्रस्तारचिन्तामणि।
• • • मेरुप्रस्तार।
• • • सुन्दरीहृदय
• ९ • नित्यषोधोदिकर्णव।

# आदित्रात्र के अनुसार शक्ति के विविध रूपों की पूजा का विधान हे। इनमें 
'प्रथम' # स्थूलपूजा।
'II' # सूक्ष्मपूजा
'III' # परपूजा।

हे पैर होता है हे। अधिकांश "स्थूलपूजा" हि करते हैं।
इसमें मूर्ति या यन्त्र की पूजन की जाति हे। इस पूजन से सर्वोच्च सिद्धी-- मोक्ष की प्राप्ति होति हे।
पूजन का उद्देश्य अद्वैत-वेदान्त के लक्ष्य की प्राप्ति हि है।

# शैलतामहात्रिपुरसुन्दरी की पूजन में तीनों प्रकार का व्यवहार हे।
"स्थूल" में रूप, "सूक्ष्म" में यन्त्र और मन्त्र और "परा" में विषुवनी प्रजा हो हे। इस पूजा को 'कायिक' 'वाचिक' 'मानसिक' या 'बहिर्याग', 'अंतर्याग', ओर 'भावना' कहा जा सकता है। 
सद्गुरु के द्वारा क्रम से बाह्य बहिपूजा ’, ग अंतर्याग’ की ’भावना’ द्वारा परम लक्ष्य तक पहुँच जा सकती है। गुरु ओर नीलामियां सबका कारणभूत भगवती आद्याशक्ति हि है, इसमें कोई अंतर नहीं माना जा सकता है। 
शरीर के नवद्वारों में गुरु का स्थान हे। 
श्रीकुल शक्तिउ पासक साधकों का शरीर # श्रीयंत्राकार माना गया है।
जिसमें # नवयोनिचक्र भी कहते हैं। 
श्रीविद्या के उपासकों के लिए # श्रीचक्र उपासना अत्यंत अनिवार्य हे। "श्रीचक्र" पूजा का उद्देश्य इस अनुभूति को प्राप्त करना होता है कि 'ज्ञानाता' अर्थात् 'होता है', 'ज्ञान' अर्थात् 'स्थिर्य' ओर 'ज्ञानेय' या 'हवी' पृथक्-पृथक् न होकर एकम् हिं।
# त्रिपुरातापिनी "उपनिषद में 'कायिक' और 'वाचिक' उपासना का विधान विवरण है। 
# भावनोपनिषद् "में" भावना "और मानस कर्म का विधान निश्चित किया गया है।
यह "उपनिषद" का प्रारम्भ 
# श्री_गुरु: # सर्वकारणभूता_शक्ति: "और अंतर # भावनापरो_जीवन् मुक्तो_भवति" से हुआ है।
"शिरन्त्र" साधक के मानव शरीर का प्रतिनिधित्व करता है। यह अखिलविश्व में मनुष्य के साथ “शिव-शक्ति अर्थात् आत्मा का भी प्रतिनिधित्व करता है।

यह "श्रीदेवी" का प्रतीक है। उसका अपना स्वरूप हे। वह विश्वरूप में स्थित है। वही विश्वात्मा है। इस बिंदु पर "योगिनीहृदय" "नित्याषोधशिकर्णव" और "भावनोपनिषद्" का मत एक हि है।
आज के लेख में अन्य यंत्रों की अपेक्षा केवल 
# यन्त्र_राज_श्रीचक्र_श्रीन्त्रम् ”के विषय में हि एक विषय को प्राप्त करने के बारे में लिखने पर भी विषय अत्यंतन्त विस्तृत हो जाता है हे। किंतु आशा हे की शक्तिभक्तों हेतु अवश्य हितकर होगी। अब श्रीचक्र के 'दल', 'स्वरूप' 'नाम' आदि विषयक में संक्षिप्त महत्वपूर्ण बिंदु। 
"शिरन्त्र" का निर्माण दो स्तरों से होता है। बिंदु से प्रारम्भ कर के भूपुर तक निर्माण को शस्त्रिक्रम कहते हैं। और भूपुर से बिंदु-निर्माण को लयक्रम कहते हैं।
केंद्रीय बिंदु में # कामेश्वर_शिव व # कामेश्वरी_शिवा एकीभूत रहते हैं।
जिसे ललिता कहती हैं, और जो आत्मा है। जीवात्मा सशरीर है, और परमात्मा अशरीरी है। "कामेश्वर" सर्वोच्च संगीतबद्ध हे, जिसका कोई 'उपाधि' नहीं है। कामेश्वरी उनकी शक्ति है। # सर्वानंदमय_श्रीचक्र के मध्य में बिंदुस्थ है।
# शयनन्त्रचक्र नवयोनैतिक है इसका अर्थ विश्व का कारण # विश्वायोनी ”से है।
वह आद्या अंगीनित्या हि है, जो प्रकाशशिव की # नीलामिता है। 
"लौहित्यम् एतस्य सर्वस्य विमर्ष:" 
नाम - 'सर्वस्य' में "कामेश्वरशिव" "सुनीता" और आत्मा तीनों समाहित है।
यह # श्रीचक्र का संक्षिप्त वर्णन था।

मन्त्रसिद्धों के षोडश लक्षण -
नाटिद्वेषो नाटिरागो, नाति भोगेषु संगतिः।
नातिशोको नतिहर्षो, नातिस्नेहो न मत्सरः ।।
नातिव्यसनवर्त्तित्वं, सुखिता क्लिष्टकारिता। स्वेबलमुन्यान्नेच्छा, परचिंताविवर्जितं ।।
एकरुप्यं लाभान्यो:, सद् सन्तुष्टचित्तता।
भोक्तत्वं शक्तितो दान, मिति सिद्धस्य लक्षणम् ।।
अर्थात् — न अति द्वेष करना, न अति प्रेम करना, न अति भोग में संलग्न रहना, न अति शोक करना, न अति हर्ष करना, न अति स्नेह करना, न अति ईर्ष्या करना, न अति व्यसनी होना, दुःख देने वाला - विमुख रहना , न अपने दैहिक सुख की अर्थशास्त्रामात्र रखना, पर-चिन्ता न करना, लाभ और हानि में समभाव से रहना, सदैव सन्तुष्ट रहना, शक्ति के अनुसार भोग भोगना, और दान करना- यह आइ सिद्धिवचन आश्रय के लिए 
१६ लक्षण कहे गए हैं।
 .. अर्धविराम ।।
आज के लेखन में विषय की सम्पूर्णता होति प्रतीत नहीं होति, क्यूँ की फोन में अत्यधिक लेखन में शब्दों का क्षोभ होने लगा है, मन्त्रविज्ञान के विषय में संपूर्ण विवरण अगले-भाग के रूप में शीघ्र प्रस्तुत करने का प्रयास होगा।

# जयति_ब्रह्मास्त्रविद्या__



मन्त्र विज्ञान

मन्त्रविज्ञान_यंत्रमहिमा_तन्त्रयुक्ति_सर्वविद्यावर्णन_भाग 2 ....

। श्री गुरुगणेभ्यो नम:।

विशेष: - यह लेख साधकों, ऐड आध्यात्मिक-छात्रों, भक्तों और अद आध्यात्मिक जगत् में रुचि रखने वाले भगवत् प्रेमियों के लिए हि प्रस्तुत किया जा रहा हे जो की # मन्त्रविज्ञान के सम्पूर्ण अंग-प्रत्यंग, क्रिया व विधान को विस्तृत रूप में वर्णित किया गया है। जो की साधकों हेतु अत्यावश्यक है यद्यपि यद्यपि गुरु आज्ञा के बिना कोई साधना व क्रिया फलीभूत नहीं होती। किंतु जो गुरुमुखी हैं उनके लिए यह जानकारी निश्चित रूप से सहायक होगी।

प्रथम # सर्वमन्त्र_भूतिणी_श्रीसिद्धमातृका_भयहरिणी_विद्या की स्तुति करते है। जिनकी कृपा से मन्त्र व सिद्धियाँ सहजरूप में 
प्राप्त हो जाति हे। और अविद्या दूर हो जाती है। 

                  । श्रीसुद्महाविद्या_स्तुति:।

गणेशग्रहनक्षत्रयोगिनीराशिरूपिणीम्।
          दसवीं मन्त्रमयी नौ नौ मातृकँ ​​पीठरुपनिम् ।११ ।।
अर्थ: - गणेशरूपिणी, ग्रहापुनी, नक्षत्ररूपिणी, योगिनीरुपिणी, योगिनीरुपिणी, राशीरुपिणी, पीठरुपिणी मन्त्रमयी देवी श्रीसिद्धमहाविद्या की स्तुति करती है।

प्रणमामि महदेवीं मातृकं परमेश्वरीम्।
         कालहल्लोहलोल्लोलक पूर्णशमकारिणीम् ।।२ ।।
अर्थ: - कालवेग के आक्षेप-निक्षेप से कृत जो बंधन है, उसका समूल विनाश करने वाली परमेश्वरी सिद्धमहाविद्या परमेश्वरी माताका को प्रणाम करता हूँ।

यदक्षरैकतनतेऽपिं संसिद्धे स्पर्यते नरः।
             रवितरक्षणेन्दुकन्दप्रशंकरानलविष्णुभि: ।।३ ।।
जिस मातृका की एक अक्षर की भी सिद्धी प्राप्त हो जा रही है, साधक सूर्य, गरुड़, चन्द्र, कामदेव, शंकर, और विष्णु का देवींदी हो जाता है।
उस सिद्धमविद्या की में वंदना करता हूँ।
तृतीय श्लोक की "विरोधी" शब्द आने के कारण 'व्याख्या' अनिवार्य हो जाति हे। जिससे की शंका उपस्थित न हो।
# भावार्थात्मक-व्याख्या-> मदका के एक हि अक्षर की सिद्धी हो जाने पर साधक # सूर्य के समान तेजस्वी, यशस्वी, प्रभावशाली हो जाता है। # गरूड़ के समान दृष्टिपात-मात्र से विषनाश करने में समर्थ हो जाता है। # चन्द्रमा की भाँति समस्तप्राणी-वर्ग को प्रसन्नता प्रदान करने वाला अमृतमय हो जाता है। # कामदेव के समान जड़-चैतन्य सभी भूतों में विक्षोभ उत्पन्न कर अपने अधीन करने में समर्थ हो जाता है।
# शंकर के समान श्रेयस्कर, अजेय, सर्वतत्व विवेकता, कालजयी, सर्वभद्रमयी हो जाता है।) # विष्णु के समान सर्वपालक (शरणागत-पालक) मोक्ष-अधिकारी भयहीन और सर्वपूज्य हो जाता है।

यदित्यशशिज्योत्स्मण्डितं भुवनत्रयम्।
              वन्दे सर्वेश्वरीं दसवीं महाश्रीसिद्धमाताक्ष् ।।४ ।।

अर्थ: - जो माताका के आह्लादकारी, संतापशास्त्रीय अक्षरसमूह द्वारा भुवनत्रय अलंकृत हैं। उन सर्वेश्वरी देवी महाश्रीसिद्धमातृका की में वन्दना करती हूँ।

यदक्षरमहासूत्रप्रोदमतेत् जगत्त्रयम्।
         ब्रह्माण्ड़ादिकटाहंतं तां वन्दे सिद्धमातृच्छ्।।५ ।।
अर्थ: -जिस माताका के अक्षररूप महसूत्र द्वारा “ब्रह्माण्ड” से लेकर कटहपर्यन्त यह जगत्त्रय ग्रंथित है, उन सिद्धमातृका की में वन्दना करता हूँ।

यदेकादशमाधारं बीजं कोणत्रयोद्भवम्।
              ब्रह्माण्ड़ादिकटाहन्तं जगदद्यापि दृश्यते ।।६ ।।
अर्थ: - आप मटका का एकादश अक्षर "ए" त्रिकोण से उद्भूत है।
यही है- ब्रह्माण्ड़ादि कटहंत जगत्त्रय का 'आधार-बीज' 
यही जगत् में आज भी लक्षित होता है, व सर्वदा लक्षित होता है।

अकचदिततोन्नद्धपयशाक्षरगणनिम्।
             ज्येष्ठांगबाहुपादाग्रामध्यसवनत्निवासिनीम् ।।ा
अर्थ: - # अ_क_च_ट_त_प_य_श- यह अष्टवर्गशती शिव के बाहुद्वय, अग्रद्वय, अग्र, मध्य में “स्वानारूपी” अष्ट मन्दिरों में निवास करने वाले श्रीसिद्धवर्णमातृका को प्रणाम करता है।

तमीकरैसोद्धारं सारात्सरं परपराम्।
                   प्रणमामि महादेव परमानन्दरूपिणीम् ८ ।।
अर्थ: - "ई" काराक्षरोद्धारा सभी सारों की सार परमानन्दरूपिणी श्रीसिद्धमातृका को प्रणाम करता हूँ।

अद्यापि यस्या जानन्ति न मनागपि देवताः।
              केय कस्मात क्व केनेती सरूपारुस्पम ।9 ।।
अर्थ: - "अनादिकाल '' से लेकर वर्तमान-वर्तमानन्त तक जिसके स्वरूप-भावना और अरूप-भावना देवतागण भी स्वल्पमात्र नहीं जान पाए कि" ये "कौन हैं, कहाँ से उत्पन्न होते हैं, कहाँ रहते हैं, किसके साथ रहते हैं? आप आप खोज के लिए भी देवी श्रीसिद्धमातृका को प्रणाम करते हैं।

वन्दे तमहमक्षय्यमकारक्षररूपिणीम्।
            दसवीं कुलकोल्लोलोपोल्लसन्तीं परं शिवाम् ।।१० ।।
अर्थ: - 'क्षेत्र' कार रूपा क्षयरहिता "अ" कारा पूर्णाराक्षरा, 'कुलाविक' के उल्लोल से प्रोल्लसिता श्रीसिद्धमातृका परादेवी शिवा की वन्दना करता हूँ।

वर्गानुक्रमयोगेण यस्यां श्रष्टकंठम्।
                  वन्दे तमस्तवर्गोत्थाम् शास्त्रध्यत्केश्वरीम्।।११ ।।
अर्थ: - माताका के अष्टवर्ग # अ_क_च_त_त_प_य_श में अष्टमातृका स्वरूप —वशिनी-कामेश-मोहिनी (मोहिनी) -विमला-अरुण-जयनी-सर्वेशी-कौलिनी। में अवस्थिता अष्टवर्गोत्तिथा अमानीम अष्टसिद्धी की अधीश्वरी श्रीसिद्धमातृका महादेवी की वन्दना करता हूँ।

कामपूर्णजाराध्याश्रीपीठान्तर्निवासिनीम्।
                    चतुरा बुद्धिकोशभूतां नौमि श्रीत्रिपुरामहम् ।।१२ ।।
अर्थ: - कामरूप, पूर्णगिरि, जालन्धर और उड्डियानुरुपी चतु: पीठनिवासिनी चतुराज्ञा कोषभूता श्रीसिद्धमातृका महाविद्या महात्रिपुरा के श्रीचरणों को प्रणाम करता है।

इस स्तुति को प्रत्येक साधक को अवश्य करना चाहिए।
इससे वर्णमातृका पसन्न होकर मन्त्रजागृति की कृपा करती है।

साधक-उपासक को सद् हि गुरुवर्त्त मंत्रों का विधिवत पुरश्चरण का अनुष्ठान अवश्य ही करना।

जीवो हीनो यथा देह: सर्वकर्मसु न क्षम :।
पुरश्चरणहीन और मन्त्र: प्रकीर्तित: ।।
अर्थ: - जैसे आत्मा से विहीन यह शरीर किसी भी कर्म को करने में असमर्थ होता है।
उसी प्रकार पुरश्चरण हीन मन्त्र भी फल प्रदान करने में असमर्थ हो जाता है।
               # पुरश्चरण_कब_ और_कैसे_करें? 
चन्द्रताराेनुकूले च शुक्लपक्षे विशेषतः।
         पुरश्चरणक कुर्यान्मन्त्रसिद्धिः प्रजायते।
स्वस्तिवाचनकं कुर्यान्नंगदिशादधं यथा विधि: ।।

अर्भ दिनमारभ्य समापनदिवसावधि।
न छोटं नातिरिक्तं च जपं कुर्यद्दिनेदिने ।। (म.महा।)

अर्थ: - चन्द्रतारा के अनुकूल होने वाले विशेष रुपेण शुक्लपक्ष में पुरश्चरण प्रारम्भ करना चाहिए। यह मन्त्रसिद्धी में सहायक होता है। आरम्भ में स्वस्तिवाचन व नान्दी श्राद्ध भी विधिपूर्वक करना चाहिए।
जप आरम्भ करने के दिन से लेकर समाप्ति के दिन तक मन्त्र का जप समान होना चाहिए। जप की संख्या किसी भी दिन न तो कम हो न हि अधिक।
(गुरुपरम्परा मत सम्प्रदाय विद्या या साधना के आधार पर मन्त्र विविधताी के भिन्न होने पर इसमें परिवर्तन हो सकता है-यह गुरुआज्ञा के अनुसार करें) 

मंत्रों के नाम का वर्णन ।।
• १ • ॐ प्रणव है। यह स्वयमेव हि पूर्ण है # ब्रह्मसूचक।
विभिन्न मतों में सिद्धों नें मायाबीज (शक्तिबीज) को भी "प्रणव" की उपमा दी गई है। प्रणव और माया दोनों हि सर्व नेताओं-उत्कीलक कहे गए हैं।
• 2 • # एकाक्षरी को बीजमन्त्र कहा जाता है।
(तांत्रिक-मतों में भी भिन्नता पाई जाती है)

• ३ • दो से बीस अक्षरों के मंत्रों को अर्णवमन्त्र और अक्षीय लक्षण कहा जाता है।
जैसे "पंचाक्षरी", "नवार्ण", "दस्मशाक्षरी" और "विंशक्षक्षरी।"

विष्णत्यर्नाधिका: मन्त्र: ग्रंथिसा: प्रकीर्तित:।

बीस वर्ण (अक्षर) से निन्यानवे वर्ण वाला मन्त्रभूमि मन्त्र कहा जाता है।
पुनः सौ से सहस्त्र के चरित्र वाले मंत्रों को मालारीयक्षरीय महामन्त्र कहा जाता है, उसी के मध्य "युगाक्षरमंत्र" इत्यादि मन्त्रों का समाविष्ट है।
सहस्त्राऽधिक से दशसहस्त्रा पूर्वक्षर से पूर्व को कल्पमन्त्र कहा जाता है।
दशसहस्त्रों के मन्त्र को आयुताक्षरमन्त्र ने कहा है।
इसका अंतर नहीं यह परावर्त कारण-कारक है।
इनसे अधिक अक्षरमन्त्रों का जप पूर्वकाल में केवल दीर्घयुओं के द्वारा हि किया गया है। आज के युग में कद अन्य सम्भव प्रतीत नहीं होता।

यथा सभी मंत्रों के आदिसृष्ट भगवानशिव हि हैं।
वैसे ही हिल्स गुरु को शिवस्वरूप जानकारी स्वहितार्थ प्रदत्त मन्त्र का सिरता हि जानें।
योग्य गुरु स्वयं के मन में परिक्षार्थ सन्देह की सृष्टि करते हैं (भ्रम, ईर्ष्या, संदेह)।
यदि चेलों की मती मलीनता को प्राप्त न कर शुद्ध हि बनी रही वह आशीर्वादी अवश्य अवश्य हिमगुरूकृपापात्र हो जाती है।
गुरु के प्रसन्न होने शक्तिपात द्वारा शिष्य सदा के लिए अनुग्रहित होकर सर्वत्र पूज्य हो जाता है।
यह भगवान शिव के वाक्य हैं।
मन्त्र भी गुरुमूर्ति हि जानें।

यथा देवे और मन्त्रे यथा मन्त्रे और गुरौ।
              यथा गुरौ और स्वात्मन्येवं भक्तिक्रम: प्रिये ।।
भगवान शिव कहते हैं।
हे प्रिये पार्वती! साधनाकाल में शिष्य को यह धारणा करनी चाहिए की ”- जैसे देव हैं वैसे मन्त्र हैं। जैसा मन्त्र है उसी हि गुरुदेव हैं। जैसे गुरुदेव हैं वैसा हि में हूँ, अर्थात् देवता, मन्त्र, गुरु ओर शिष्य में कोई अन्तर नहीं है। चारों नाम तो भिन्न-भिन्न हैं वस्तुतः एक श्याम हि हैं। 

शिष्य (सफाई कर्मचारी) विशेष सावधानी :::::

असत्यं न वदेदग्रे न बहु: प्रलपदेपि।
               कामं स्वभाव और लोभं मानं प्रहसनं स्तुतिम् ।।
न कुर्याद् गुरूणा सार्धांस्यो भू विष्णु: क्षिपे।
              यतो गुरु: शिव: अनुभवी दत्त स्तुवन् प्रणमं भजेत् ।।

सिद्धी (काल) के इच्छुक, गुरु से और गुरु के समक्ष कद अन्य असत्य भाषण न करें। न हि अधिक बोलें। 
काम, स्वभाव, लोभ, मान, प्रहसन, चपलता, स्वमहिमंदन, अनर्गलवार्ता, न करें। क्यूँ की चेलों के लिए गुरु हि अनुभवी शिव होते हैं। उनकी वंदना करनी चाहिए उन्हें प्रणाम करना चाहिए और सदैव एम्पगुरूदेव की सेवा में तत्पर रहना चाहिए उसी के द्वारा प्रदत्त मन्त्रों के बारे में जप करना चाहिए।

# मन्त्रों_का_स्वरूप_निर्णय ...
• १ • सिद्ध- सिद्धमन्त्र जप की निर्धारित संख्या में जप करने से सिद्ध होता है।
• २ • यूसिद्ध- यूसिद्धमन्त्र निर्धारित संख्या से आधे जप से सिद्ध हो जाता है।
• ३ • सिद्धारि-सिद्धारिमन्त्र तस्य्य होता है, क्यूँ की यह बंधनव नाशक होता है।
• ४ • साध्यसिद्ध- साध्यसिद्धमन्त्र निर्धारित संख्या से दुगने जप से सिद्ध होता है।
• ५ • साध्य-साध्य- साध्य-सा लिंगन्त्र निरर्थक होता है अनेकों पुरश्चरण पर भी नहीं होता।
• इ • • साध्यसुसिद्ध- साध्यसुसिद्धमन्त्र का दुगना जप करें।
• • • साध्यारि- साध्यारिमंत्र तत्र्य है यह गौत्रगुण नाशक होता है।
• • • यूसिद्धसिद्ध- यूसिद्धसिद्धमन्त्र मध्य संख्या में सिद्ध हो जाता है।
• ९ • यूसिद्धसाध्य- यूसिद्धसा एंडन्त्र की दुगनी संख्या जप से।
• १० • यूसिद्धसुसिद्ध- यूसिद्धसुसिद्धमन्त्र केवल दीक्षामात्र से सिद्ध हो जाता है-किंतु इसकी प्राप्ति गुरुकृपा पर निर्भर करती है। 
• ११ • यूसिद्धारि- यूसिद्धारिमन्त्र तस्य्य है यह कुतुम्ब का नाशक होता है।

• १२ • अरिसिद्ध- अरिसग्नमन्त्र जप से पुत्र का नाश होता है।
• १३ • अरिसाध्य- अरिसा चंद्रन्त्र से कन्या का नाश होता है।
• १४ • अरिसुसिद्ध- अरिसुसिद्धमन्त्र पत्नीनाशक होता है।
• १५ • अरिअरि- अरिअरिमन्त्र स्वयं साधक की मृत्यु (अकाल-मृत्यु) करने वाला हे।

सभी साधक इनका भलीभाँति विचार कर हि मन्त्रजप करें।

# सापर_ऋणी_मन्त्र सर्वदा शुभकारी व तत्क्षण सिद्धी प्रद कहे गए हैं।

पूर्वजन्मकृताभ्यासे पापादस्याफलाप्तिकृत्।
पापे नष्टे फलावाप्ति: काले देहक्षयत्ऋणी।
मन्त्र: संबं क्षत्रंतेन प्राक्तन: सिद्धये भवेत् ।।

अर्थ: - पूर्वजन्म में किए गए जप का फल पापों के कारण नहीं मिलता है। पाप के नष्ट हो जाने पर फल प्राप्त होता है, पूर्वजन्म में साधक की आयुपूर्ण होने पर देहंत होता है, तो किए गए जप साधक के ऋणी हो जाते हैं।
सद्गुरु द्वारा मन्त्र प्राप्त होते ही पूर्व जप फलित हो जाता है।
शीघ्र सिद्धी प्राप्त हो जाती है।
# किंतु ... प्राप्ति गुरुमुख से होनी चाहिए।

सिद्धान्तों गुरोर् परा मंत्रो यः सिद्धिभाड्नरः।
लक्ष्मीमदनादारण मन्त्रे भोगमवाप्तवान् ।।
सन्मन्त्रस्य ऋणीयन्ययो भतान तस्य पूर्वगम्।
तस्मात् ऋण: विशुद्धिस्त्या कार्या सर्वैश्च सर्वदा ।।

अर्थ: - गुरु से प्राप्त मन्त्र के जप से हि सिद्धि प्राप्त होती है। मनुष्य सिद्ध हो जाता है। लक्ष्मीक्ष्मी जी की कृपा से साधक को भावनाओं और मन्त्र से भोगों की प्राप्ति होती है।
गुरुपूर्णत्त सत् मंत्रों को ऋणी जानकर जप करना चाहिए। विशुद्ध ऋणी मन्त्रों से सभी कार्य अनुक्रम होते हैं। साधकों को मन्त्रों के ऋणी-धनी विचार कर जप करना चाहिए।

# मन्त्र_स्वभाव_गुण_तदुपरान्त_अक्षमाला_निर्णय .......

रुद्राक्षैरपि पद्मक्षै: पुत्रजीव: कुचन्दनै:।
स्ताटिकैश्च प्रवलम्श्च मौक्तिकैर्हेम निर्मितैः ।।
राजतैर्जपला संकेतत् पूर्वं फलेद्गुरुः।
आदिक्षतीनारसैः छायादक्षला यथार्थत: ।।

अर्थ: - सभी मालिकाओं में व सर्वऽुष्ठान में # रुद्राक्ष माला का प्रथम स्थान है। # रुद्राक्षमालिका का प्रत्येक देव-देव जप में उत्कृष्ट माना गया है।
रुद्राक्ष से कम फलद # पद्मबीजमालिका (कमलगट्टे) की माला का प्रभाव होता है।
पद्मबीज से कम # पुत्रजीवमाला (गोफल) का महत्व है।
पुत्रिव से कम # रक्तचंदनमालिका का महत्व है।
रक्तचन्दन से कम # स्फटिकमालिका का महत्व है।
स्फटिक से कम # प्रवालमालिका (मूंगे) का महत्व है।
मूंगे से कम # मौक्तिकमालिका (मोती) का महत्व है।
मोती से कम # स्वर्णमालिका सोने का महत्व है।
सोने से कम # राजामालिका का महत्व है।

# करमाला और अन्य भी कई # अक्षमालाओं में भिन्न-भिन्न साधनाओं में अपना स्वयं का विशेष महत्व होता है।
सबका वर्णन सम्भव नहीं।

# मन्त्रविज्ञान व उनकी महिमा अप्रमेय, अवर्णनीय व अपरम्पार है।
जैसा लेखन चाहे करें न तो पूर्णता हो पाती है, न हि तृप्ति।
पुनः प्रतीत होता है कि हे के लेख को पूर्ण कर पाना दोषकर होगा।
कुछ मुख्य विषयों का उल्लेख कर विश्राम पश्चात पुनः # तृतीय श्रेणी के द्वारा उपरोक्त विषय की पूर्णता होगी।

             .. षट्कर्म हेतु अनिवार्य छःविन्यास ।। 

आदौ योगो भवेदन्ते पल्लव: सम्पुटो द्ययो:।
वनारनं तु ग्रन्थनं विदर्भोद्वयन्त्रकृतः ।।

• १ • नाम के आगे मन्त्र लगाने को # योग कहता है।
• २ • मन्त्र के बाद मन्त्र लगाने को # पल्लव कहते हैं।
• ३ • नाम के पूर्व ओर अंत में मन्त्र लगाने को # सम्पुट कहते हैं।
• ४ • मन्त्र के एक अक्षर के बाद नाम का एक अक्षर, पुनः मन्त्र का एक अक्षर और पुनः नाम का एक अक्षर के विन्यास को # ग्रंथन कहते हैं।
• ५ • विदर्भ-प्रारम्भ में मन्त्र के दो अक्षर फिर नाम का एक अक्षर इस प्रकार बारम्बार मन्त्र और नाम के अक्षर के विन्यास को # विदर्भ कहते हैं।
• आइए • बोधन-नाम के आड़िए मध्य और अंतर में मन्त्र लगाने को बोधन कहते हैं।

मन्त्रदोष जानकर उसका निराकरण करें। 
अन्यथा # गुरु_ऋषि दोनों का शीघ्रमरण हो जाता है।
     
                       .. मन्त्रों के २५ दोष ।।

• १ • # दग्ध- मन्त्रक्षरों के अतिरिक्त वर्ण "यो, ई, या, यो" लगाकर उच्चारण करना।
• २ • # त्रस्त- उपदिषत मन्त्र के साथ अन्य देवों के मन्त्र का जप करना।
• ३ • # अभिहित- जो मन्त्र विधिवत् प्राप्त न हो।
• ४ • # शत्रु- सिद्धादि चक्र के अनुसार वैरिमन्त्र का जप।
• ५ • # बाला- औंस के समय के साथ के ह्रस्व का उच्चारण करना।
• आइए • # निर्जिता- साधक के पूर्व जन्म के दुखों की 
दबदबा होना
• • • # वृद्ध- ह्रस्व के स्थान पर दीर्घकालीन करना।
• • • # अंहसा- मन्त्रक्षरों में 'हकार और' स'कार का न होना।
• ९ • # सत्वविजिता- बलहीन मन्त्र का जप करना। 
• १० • # अपूर्ण_रूपा- जप के समयकाल वाचन करना।
• ११ • # छिन्ना- सर्वव विहीन देशनार का प्रभाव।
• १२ • # स्तम्भिता- गुरूमत के विपरीत साधक का अपना अभिमत जोड़ना।
• १३ • # सानुनासिका- नकारादि के साथ उच्चारण।
• १४ • # सुप्तमन्त्र- अकालविनियोगेन प्रबोध स्वापगा जप। (प्रत्य नासा प्रवाह के बिना मन्त्रजप सुप्तमन्त्र कहा गया है) 
• १५ • # मत्ता: - पुस्तक में बिना गुरु उपदेश के मन्त्र जप को देखकर।
• १६ • # रुख_निवारिता- सन्धिविहीन बिना जप।
• १ • • # कीलिता- मन्त्र ओर साधक के नाम-साम्य या विचारे बिना मन्त्र का जप।
• १ • • # प्राप्तु: खा- गुरुपश्च मन्त्र के साथ अन्य देवता का मन्त्रजप या सिद्धु चक्र।
• १ ९ • # खण्डीभूता- न्यासादि के बिना मन्त्र जप।
• २० • # हीनवीर- विधिवत जिसका उपदेश न हो।
• २१ • २ # कुण्ठित_अकार्यकरत्व –सिद्ध भी विनियोग विनियोग विहीनता के बिना अकार्यकारी कुणठित हि हो जाता है।
• २२ • # क्लिष्टता- मन्त्रावर्तन में विलम्ब से उच्चारण।
• २३ • # रुग्ण: - प्रताप, अयोग्य, आलापपूर्वक जप।
• २४ • # उपेक्षा- मन्त्र परित्याग करना। गुरपक्षी कल्प के साथ अपना मत सहित जपना।
• २५ • # वैषम्यता- मन्त्र देवता के जप-पूजा में विषमता।

ये २५ दोषों का निवारण केवल गुरु जी कर सकते हैं।
दोषों मुक्त मंत्र का जप हि सिद्धिप्रद होता है।

भाग क्र .3 में साफ करने वाला सम्पूर्ण
 न्यास, मुद्रा, नियम, आसन, शुद्धि, कला, जप विधि और सभी विधान के साथ उपरोक्त विषय की सम्पूर्णता / प्रयास होगा।
आगे श्री_बलवती की इच्छा__

# साधकों_हेतु_सप्रेम_समर्पित ।।

# जयति_ब्रह्मास्त्रविद्या ___

रुद्राक्ष क्या है

रुद्राक्ष क्या है ????
रुद्राक्ष शिवजी के आशु है रुद्राक्ष यानि रुद्र+अक्ष, रुद्र अर्थात भगवान शंकर व अक्ष अर्थात आंसू। इस संधि विच्छेद से यह साफ पता चलता है कि इसकी उत्पति भगवान शंकर की आंखों के आंसू से हुई है। मान्यता है की एक समय भगवान शंकर ने संसार के उपकार के लिए सहस्र वर्ष तप किया। तदोपरांत जब उन्होंने अपने नेत्र खोलें तो उनके नेत्र से अश्रु की चन्द बूंदें पृथ्वी पर गिर गई। इन बूंदों ने रुद्राक्ष वृक्ष का रूप धारण किया।

रुद्राक्ष दो जाति के होते हैं- रुद्राक्ष एवं भद्राक्ष। रुद्राक्ष के मध्य में भद्राक्ष धारण करना महान फलदायक होता है
श्रीश्री बगलामुखी सर्वतन्त्रसाधना ज्योतिष
  1. 9328211011

शिव तांडव

शिव ताण्डव स्तोत्र
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्यलम्बितां
भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिवो
शिवम् ॥१॥
जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिंपनिर्झरी
विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं
ममं ॥२॥
धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुरस्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद
मानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे
मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥
जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदांधसिंधुरस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं
बिंभर्तुभूतभर्तरि ॥४॥
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी
विधूसरांघ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालयानिबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥
ललाटचत्वरज्वलद्धनंजयस्फुलिङ्गभा
निपीतपंचसायकंनमन्निलिंपनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वलद्धनंजया
धरीकृतप्रचंडपंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनीकुचाग्रचित्रपत्रकप्रकल्पनैकशिल्पिन
ी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥
नवीनमेघमंडलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्कुहुनिश
ीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं
जगंद्धुरंधरः ॥८॥
प्रफुल्लनीलपंकजप्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि
प्रबंधकंधरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं
भजे ॥९॥
अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह
माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥
१०॥
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजंगमस्फुरद्धगद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल
हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदंगतुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः
शिवः ॥११॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकमस्रजोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः
सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा
सदाशिवं भजे ॥१२॥
कदा निलिंपनिर्झरी निकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा
शिरःस्थमंजलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा
सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥
निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-निगुम्फनिर्भक्षरन्म
धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां
चयः ॥१४॥
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय
जायताम् ॥१५॥
इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन् ब्रुवन्नरो
विशुद्धमेति संततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहनां सुशंकरस्य चिंतनम्
॥१६॥
पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भूपूजनपरम्
पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव
सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥
॥ इति रावणकृतं शिव ताण्डव स्तोत्रं संपूर्णम्

बगलामुखी कवचम् (रुद्रयामले)

बगलामुखी कवचम्
बगलामुखी कवचम् (रुद्रयामले)।। श्री
भैरवी उवाच ।।
श्रुत्वा च बगलापूजां स्तोत्रं चापि महेश्वर ।
इदानीं श्रोतुमिच्छामि कवचं वद मे प्रभो ।। १ ।।
वैरिनाशकरं दिव्यं सर्वाऽशुभविनाशनम् ।
शुभदं स्मरणात् पुण्यं त्राहि मां दुःखनाशन ।। २ ।।
।। श्रीभैरव उवाच ।। कवचं श्रृणु वक्ष्यामि भैरवि प्राणवल्लभे ।
पठित्वा धारयित्वा तु त्रैलोक्ये विजयी भवेत् ।। ३ ।।
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीबगलामुखी कवचस्य
नारद ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीबगलामुखी देवता, लं
बीजं, ईं शक्तिं, ऐं कीलकम्, पुरुषार्थ-चतुष्टये जपे
विनियोगः ।
।। मूल-पाठ ।। शिरो मे बगला पातु हृदयमेकाक्षरी परा ।
ॐ ह्रीं ॐ मे ललाटे च बगला
वैरिनाशिनी ।। ४ ।।
गदा-हस्ता सदा पातु मुखं मे मोक्षदायिनी ।
वैरिजिह्वा धरा पातु कण्ठं मे बगलामुखी ।। ५ ।।
उदरं नाभिदेशं च पातु नित्यं परात् परा ।
परात् परतरा पातु मम गुह्यं सुरेश्वरी ।। ६ ।।
हस्तौ चैव तथा पातु पार्वती परिपातु मे ।
विवादे विषमे घोरे संग्रामेरिपु-संकटे ।। ७ ।।
पीताम्बरधरा पातु सर्वांगं शिव-नर्तकी ।
श्री-विद्या समयं पातु मातंगी पूरिता शिवा ।। ८ ।।
पातु पुत्रं सुतां चैव कलत्रं कालिका मम ।
पातु नित्यं भ्रातरं मे पितरं शूलिनी सदा ।। ९ ।।
रन्ध्रे हि बगलादेव्याः कवचं मन्मुखोदितम् ।
न वै देयममुख्याय सर्व-सिद्धि-प्रदायकम् ।। १० ।।
पठनाद् धारणादस्य पूजनाद् वाञ्छितं लभेत् ।
इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेद् बगलामुखीम् ।। ११ ।।
पिवन्ति शोणितं तस्य योगिन्यः प्राप्य सादराः ।
वश्ये चाकर्षणे चैव मारणे मोहने तथा ।। १२ ।।
महाभये विपत्तौ च पठेद् वा पाठयेत् तु यः ।
तस्य सर्वार्थसिद्धिः स्याद् भक्तियुक्तस्य पार्वति ।। १३ ।।
।। श्रीरुद्रयामले श्रीबगलामुखी कवचम् ।।
श्रीबगला त्रैलोक्य-विजय कवचम्
।। श्री भैरव उवाचः ।। श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि स्व-रहस्यं च
कामदम् ।
श्रुत्वा गोप्यं गुप्ततमं कुरु गुप्तं सुरेश्वरि ।। १ ।।
कवचं बगलामुख्याः सकलेष्टप्रदं कलौ ।
तत्सर्वस्वं परं गुह्यं गुप्तं च शरजन्मना ।। २ ।।
त्रैलोक्य-विजयं नाम कवचेशं मनोरमम् ।
मन्त्र-गर्भं ब्रह्ममयं सर्व-विद्या विनायकम् ।। ३ ।।
रहस्यं परमं ज्ञेयं साक्षाद्-मृतरुपकम् ।
ब्रह्मविद्यामयं वर्म सर्व-विद्या विनायकम् ।। ४ ।।
पूर्णमेकोनपञ्चाशद् वर्णैरुक्त महेश्वरि ।
त्वद्भक्त्या वच्मि देवेशि गोपनीयं स्वयोनिवत् ।। ५ ।।
।। श्री देव्युवाच ।।भगवन् करुणासार विश्वनाथ सुरेश्वर ।कर्मणा
मनसा वाचा न वदामि कदाचन् ।। १ ।।
।। श्री भैरव उवाच ।।त्रैलोक्य विजयाख्यस्य कवचास्यास्य पार्वति ।
मनुगर्भस्य गुप्तस्य ऋषिर्देवोऽस्य भैरवः ।। १ ।।
उष्णिक्-छन्दः समाख्यातं देवी
श्रीबगलामुखी ।
बीजं ह्लीं ॐ शक्तिः स्यात् स्वाहा
कीलकमुच्यते ।। २ ।।
विनियोगः समाख्यातः त्रिवर्ग-फल-प्राप्तये ।
देवि त्वं पठ वर्मैतन्मन्त्र-गर्भं सुरेश्वरि ।। ३ ।।
बिनाध्यानं कुतः सिद्धि सत्यमेतच्च पार्वति ।
चन्द्रोद्भासितमूर्धजां रिपुरसां मुण्डाक्षमालाकराम् ।। ४ ।।
बालांसत्स्रकचञ्चलां मधुमदां रक्तां जटाजूटिनीम् ।
शत्रु-स्तम्भन-कारिणीं शशिमुखीं
पीताम्बरोद्भासिनीम् ।। ५ ।।
प्रेतस्थां बगलामुखीं भगवतीं कारुण्यरुपां भजे ।
ॐ ह्लीं मम शिरः पातु देवी
श्रीबगलामुखी ।। ६ ।।
ॐ ऐं क्लीं पातु मे भालं देवी
स्तम्भनकारिणी ।
ॐ अं इं हं भ्रुवौ पातु क्लेशहारिणी ।। ७ ।।
ॐ हं पातु मे नेत्रे नारसिंही शुभंकरी ।
ॐ ह्लीं श्रीं पातु मे गण्डौ अं आं इं
भुवनेश्वरी ।। ८ ।।
ॐ ऐं क्लीं सौः श्रुतौ पातु इं ईं ऊं च परेश्वरी ।
ॐ ह्लीं ह्लूं ह्लीं सदाव्यान्मे नासां
ह्लीं सरस्वती ।। ९ ।।
ॐ ह्रां ह्रीं मे मुखं पातु लीं इं ईं छिन्नमस्तिका
ॐ श्री वं मेऽधरौ पातु ओं औं दक्षिणकालिका ।। १० ।।
ॐ क्लीं श्रीं शिरसः पातु कं खं गं घं च सारिका ।
ॐ ह्रीं ह्रूं भैरवी पातु ङं अं अः
त्रिपुरेश्वरी ।। ११ ।।
ॐ ऐं सौः मे हनुं पातु चं छं जं च मनोन्मनी ।
ॐ श्रीं श्रीं मे गलं पातु झं ञं टं ठं
गणेश्वरी ।। १२ ।।
ॐ स्कन्धौ मेऽव्याद् डं ढं णं हूं हूं चैव तु तोतला ।
ॐ ह्रीं श्रीं मे भुजौ पातु तं थं दं वर-
वर्णिनी ।। १३ ।।
ऐं क्लीं सौः स्तनौ पातु धं नं पं परमेश्वरी ।
क्रों क्रों मे रक्षयेद् वक्षः फं बं भं भगवासिनी ।। १४ ।।
ॐ ह्रीं रां पातु कक्षि मे मं यं रं वह्नि-वल्लभा ।
ॐ श्रीं ह्रूं पातु मे पार्श्वौ लं बं लम्बोदर प्रसूः ।। १५ ।।
ॐ श्रीं ह्रीं ह्रूं पातु मे नाभि शं षं षण्मुख-
पालिनी ।
ॐ ऐं सौः पातु मे पृष्ठं सं हं हाटक-रुपिणी ।। १६ ।।
ॐ क्लीं ऐं कटि पातु पञ्चाशद्-वर्ण-मालिका ।
ॐ ऐं क्लीं पातु मे गुह्यं अं आं कं
गुह्यकेश्वरी ।। १७ ।।
ॐ श्रीं ऊं ऋं सदाव्यान्मे इं ईं खं खां स्वरुपिणी
ॐ जूं सः पातु मे जंघे रुं रुं धं अघहारिनी ।। १८ ।।
श्रीं ह्रीं पातु मे जानू उं ऊं णं गण-वल्लभा ।
ॐ श्रीं सः पातु मे गुल्फौ लिं लीं ऊं चं च
चण्डिका ।। १९ ।।
ॐ ऐं ह्रीं पातु मे वाणी एं ऐं छं जं जगत्प्रिया ।
ॐ श्रीं क्लीं पातु पादौ मे झं ञं टं ठं
भगोदरी ।। २० ।।
ॐ ह्रीं सर्वं वपुः पातु अं अः त्रिपुर-मालिनी ।
ॐ ह्रीं पूर्वे सदाव्यान्मे झं झां डं ढं शिखामुखी
।। २१ ।।
ॐ सौः याम्यं सदाव्यान्मे इं ईं णं तं च तारिणी ।
ॐ वारुण्यां च वाराही ऊं थं दं धं च कम्पिला ।। २२ ।।
ॐ श्रीं मां पातु चैशान्यां पातु ॐ नं
जनेश्वरी ।
ॐ श्रीं मां चाग्नेयां ऋं भं मं धं च यौगिनी ।। २३
।।
ॐ ऐं मां नैऋत्यां लूं लां राजेश्वरी तथा ।
ॐ श्रीं पातु वायव्यां लृं लं
वीतकेशिनी ।
ॐ प्रभाते च मो पातु लीं लं
वागीश्वरी सदा ।। २४ ।।
ॐ मध्याह्ने च मां पातु ऐं क्षं शंकर-वल्लभा ।
श्रीं ह्रीं क्लीं पातु सायं ऐ आं
शाकम्भरी सदा ।। २५ ।।
ॐ ह्रीं निशादौ मां पातु ॐ सं
सागरवासिनी ।
क्लीं निशीथे च मां पातु ॐ हं
हरिहरेश्वरी ।। २६ ।।
क्लीं ब्राह्मे मुहूर्तेऽव्याद लं लां त्रिपुर-सुन्दरी ।
विसर्गा तु यत्स्थानं वर्जित कवचेन तु ।। २७ ।।
क्लीं तन्मे सकलं पातु अं क्षं ह्लीं
बगलामुखी ।
इतीदं कवचं दिव्यं मन्त्राक्षरमय परम् ।। २८ ।।
त्रैलोक्यविजयं नाम सर्व-वर्ण-मयं स्मृतम् ।
अप्रकाश्यं सदा देवि श्रोतव्यं च वाचिकम् ।। २९ ।।
दुर्जनायाकुलीनाय दीक्षाहीनाय पार्वति ।
न दातव्यं न दातव्यमित्याज्ञा परमेश्वरी ।। ३० ।।
दीक्षाकार्य विहीनाय शक्ति-भक्ति विरोधिने ।
कवचस्यास्य पठनात् साधको दीक्षितो भवेत् ।। ३१ ।।
कवचेशमिदं गोप्यं सिद्ध-विद्या-मयं परम् ।
ब्रह्मविद्यामयं गोप्यं यथेष्टफलदं शिवे ।। ३२ ।।
न कस्य कथितं चैतद् त्रैलोक्य विजयेश्वरम् ।
अस्य स्मरण-मात्रेण देवी सद्योवशी भवेत् ।। ३३ ।।
पठनाद् धारणादस्य कवचेशस्य साधकः ।
कलौ विचरते वीरो यथा श्रीबगलामुखी ।। ३४
।।
इदं वर्म स्मरन् मन्त्री संग्रामे प्रविशेद् यदा ।
युयुत्सुः पठन् कवचं साधको विजयी भवेत् ।। ३५ ।।
शत्रुं काल-समानं तु जित्वा स्वगृहमेति सः ।
मूर्घ्नि धृत्वा यः कवचं मन्त्र-गर्भं सुसाधकः ।। ३६ ।।
ब्रह्माद्यमरान् सर्वान् सहसा वशमानयेत् ।
धृत्वा गले तु कवचं साधकस्य महेश्वरि ।। ३७ ।।
वशमायान्ति सहसा रम्भाद्यप्सरसां गणाः ।
उत्पातेषु घोरेषु भयेषु विवधेषु च ।। ३८ ।।
रोगेषु च कवचेशं मन्त्रगर्भं पठेन्नरः ।
कर्मणा मनसा वाचा तद्भयं शान्तिमेष्यति ।। ३९ ।।
श्रीदेव्या बगलामुख्याः कवचेशं मयोदितम् ।
त्रैलोक्य-विजयं नाम पुत्रपौत्र धनप्रदम् ।। ४० ।।
ऋणं च हस्ते सम्यक् लक्ष्मीर्भोगविवर्धिनी ।
बन्ध्या जनयते कुक्षौ पुत्र-रत्नं न चान्यथा ।। ४१ ।।
मृतवत्सा च विभृयात् कवचं च गले सदा ।
दीर्घायुर्व्याधिहीनश्च तत्पुत्रो वर्धतेऽनिशम् ।। ४२
।।
इतीदं बगलामुख्याः कवचेशं सुदुर्लभम् ।
त्रैलोक्य-विजयं नाम न देयं यस्यकस्यचित् ।। ४३ ।।
अकुलीनाय मूढाय भक्तिहीनायदम्भिने ।
लोभयुक्ताय देवेशि न दातव्यं कदाचन् ।। ४४ ।।
लोभ-दम्भ-विहीनाय कवचेशं प्रदीयताम् ।
अभक्तेभ्यो अपुत्रेभ्यो दत्वा कुष्ठी भवेन्नरः ।। ४५ ।।
रवौ रात्रौ च सुस्नातः पूजागृहगतः सुधीः ।
दीपमुज्ज्वाल्य मूलेन पठेद्वर्मेदमुत्तमम् ।। ४६ ।।
प्राप्तौ सत्यां त्रिरात्रौ हि राजा तद्-गृहमेष्यति ।
मण्डलेशो महेशानि देवि सत्यं न संशय ।। ४७ ।।
इदं तु कवचेशं तु मया प्रोक्त नगात्मजे ।
गोप्यं गुह्यतरं देवि गोपनीयं स्वयोनिवत् ।। ४८ ।।
।। श्री विश्वयामले बगलामुख्यास्त्रैलोक्यविजयं कवचम् ।।

जनेऊ क्यों पहनते हैं, जानिए..

★सम्पूर्ण सफलता का रहस्य



-~~~॥ ओ३म् ॥~~~---
★सम्पूर्ण सफलता का रहस्य ॥ १०८ ॥
॥ओ३म्॥ का जप करते समय १०८ प्रकार की विशेष भेदक ध्वनी तरंगे उत्पन्न होती है जो किसी भी प्रकार के शारीरिक व मानसिक घातक रोगों के कारण का समूल विनाश व शारीरिक व मानसिक विकास का मूल कारण है। बौद्धिक विकास व स्मरण शक्ति के विकास में अत्यन्त प्रबल कारण है। 
मेरा आप सभी से अनुरोध है बिना अंधविश्वास समझे कर्तव्य भाव से इस ॥ १०८ ॥ को पवित्र अंक स्वीकार कर, आर्य-वैदिक संस्कृति के आपसी सहयोग, सहायता व पहचान हेतु निःसंकोच प्रयोग करें । इसका प्रयोग प्रथम दृष्टिपात स्थान पर करें जैसे द्वार पर इस प्रकार करें।
॥ १०८ ॥
यह अद्भुत व चमत्कारी अंक बहुत समय काल से हमारे ऋषि -मुनियों के नाम के साथ प्रयोग होता रहा है और अब अति शीघ्र यही अंक हमारी महानम सनातन वैदिक संस्कृति के लिये प्रगाढ़ एकता का विशेष संकेत-अंक (code word) बन जायेगा।
----~~~॥ओ३म् ॥~~~---
★ संख्या १०८ का रहस्य ★
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अ→१ ... आ→२ ... इ→३ ... ई→४ ... उ→५ ... ऊ→६. ... ए→७ ... ऐ→८ ओ→९ ... औ→१० ... ऋ→११ ... लृ→१२
अं→१३ ... अ:→१४.. ऋॄ →१५.. लॄ →१६
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क→१ ... ख→२ ... ग→३ ... घ→४ ...
ङ→५ ... च→६ ... छ→७ ... ज→८ ...
झ→९ ... ञ→१० ... ट→११ ... ठ→१२ ...
ड→१३ ... ढ→१४ ... ण→१५ ... त→१६ ...
थ→१७ ... द→१८ ... ध→१९ ... न→२० ...
प→२१ ... फ→२२ ... ब→२३ ... भ→२४ ...
म→२५ ... य→२६ ... र→२७ ... ल→२८ ...
व→२९ ... श→३० ... ष→३१ ... स→३२ ...
ह→३३ ... क्ष→३४ ... त्र→३५ ... ज्ञ→३६ ...
ड़ ... ढ़ ... 
--~~~ओं खम् ब्रह्म ~~~--
ब्रह्म = ब+र+ह+म =२३+२७+३३+२५=१०८
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(१) — यह मात्रिकाएँ (१८स्वर +३६व्यंजन=५४) नाभि से आरम्भ होकर ओष्टों तक आती है, इनका एक बार चढ़ाव, दूसरी बार उतार होता है, दोनों बार में वे १०८ की संख्या बन जाती हैं। इस प्रकार १०८ मंत्र जप से नाभि चक्र से लेकर जिव्हाग्र तक की १०८ सूक्ष्म तन्मात्राओं का प्रस्फुरण हो जाता है। अधिक जितना हो सके उतना उत्तम है पर नित्य कम से कम १०८ मंत्रों का जप तो करना ही चाहिए ।।
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(२) — मनुष्य शरीर की ऊँचाई
= यज्ञोपवीत(जनेउ) की परिधि 
= (४ अँगुलियों) का २७ गुणा होती है। 
= ४ × २७ = १०८
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(३) नक्षत्रों की कुल संख्या = २७ 
प्रत्येक नक्षत्र के चरण = ४
जप की विशिष्ट संख्या = १०८
अर्थात गायत्री आदि मंत्र जप कम से कम १०८ बार करना चाहिये ।
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(४) — एक अद्भुत अनुपातिक रहस्य
★ पृथ्वी से सूर्य की दूरी/ सूर्य का व्यास=१०८
★ पृथ्वी से चन्द्र की दूरी/ चन्द्र का व्यास=१०८
अर्थात मन्त्र जप १०८ से कम नहीं करना चाहिये।
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(५) हिंसात्मक पापों की संख्या ३६ मानी गई है जो मन, वचन व कर्म ३ प्रकार से होते है। अत: पाप कर्म संस्कार निवृत्ति हेतु किये गये मंत्र जप को कम से कम १०८ अवश्य ही करना चाहिये।
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(६) सामान्यत: २४ घंटे में एक व्यक्ति २१६०० बार सांस लेता है। दिन-रात के २४ घंटों में से १२ घंटे सोने व गृहस्थ कर्त्तव्य में व्यतीत हो जाते हैं और शेष १२ घंटों में व्यक्ति जो सांस लेता है वह है १०८०० बार। इसी समय में ईश्वर का ध्यान करना चाहिए । शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति को हर सांस पर ईश्वर का ध्यान करना चाहिये । इसीलिए १०८०० की इसी संख्या के आधार पर जप के लिये १०८ की संख्या निर्धारित करते हैं।
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(७) एक वर्ष में सूर्य २१६०० कलाएं बदलता है। सूर्य वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छःमाह उत्तरायण में रहता है और छः माह
दक्षिणायन में। अत: सूर्य छः माह की एक स्थिति
में १०८००० बार कलाएं बदलता है।
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(८) 786 का पक्का जबाब — ॥ १०८ ॥
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(९) ब्रह्मांड को १२ भागों में विभाजित किया गया है। इन १२ भागों के नाम मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। इन १२ राशियों में नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु विचरण करते हैं। अत: ग्रहों की संख्या ९ में राशियों की संख्या १२ से गुणा करें तो संख्या १०८ प्राप्त हो जाती है।
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(१०) १०८ में तीन अंक हैं १+०+८. इनमें एक “१" ईश्वर का प्रतीक है। शून्य “०" प्रकृति को दर्शाता है। आठ “८" जीवात्मा को दर्शाता है क्योकि योग के अष्टांग नियमों से ही जीव प्रभु से मिल सकता है । जो व्यक्ति अष्टांग योग द्वारा प्रकृति के विरक्त हो कर ( मोह माया लोभ आदि से विरक्त होकर ) ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है उसे सिद्ध पुरुष कहते हैं। जीव “८" को परमपिता परमात्मा से मिलने के लिए प्रकृति “०" का सहारा लेना पड़ता है। ईश्वर और जीव के बीच में प्रकृति है। आत्मा जब प्रकृति को शून्य समझता है तभी ईश्वर “१" का साक्षात्कार कर सकता है। प्रकृति “०" में क्षणिक सुख है और परमात्मा में अनंत और असीम। जब तक जीव प्रकृति “०" को जो कि जड़ है उसका त्याग नहीं करेगा , शून्य नही करेगा, मोह माया को नहीं त्यागेगा तब तक जीव “८" ईश्वर “१" से नहीं मिल पायेगा पूर्णता (१+८=९) को नहीं प्राप्त कर पायेगा ।
९ पूर्णता का सूचक है।
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(११) जैन मतानुसार
अरिहंत के गुण - १२
सिद्ध के गुण - ८
आचार्य के गुण - ३६
उपाध्याय के गुण - २५
साधु के गुण - २७
कुल योग - १०८
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(१२) वैदिक विचार धारा में मनुस्मृति के अनुसार 
अहंकार के गुण = २
बुद्धि के गुण = ३
मन के गुण = ४
आकाश के गुण = ५
वायु के गुण = ६
अग्नि के गुण = ७
जल के गुण = ८
पॄथ्वी के गुण = ९
२+३+४+५+६+७+८+९ =
अत: प्रकॄति के कुल गुण = ४४
जीव के गुण = १०
इस प्रकार संख्या का योग = ५४ 
अत: सृष्टि उत्पत्ति की संख्या = ५४
एवं सृष्टि प्रलय की संख्या = ५४
दोंनों संख्याओं का योग = १०८
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(१३) ★ Vertual Holy Trinity ★
संख्या “१" एक ईश्वर का संकेत है।
संख्या “०" जड़ प्रकृति का संकेत है।
संख्या “८" बहुआयामी जीवात्मा का संकेत है।
[ यह तीन अनादि परम वैदिक सत्य हैं ]
[ यही पवित्र त्रेतवाद ( Holy Trinity ) है ]
संख्या “२" से “९" तक एक बात सत्य है कि इन्हीं आठ अंकों में “०" रूपी स्थान पर जीवन है। इसलिये यदि “०" न हो तो कोई क्रम गणना आदि नहीं हो सकती। “१" की चेतना से “८" का खेल । “८" यानी “२" से “९" । यह “८" क्या है ? मन के “८" वर्ग या भाव । ये आठ भाव ये हैं - १. काम ( विभिन्न इच्छायें / वासनायें ) । २. क्रोध । ३. लोभ । ४. मोह । ५. मद ( घमण्ड ) । ६. मत्सर ( जलन ) । ७. ज्ञान । ८. वैराग । 
एक सामान्य आत्मा से महानात्मा तक की यात्रा का प्रतीक है ——★ ॥ १०८ ॥ ★——
इन आठ भावों में जीवन का ये खेल चल रहा है ।
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(१४) सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से नौ रश्मियां निकलती हैं और ये चारो ओर से अलग-अलग निकलती है। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गई। इन 36 रश्मियों के ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बनें । इस तरह सूर्य की जब नौ रश्मियां पृथ्वी पर आती हैं तो उनका पृथ्वी के आठ बसुओं से टक्कर होती हैं। सूर्य की नौ रश्मियां और पृथ्वी के आठ बसुओं की आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुई वे संस्कृत के 72 व्यंजन बन गई। इस प्रकार ब्रह्मांड में निकलने वाली कुल 108 ध्वनियां पर संस्कृत की वर्ण माला आधारित है।
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रहस्यमय संख्या १०८ का हिन्दू- वैदिक संस्कृति के साथ हजारों सम्बन्ध हैं जिनमें से कुछ को मैंने जाना है और कुछ को शायद आप जानते होंगें तो कृपया उसे हमारे साथ विनिमय करें।..

सनातन धर्म में मुख्यत: पांच उपास्य-देव माने गए हैं

जय माँ
सनातन धर्म में मुख्यत: पांच उपास्य-देव माने गए हैं- सूर्य, गणेश, दुर्गा, शंकर और विष्णु, परंतु कलियुग में दुर्गा और गणेश का विशेष महत्व है, 'कलौ चण्डी विनायकै।' मां दुर्गा परमेश्वर की उन प्रधान शक्तियों में से एक हैं जिनको आवश्यकतानुसार उन्होंने समय-समय पर प्रकट किया है।
उसी दुर्गा शक्ति की उत्पत्ति तथा उनके ‍चरित्रों का वर्णन मार्कण्डेय पुराणांतर्गत देवी माहात्म्य में है। यह देवी माहात्म्य 700 श्लोकों में वर्णित है। यह माहात्म्य 'दुर्गा सप्तशती' के नाम से जाना जाता है।
दुर्गा शक्ति का रूप है -
या देवि सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।
दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं, जिसमें 700 श्लोकों में देवी-चरित्र का वर्णन है। मुख्य रूप से ये तीन चरित्र हैं, प्रथम चरित्र (प्रथम अध्याय), मध्यम चरित्र (2-4 अध्याय) और उत्तम ‍चरित्र (5-13 अध्याय)। प्रथम चरित्र की देवी महाकाली, मध्यम चरित्र की देवी महालक्ष्मी और उत्तम ‍चरित्र की देवी महासरस्वती मानी गई है। यहां दृष्टव्य है कि महाकाली की स्तुति मात्र एक अध्याय में, महालक्ष्मी की स्तुति तीन अध्यायों में और महासरस्वती की स्तुति नौ अध्यायों में वर्णित है, जो सरस्वती की वरिष्ठता, काली (शक्ति) और लक्ष्मी (धन) से अधिक सिद्ध करती है।
प्रथम चरित्र :-
बहुत पहले सुरथ नाम के राजा राज्य करते थे। शत्रुओं और दुष्ट मंत्रियों के कारण उनका राज्य, कोष सब कुछ हाथ से निकल गया। वह निराश होकर वन से चले गए, जहां समाधि नामक एक वैश्य से उनकी भेंट हुई। उनकी भेंट मेधा नामक ऋषि के आश्रम में हुई। इन दोनों व्यक्तियों ने ऋषि से पूछा कि यद्यपि हम दोनों के साथ अपने लोगों (पुत्र, मंत्रियों आदि) ने दुर्व्यवहार किया है फिर भी उनकी ओर हमारा मन लगा रहता है। मुनिवर, क्या कारण है कि ज्ञानी व्यक्तियों को भी मोह होता है।
ऋषि ने कहा कि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, भगवान विष्णु की योगनिद्रा ज्ञानी पुरुषों के चित्त को भी बलपूर्वक खींचकर मोहयुक्त कर देती है, वहीं भगवती भक्तों को वर देती है और 'परमा' अर्थात ब्रह्म ज्ञानस्वरूपा मुनि ने कहा, 'नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिद ततम्' अर्थात वह देवी नित्या है और उसी में सारा विश्व व्याप्त है।
प्रलय के पश्चात भगवान विष्णु योगनिद्रा में निमग्न थे तब उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो असुर उत्पन्न हुए। उन्होंने ब्रह्माजी को आहार बनाना चाहा। ब्रह्माजी उनसे बचने के लिए योगनिद्रा की स्तुति करने लगे। योगनिद्रा से मुक्त होकर भगवान विष्णु उठे और असुरों से युद्ध करने लगे। दोनों असुरों ने योगनिद्रा के कारण विमोहित होकर भगवान विष्णु से वर मांगने को कहा। अंत में उसी वरदान के कारण उन दोनों असुरों की मृत्यु हुई।
मध्यम चरित्र :-
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इस चरित्र में मेधा नामक ऋषि ने राजा सुरथ और समाधि वैश्य के प्रति मोहजनित कामोपासना द्वारा अर्जित फलोपभोग के निराकरण के लिए निष्काम उपासना का उपदेश दिया है।
प्राचीनकाल में ‍महिषासुर सभी देवताओं को हराकर स्वयं इन्द्र बन गया और सभी देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। वे सभी देवता- ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के पास सहायतार्थ गए। उनकी करुण कहानी सुनकर विष्णु और शंकर के मुख से तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार का तेज अन्य देवताओं के शरीर से भी निकला। यह सब एक होकर देवी रूप में परिणित हुआ। इस देवी ने महिषासुर और उनकी सेना का नाश किया। देवताओं ने अपना अभीष्ट प्राप्त कर, देवी से वर मांगा।
' जब-जब हम लोगों पर विपत्तियां आएं, तब-तब आप हमें आपदाओं से विमुक्त करें और जो मनुष्य आपके इस चरित्र को प्रेमपूर्वक पढ़ें या सुनें वे संपूर्ण सुख और ऐश्वर्यों से संपन्न हों।'
उत्तम चरित्र :-
उत्तम चरित्र में परानिष्ठा ज्ञान के बाधक आत्म-मोहन, अहंकार आदि के निराकरण का वर्णन है। पूर्व काल में शुंभ और निशुंभ नामक दो असुर हुए। उन्होंने इन्द्र आदि देवताओं पर आधिपत्य कर लिया। बार-बार होते इस अत्याचार के निराकरण के लिए देवता दुर्गा देवी की प्रार्थना हिमालय पर्वत पर जाकर करने लगे।
देवी प्रकट हुई और उन्होंने देवताओं से उनकी प्रार्थना करने का कारण पूछा। कारण जानकर देवी ने परम सुंदरी 'अंबिका' रूप धारण किया। इस सुंदरी को शुंभ-निशुंभ के भृत्यों (चंड और मुंड) ने देखा। इन भृत्यों से शुंभ-निशुंभ को सुंदरी के बारे में जानकारी मिली और उन्होंने सुग्रीव नामक असुर को अंबिका को लाने के लिए भेजा। देवी ने सुग्रीव से कहा, 'जो व्यक्ति युद्ध में मुझ पर विजय प्राप्त करेगा, उसी से मैं विवाह करूंगी।'
दूत के द्वारा अपने स्वामी की शक्ति का बार-बार वर्णन करने पर देवी उस असुर के साथ नहीं गई। तब शुंभ-निशुंभ ने सुंदरी को बलपूर्वक खींचकर लाने के लिए धूम्रलोचन नामक असुर को आदेश दिया। धूम्रलोचन देवी के हुंकार मात्र से भस्म हो गया। फिर चंड-मुंड दोनों एक बड़ी सेना लेकर आए तो देवी ने असुर की सेना का विनाश किया और चंड-मुंड का शीश काट दिया, जिसके कारण देवी का नाम 'चामुंडा' पड़ा।
असुर सेना का विनाश करने के बाद देवी ने शुंभ-निशुंभ को संदेश भेजा कि वे देवताओं को उनके छीने अधिकार दे दें और पाताल में जाकर रहें, परंतु शुंभ-निशुंभ मारे गए। रक्तबीज की विशेषता थी कि उसके शरीर से रक्त की जितनी बूंदें पृथ्वी पर गिरती थीं, उतने ही रक्तबीज फिर से उत्पन्न हो जाते थे। देवी ने अपने मुख का विस्तार करके रक्तबीज के शरीर का रक्त को अपने मुख में ले लिया और असुर का सिर काट डाला। इसके पश्चात शुंभ और निशुंभ भी मारे गए। देवताओं ने स्तुति की-
सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरी विनाशम्।।
राजा सुरथ और समाधि वैश्य दोनों ने देवी की आराधना की। देवी की कृपा से सुरथ को उनका खोया राज्य और वैश्य का मनोरथ पूर्ण हुआ। उसी प्रकार जो व्यक्ति भगवती की आराधना करते हैं उनका मनोरथ पूर्ण होता है। ऐसी मान्यता है कि दुर्गा सप्तशती के केवल 100 बार पाठ करने से सर्वार्थ सिद्धि प्राप्त होती है।
जय माँ

मृत्यु जीवन का रहष्य

मृत्यु जीवन का सच है, यह एक ऐसा सच है जो हर व्यक्ति जानता है और समझता है पर फिऱ भी उससे भागने की हर पल कोशिश करता है। हर धर्म और ग्रंथ में वर्णित है कि जो भी इस संसार में जन्मा है उसे एक ना एक दिन मरना जरूर होगा। भारतीय पुराणों में भी मृत्यु का विशेष जिक्र मिलता है, पुराणों में तो मृत्यु के बाद का भी वर्णन है जिससे पता चलता है कि आखिर मरने के बाद इंसान यानि की जीवआत्मा का क्या होता है। आज इसी रहस्य को हम बताने जा रहे हैं जो गरूड़ पुराण से लिया गया है, इसे ध्यानपुर्वक पढ़े।

पुराणों के अनुसार जो मनुष्य अच्छे कर्म करता है उसके प्राण हरने देवदूत आते हैं और उसे स्वर्ग ले जाते हैं जबकि जो मनुष्य जीवन भर बुरे कामों में लगा रहता है उसके प्राण हरने यमदूत आते हैं और उसे नरक में ले जाते हैं लेकिन उसके पहले उस जीवात्मा को यमलोक ले जाया जाता है, जहां यमराज उसके पापों के आधार पर उसे सजा देते हैं।

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मृत्यु के बाद जीवात्मा यमलोक तक किस प्रकार जाती है इसका विस्तृत वर्णन गरूड़ पुराण में मिलता है। गरूड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि किस प्रकार मनुष्य के प्राण निकलते हैं और किस तरह वह प्राण पिंडदान प्राप्त कर प्रेत का रूप लेते हैं। यह पुराण विशेषकर भगवान विष्णु के वाहन गरूड़ जी के संवाद पर आधारित है। माना जाता है कि इस पुराण में हर प्रक्रिया का वर्णन मिलता है।

गरूड़ पुराण के अनुसार जिस मनुष्य की मृत्यु होने वाली होती है वह बोलने की इच्छा होने पर भी बोल नहीं पाता है। अंत समय में उसमें दिव्यदृष्टि उत्पन्न होती है और वह संपूर्ण संसार को एकरूप समझने लगता है। उसकी सभी इंद्रियां नष्ट हो जाती हैं और वह जड़ अवस्था में हो जाता है यानी हिलने-डुलने में असमर्थ हो जाता है।

इसके बाद उसके मुंह से झाग निकलने लगते हैं और लार टपकने लगती है। पापी पुरूष के प्राण नीचे के मार्ग से निकलते हैं। उस समय दो यमदूत आते हैं, वे बड़े भयानक व क्रोधयुक्त नेत्र वाले तथा पाशदंड को धारण करने वाले नग्न अवस्था में रहते हैं। वे अपने दांतों से कट-कट शब्द करते हैं।

यमदूतों के कौए जैसे काले बाल होते हैं, उनका मुंह तेड़ा-मेड़ा होता है, नाखून ही उनके शस्त्र होते हैं। ऐसे यमराज के दूतों को देखकर प्राणी भयभीत होकर मलमूत्र त्याग करने लग जाता है। उस समय शरीर से अंगूष्ठमात्र(अंगूठे के बराबर) जीव हा हा शब्द करता हुआ निकलता है, जिसे यमदूत पकड़ लेते हैं।

यमराज के दूत उस भोगने वाले शरीर को पकड़कर पाश गले में बांधकर उसी क्षण यमलोक को ले जाते हैं जैसे- राजा के सैनिक दण्डनीय प्राणी को पकड़ कर ले जाते हैं। उस पापी जीवात्मा को रास्ते में थकने पर भी यमराज के दूत भयभीत करते हैं और उसको नरक के दु:ख को बार-बार सुनाते हैं।

यमदूतों की ऐसी भयानक बातें सुनकर पापात्मा जोर-जोर से रोने लगती है किंतु यमदूत उस पर बिल्कुल भी दया नहीं करते हैं। इसके बाद वह अंगूठे के बराबर भोगने वाला शरीर यमदूतों से डरता और कांपता हुआ, कुत्तों के काटने से दु:खी हो अपने किए हुए पापों को याद करते हुए चलता है।

आग की तरह गर्म हवा तथा गर्म बालू पर वह जीव चल नहीं पाता है और वह भूख-प्यास से भी व्याकुल हो उठता है। तब यमदूत उसकी पीठ पर चाबुक मारते हुए उसे आगे ले जाते हैं। वह जीव जगह-जगह गिरता है और बेहोश हो जाता है और फिर उठ कर चलने लगता है। इस प्रकार यमदूत उस पापी को अंधकाररूप मार्ग से यमलोक ले जाते हैं।

गरूड़ पुराण के अनुसार यमलोक 99 हजार योजन (योजन वैदिक काल की लंबाई मापने की इकाई है। एक योजन बराबर होता है चार कोस यानि 13-16 कि.मी) है। वहां पापी जीव को दो, तीन मुहूर्त में ले जाते हैं , इसके बाद यमदूत उसके भयानक नरक यातना दिलाते हैं। इससे वह जीवात्मा यम तथा यम की यातना देखकर कुछ देर में ही यमराज की आज्ञा से यमदूतों द्वारा आकाशमार्ग से पुन: अपने घर को आती है। 

घर में आकर वह जीवात्मा अपने शरीर में पुन: प्रवेश करने की इच्छा करती है परंतु यमदूत के पाश बंधन से वह मुक्त नहीं हो पाती और भूख-प्यास के कारण रोती है। पुत्र आदि जो पिंड और अंत समय में दान करते हैं, उससे भी प्राणी की तृप्ति नहीं होती क्योंकि पापी पुरुषों को दान, श्रद्धांजलि द्वारा तृप्ति नहीं मिलती, इस प्रकार भूख-प्यास से युक्त होकर वह जीव यमलोक को जाता है।

गरूड़ पुराण के अनुसार मनुष्य की मृत्यु के बाद 10 दिन तक पिंडदान अवश्य करना चाहिए। उस पिंडदान के प्रतिदिन चार भाग हो जाते हैं। उसमें दो भाग तो पंचमहाभूत देह के पुष्टि देने वाले होते हैं, तीसरा भाग यमदूत का होता है तथा चौथा भाग प्रेत खाता है। नवे दिन पिंडदान करने से प्रेत का शरीर बनता है, दसवे दिन पिंडदान देने से उस शरीर को चलने की शक्ति प्राप्त होती है।

गरूड़ पुराण के अनुसार शव को जलाने के बाद पिंड से हाथ के बराबर का शरीर उत्पन्न होता है। वही यमलोक के मार्ग में शुभ-अशुभ फल को भोगता है। पहले दिन पिंडदान से मूर्धा (सिर), दूसरे दिन से गर्दन और कंधे, तीसरे दिन से ह्रदय, चौथे दिन के पिंड से पीठ, पांचवे दिन से नाभि, छठे और सातवे दिन से कमर और नीचे का भाग, आठवे दिन से पैर, नवे और दसवे दिन से भूख-प्यास आदि उत्पन्न होती है। ऐसे पिंड शरीर को धारण कर भूख-प्यास से व्याकुल प्रेत ग्यारहवे और बारहवे दिन का भोजन करता है।

यमदूतों द्वारा तेरहवे दिन प्रेत को बंदर की तरह पकड़ लिया जाता है। इसके बाद वह प्रेत भूख-प्यास से तड़पता हुआ यमलोक को अकेला ही जाता है। यमलोक तक पहुंचने का रास्ता वैतरणी नदी को छोड़कर छियासी हजार योजन है। उस मार्ग पर प्रेत प्रतिदिन दो सौ योजन चलता है। इस प्रकार वह 47 दिन लगातार चलकर यमलोक पहुंचता है।

इस प्रकार मार्ग में सोलह पुरियों को पार कर पापी जीव यमराज के घर जाता है। इन सोलह पुरियों के नाम इस प्रकार है-सौम्य, सौरिपुर, नगेंद्रभवन, गंधर्व, शैलागम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्रभवन, बह्वापाद, दु:खद, नानाक्रंदपुर, सुतप्तभवन, रौद्र, पयोवर्षण, शीतढ्य, बहुभीति। इन सोलह पुरियों को पार करने के बाद आगे यमराजपुरी आती है। पापी प्राणी यम, पाश में बंधे हुए मार्ग में हाहाकार करते हुए अपने घर को छोड़कर यमराज पुरी को जाते हैं।


नमामि देवी नर्मदे

नमामि देवी नर्मदे
मै गुरुश्री कौलाचार्य मुक्तारानन्द स्वामी का आभार व्यक्त करता हु की ये लेख लिखने के लिए । बहोत खूब जानकारी दी हे।
पारद शिब लिंग ही क्यों ?
शिव प्रसादेन बिना न बुद्धिः शिव प्रसादेन बिना न युक्तिः
शिव प्रसादेन बिना न सिद्धिः शिव प्रसादेन बिना न मुक्तिः
जब शिव की बात आयी है तो निश्चय ही शिव लिंग की आवस्यकता है ..और वोह शिव लिंग कोई ऐसा वैसा नहीं .. पारद शिवलिंग ही होना चाहिए साधना करने के लिए ..वर्ना ...(..<>..)
किन्तु ..
पारद शिब लिंग ही क्यों ?
और कोई लिंग क्यों नहीं ?
सर्व श्रेष्ठ शिव लिंग पारद शिवलिंग ही क्यों है ?
मेरे आत्मन !
पारद शिवलिंग ,पारद विग्रह ,पारद गुटिका .. आजकल के साधना लगता है इन्ही सामग्रियो में ही सिमट के रह गया है ..
सब लगे हुए है साधना करने में .. पूर्व जन्म साधना .. लक्ष्मी साधना , भैरव साधना , महा विद्या साधना , यह साधना वोह साधना .. साधना साधना और बस साधना ...इनको देख कर ऐसा लगता है जैसे की साधको का बाड़ आ गया है मेरे भारत में ...
मै यह नहीं कहता की साधना नहीं करना चाहिए ..किन्तु साधना किसे कहते है इसे समझ कर ही करना श्रेष्ठ है .. अन्यथा समय की बर्बादी के सिवा और कुछ नहीं ...
साध लेना ही साधना है .. किसे साध ना है ? अपने साध्य आराध्य अपने इष्ट को साध ना होता है साधना द्वारा ..
किन्तु ज्यादातर लोगो देखता हूँ आज एक साधना शुरू कर दिया जाप ख़त्म तो दूसरी साधना शुरू ..
आज माँ तारा की साधना कर के उठे तो दुसरे दिन किसी भुत प्रेत की करने लग जाते है ..
बड़ा ही अजीव प्राणी होते है ऐसे लोग ..
यह लोग अपने अराध्य का साधना करने के बाद (कुछ दिन जिव्हा से बस मंत्र उच्चारण ) ऐसा भाव दिखाते है जैसे की वेह इंद्र की गद्दी पे बैठ गए है ..
मैंने पूछा किसी से की भाई कैसे चल रहा है सब कुछ ?
उधर से जवाब आया ..अरे आचार्य जी कल ही मैंने अघोर लक्ष्मी की साधना संपन्न करके उठा ...
लो भाई मैंने उस से पूछा था क्या की साधना कर रहे हो की नहीं ?
किन्तु यह लोग फिर भी बताते रहते है मुझे ..आज यह किया कल का यह प्लान है ..
साला साधना भी अब प्लान करके होने लगा ..
हाहाहा हंसी आता है मुझे इन सब को देख कर .(अब आप मुझे अहंकारी समझ सकते हो मेरा बोलने का ढंग देख कर) ..
और सब बड़े मजे की बात बताऊ ?
इन लोगो को अपने आप से ज्यादा अपने गुरु ,इष्ट से ज्यादा इन तथाकथित "साधना सामग्रियो" पर ज्यादा बिश्वास है ..
इन्हें शुद्ध अष्ट संस्कारो से युक्त स्वर्ण ग्रास करने वाला पारद से बना लिंग चाहिए साधना करने के लिए ..
अबे सालो खुद के लिंग का तो सम्मान कर नहीं पाते ..तुम लोग क्या खाक शिवलिंग पर साधनाए करोगे .. (मुझे इसी भाषा में बात करने की आदत है )
चलिए जाने दीजिये इन सब बातो को भैंस के आगे नागिन डांस करके कोई फायदा नहीं ..
तो कहाँ था मै?
हां ..पारद शिवलिंग ...
शास्त्रों अनुसार इस ब्रह्माण्ड में अगर कोई शिव लिंग सर्व श्रेष्ठ है तो वेह द्वादश ज्योतिर लिंग ही है .. और कोई भी शिव लिंग द्वादश ज्योतिर्लिंग का मुकाबला कर ही नहीं सकता ..( यह लाइन आप के बुद्धि को देख कर बुद्धि से कहा )
अगर पारद से बना लिंग ही सर्व श्रेष्ठ होता तो द्वादश ज्योतिलिंग भी पारद के ही बने होते पत्थर के नहीं ..(इस लाइन को ध्यान से समझो ) ..क्या जरुरत था शिव जी को पत्थर के लिंग देने की भगवान रावण को .. ?
राम जी भी रावण वध हेतु मिटटी से क्यों बनाया लिंग ? अगर वेह चाहते तो पारद का ही लिंग बना लेते ? तब यूँ ही बार बार समुद्र में बह तो नहीं जाता ?
उन्होंने इस लिए नहीं बनाया क्योंकि उन्हें पता था की लिंग चाहे किसी से भी बना हो यदि उस पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास हो तो अघोरेश्वर अवस्य अमोघ कवच से कवचित करेंगे ही करेंगे ..
किन्तु हम लोग लगे हुए है पारद पारद चिल्लाने में ...मुझे इतने तोले का चाहिए .मुझे इतने पैसे में चाहिए ..कोई कहता है मुझे इतने किलो का चाहिए .. सबको शिवलिंग चाहिए ..क्यों चाहिए क्योंकि अभी के ज्ञानी जनों ने कहा है एक मात्र इसी लिंग पर ही साधना फलीभूत होगा .. (भाड़ में जाय ऐसे भ्रम ज्ञानी)
अरे मै खुला चैलेंज देता हु "आप' जैसे साधको की कितनी भी संस्कारो वाला ले आओ कुछ भी मिलने वाला नहीं ..
अरे शिव जी तो इतने दानी है की क्या बताये ..केवल मात्र पार्थिव लिंग पर भक्ति से एक अंजुली जल चढ़ा देने से ही आप को शिव लोक में स्थान दे देते है ..और आप है की अब भी लगे हुए है ?
अब आप पूछेंगे की ..तो हम कहाँ जाय ? क्या करे ? किस शिवलिंग पर साधना करे ?
मेरा उत्तर है .."नर्मदेश्वर शिवलिंग"
क्योंकि एक मात्र इस ब्रह्माण्ड में माँ नर्मदे को ही वरदान मिला है शिव को जन्म देने का ..
और इसी कारण ही ज्ञानी जनों ने कहा है ..
"नर्मदा नदी के हर एक कंकर में शंकर विराजमान है" ..
यह वोही नर्मदा है जहाँ पर आदि गुर श्रील शंकराचार्य जी ने अपने गुरु भगवत्पाद स्वामी गोविन्द जी से दीक्षा ग्रहण किया था ..यह वोही नर्मदा है जहाँ पर शंकराचार्य जी का नाम उनके गुरु ने भगवत पूज्यपादाचार्य रखा ...
यह वोही नर्मदे है जहाँ ऋषि दुर्वासा ने ब्रह्म को जाना था ..
यह वोही नर्मदे है जहाँ मेरी माँ तारा और पिता देवाधिदेव महादेव विचरण व साधको का कल्याण हेतु सदा पधारते रहते है ...
यह वोही नार्मदेश्री है जहाँ से शंकराचार्य जी को "तत्व" का ज्ञान प्राप्त हुआ था ..
यही वोह नर्मदे है जहाँ समस्त अप्सरा ,योगिनी ,यक्षिणी , बेताल ,गंधर्व साधको का मनोरंजन हेतु सदा ही उपस्थित रहते है ..
यह वोही नर्मदे है जहाँ पारस पत्थर मिला था ..
यह वोही नर्मदे है जहाँ से द्रोणाचार्य जी को मणि प्राप्त हुआ था अपनी ताप की बल से ...
कितना लिखू मै माँ नर्मदे की गुण ?
बाकि आप खुद समझदार हो ..समझ जाओ बस ...
शंकराचार्य जी ने नर्मदेश्वर शिवलिंग पर शून्य साधना से शुरू कर समस्त शैव साधना सम्पन्न कर सिद्दी प्राप्त किया और इसी कारण अघोर मार्ग के कुछ लोग उनके विरोध पर भी उतर आये थे ..
समस्त साधू संत .. समस्त योनी नर्मदेश्वर पर ही अपनी अपनी साधना सम्पन्न करते है ..
मै स्वम् भी पारद की संस्कार जनता हूँ .. किन्तु मै जब मंडल अभिषेक करता हूँ तो नर्मदेश्वर पर ही करता हूँ .. क्योंकि मेरे द्वारा या किसी भी मनुष्य द्वरा बनाया गया प्राण प्रतिष्ठा किया गया शिवलिंग में कोई न कोई कमी ,त्रुटी अवस्य होगी ही ..किन्तु नर्मदेश्वर में कभी नहीं ..असंभव है यह ..बस यही कारण है ...
जरा देखिये तो सही नर्मदाष्टकम में कितनी ही खूबसूरती से इसका वर्णन किया है ..
अलक्ष लक्ष लक्ष पाप लक्ष सारसायुधं
ततस्तु जीव जंतु तंतु भुक्ति मुक्ति दायकं
विरंची शंकर विष्णु स्वकीयधामवर्मदे
तदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
अर्थात ....
ब्रह्मा विष्णु शंकर को निज निज पद व शक्ति देने वाली हे माँ नर्मदे !
अनगणित दृष्ट अदृष्ट पापो का लक्ष भेद करने में अमोघ शास्त्र के समान
और तुम्हारी तट पर बसने वाली छोटी बड़ी सभी जीवो को भोग व मोक्ष देने वाली हे नर्मदे तेरी पदपंकज को नमस्कार करता हूँ ...
यही तो है लिंग रहस्य .. यही तो है शिव तंत्र ..यही तो है स्व रचित आगम तंत्र ..
अगर आप को मेरी बाते समझ में आ गया हो तो आगे की विधान स्पष्ट कर रहा हूँ ...
नर्मदेश्वर लिंग को अपने पूजन स्थान में स्थापित कर उसका जल से अभिषेक करे व बिल्बपत्र श्वेतार्क के फुल अर्पित करे .. फिर लिंग पार पांच बिंदी लगाये मंत्र पढ़ते हुए एक एक कर ...(बिंदी आप किसी से भी लगा सकते हो )
1 ॐ सद्धोजातं प्रपद्धामी सद्धोजाताय वै नमो नमः भवे भवे नाती भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः
2 ॐ बाम देवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकर्णाय नमो बलविकर्णाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्व भूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ..
3 ॐ अघोरेभ्योथ घोरेभ्यो घोर घोर तरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्व सर्वेभ्यो नमस्तेअस्तु रुद्र रुपेभ्य
4 ॐ तत् पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात
5 ॐ ईशान सर्व विद्या नामिश्वर सर्व भूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोधिपतिर्ब्रहमा शिवो मे अस्तु सदा शिवोम
आप के जानकारी के लिए बता दू की यही पांच मंत्र शिव के पांचो मुखो के मंत्र है .. इन्ही पाचो मुखो से महादेव ने तंत्र का ज्ञान दिया है ...
इसके बाद आप .. रूद्र अभिषेक सम्पन्न करे फिर रुद्राष्टकम शिवमहिम्न स्तोत्र का पाठ करे ..
और पूर्ण भक्ति भाव से शिव जी के आरती सम्पन्न कर अपने साधना स्थल में लिंग की स्थापना कर दीजिये .. फिर देखिये कमाल ..
इसके बाद आप दुनिया की कोई भी साधना जो शिव लिंग पर सम्पन्न होता है इस सिद्ध लिंग पर करके पूर्ण लाभ प्राप्त कर सकते हो .. यह मेरा शिव संकल्प है .. मिथ्या नहीं हो सकता ..
विश्वास ही सब कुछ है .. क्योंकि यह विश्वास अँधा होता है .. किन्तु इसी अंध विश्वास द्वारा जो हमे अनुभूति होता है वोह शाश्वत सत्य होता है ...
जय माँ 
 जय कौलाचार

सूतक निर्णय

सूतक निर्णय
■सूतक-पातक■
{sutak-patak nirnay}
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सूतक लग गया, अब मंदिर नहीं जाना तक
ऐसा कहा-सुना तो बहुत बार, किन्तु अब
इसका अर्थ भी समझ लेना ज़रूरी है।
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सूतक
■■■■
◆सूतक का सम्बन्ध "जन्म के" निम्मित से हुई
अशुद्धि से है।
◆जन्म के अवसर पर जो नाल काटा जाता है और
जन्म होने की प्रक्रिया में अन्य प्रकार की जो हिंसा
होती है, उसमे लगने वाले दोष/पाप के प्रायश्चित
स्वरुप "सूतक" माना जाता है।
जन्म के बाद नवजात की पीढ़ियों को हुई अशुचिता :-
■■■■■■■■■■■■■■■
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3 पीढ़ी तक - 10 दिन
4 पीढ़ी तक - 10 दिन
5 पीढ़ी तक - 6 दिन
ध्यान दें :-
■■■■■■
◆एक रसोई में भोजन करने वालों के पीढ़ी नहीं गिनी
जाती वहाँ पूरा 10 दिन का सूतक माना है।
◆प्रसूति(नवजात की माँ)को 45 दिन का सूतक
रहता है।
◆प्रसूति स्थान 1 माह तक अशुद्ध है ! इसीलिए
कई लोग जब भी अस्पताल से घर आते हैं तो
स्नान करते हैं।
अपनी पुत्री :-
■■■■■■■
◆पीहर में जनै तो हमे 3 दिन का,
◆ससुराल में जन्म दे तो उन्हें 10 दिन का सूतक
रहता है। और हमे कोई सूतक नहीं रहता है।
नौकर-चाकर :-
■■■■■■■■
◆अपने घर में जन्म दे तो 1 दिन का,
◆बाहर दे तो हमे कोई सूतक नहीं।
पालतू पशुओं का :-
■■■■■■■■■■
◆घर के पालतू गाय, भैंस, घोड़ी, बकरी इत्यादि
को घर में बच्चा होने पर हमे 1 दिन का सूतक
रहता है।
◆किन्तु घर से दूर-बाहर जन्म होने पर कोई
सूतक नहीं रहता।
◆बच्चा देने वाली गाय, भैंस और बकरी का दूध,
क्रमशः 15 दिन, 10 दिन और 8 दिन तक
"अभक्ष्य/अशुद्ध" रहता है।
पातक
■■■■
◆पातक का सम्बन्ध "मरण के" निम्मित से हुई
अशुद्धि से है।
◆मरण के अवसर पर दाह-संस्कार में इत्यादि में जो
हिंसा होती है, उसमे लगने वाले दोष/पाप के प्रायश्चित
स्वरुप "पातक" माना जाता है।
मरण के बाद हुई अशुचिता :-
■■■■■■■■■■■■■■■
3 पीढ़ी तक - 12 दिन
4 पीढ़ी तक - 10 दिन
5 पीढ़ी तक - 6 दिन
ध्यान दें :-
■■■■■■
◆जिस दिन दाह-संस्कार किया जाता है,
◆उस दिन से पातक के दिनों की गणना होती है, न
कि मृत्यु के दिन से !
◆यदि घर का कोई सदस्य बाहर/विदेश में है, तो जिस
दिन उसे सूचना मिलती है, उस दिन से शेष दिनों तक
उसके पातक लगता है।
◆अगर 12 दिन बाद सूचना मिले तो स्नान-मात्र करने
से शुद्धि हो जाती है।
◆किसी स्त्री के यदि गर्भपात हुआ हो तो, जितने
माह का गर्भ पतित हुआ, उतने ही दिन का पातक
मानना चाहिए।
◆घर का कोई सदस्य मुनि-आर्यिका-तपस्वी बन गया
हो तो, उसे घर में होने वाले जन्म-मरण का सूतक-पातक
नहीं लगता है ! किन्तु स्वयं उसका ही मरण हो जाने पर
उसके घर वालों को 1 दिन का पातक लगता है।
◆किसी अन्य की शवयात्रा में जाने वाले को 1 दिन का,
मुर्दा छूने वाले को 3 दिन और मुर्दे को कन्धा देने वाले
को 8 दिन की अशुद्धि जाननी चाहिए।
◆घर में कोई आत्मघात करले तो 6 महीने का पातक
मानना चाहिए।
◆यदि कोई स्त्री अपने पति के मोह/निर्मोह से जल मरे,
बालक पढाई में फेल होकर या कोई अपने ऊपर दोष
देकर मरता है तो इनका पातक बारह पक्ष याने 6 महीने
का होता है।
उसके अलावा भी कहा है कि
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◆जिसके घर में इस प्रकार अपघात होता है, वहाँ
छह महीने तक कोई बुद्धिमान मनुष्य भोजन
अथवा जल भी ग्रहण नहीं करता है ! वह मंदिर
नहीं जाता और ना ही उस घर का द्रव्य मंदिर में
चढ़ाया जाता है ! (क्रियाकोष १३१९-१३२०)
अनाचारी स्त्री-पुरुष के हर समय ही पातक
रहता है
ध्यान से पढ़िए
■■■■■■■■■
◆सूतक-पातक की अवधि में "देव-शास्त्र-गुरु" का
पूजन, आदि धार्मिक क्रियाएं वर्जित होती हैं !
इन दिनों में मंदिर के उपकरणों को स्पर्श करने का
भी निषेध है। यहाँ तक की गुल्लक में रुपया डालने
का भी निषेध बताया है।
किन्तु :-
■■■■■
◆ये कहीं नहीं कहा कि सूतक-पातक
में मंदिर जाना वर्जित है या मना है।
◆मंदिर में जाना, देव-दर्शन, प्रदिक्षणा, जो पहले से
याद हैं वो विनती/स्तुति बोलना, भाव-पूजा करना,
हाथ की अँगुलियों पर जाप देना सम्मत है।
◆यह सूतक-पातक आर्ष-ग्रंथों से मान्य है।
कभी देखने में आया कि सूतक में किसी अन्य से
◆पूजन की पुस्तक चौकी पर खुलवा कर रखवाली
और स्वयं छू तो सकते नहीं तो उसमे फिर सींख,
चूड़ी, बालों कि क्लिप या पेन से पृष्ठ पलट कर
पढ़ने लगे ये योग्य नहीं है।
◆कहीं कहीं लोग सूतक-पातक के दिनों में मंदिर
ना जाकर इसकी समाप्ति के बाद मंदिर से गंगा
जल लाकर शुद्धि के लिए घर-दुकान में छिड़कते हैं,
ऐसा करके नियम से घोरंघोर पाप का बंध करते हैं।
इन्हे समझना इसलिए ज़रूरी है, ताकि अब आगे
घर-परिवार में हुए जन्म-मरण के अवसरों पर अन
जाने से भी कहीं दोष का उपार्जन न हो।
इस विषय को अधिक सूक्ष्मता से जानने के लिए
धर्म-संग्रह क्रियाकोष और सूतक-निर्णय जैसे शास्त्रों
को पढ़ना चाहिए।

शिवकृतं दुर्गास्तोत्रम्


Edit

श्रीमहादेव उवाच

रक्ष रक्ष महादेवि दुर्गे दुर्गतिनाशिनि। मां भक्त मनुरक्तं च शत्रुग्रस्तं कृपामयि॥

विष्णुमाये महाभागे नारायणि सनातनि। ब्रह्मस्वरूपे परमे नित्यानन्दस्वरूपिणी॥

त्वं च ब्रह्मादिदेवानामम्बिके जगदम्बिके। त्वं साकारे च गुणतो निराकारे च निर्गुणात्॥

मायया पुरुषस्त्वं च मायया प्रकृति: स्वयम्। तयो: परं ब्रह्म परं त्वं बिभर्षि सनातनि॥

वेदानां जननी त्वं च सावित्री च परात्परा। वैकुण्ठे च महालक्ष्मी: सर्वसम्पत्स्वरूपिणी॥

म‌र्त्यलक्ष्मीश्च क्षीरोदे कामिनी शेषशायिन:। स्वर्गेषु स्वर्गलक्ष्मीस्त्वं राजलक्ष्मीश्च भूतले॥

नागादिलक्ष्मी: पाताले गृहेषु गृहदेवता। सर्वशस्यस्वरूपा त्वं सर्वैश्वर्यविधायिनी॥

रागाधिष्ठातृदेवी त्वं ब्रह्मणश्च सरस्वती। प्राणानामधिदेवी त्वं कृष्णस्य परमात्मन:॥

गोलोके च स्वयं राधा श्रीकृष्णस्यैव वक्षसि। गोलोकाधिष्ठिता देवी वृन्दावनवने वने॥

श्रीरासमण्डले रम्या वृन्दावनविनोदिनी। शतश्रृङ्गाधिदेवी त्वं नामन चित्रावलीति च॥

दक्षकन्या कुत्र कल्पे कुत्र कल्पे च शैलजा। देवमातादितिस्त्वं च सर्वाधारा वसुन्धरा॥

त्वमेव गङ्गा तुलसी त्वं च स्वाहा स्वधा सती। त्वदंशांशांशकलया सर्वदेवादियोषित:॥

स्त्रीरूपं चापिपुरुषं देवि त्वं च नपुंसकम्। वृक्षाणां वृक्षरूपा त्वं सृष्टा चाङ्कुररूपिणी॥

वह्नौ च दाहिकाशक्ति र्जले शैत्यस्वरूपिणी। सूर्ये तेज:स्वरूपा च प्रभारूपा च संततम्॥

गन्धरूपा च भूमौ च आकाशे शब्दरूपिणी। शोभास्वरूपा चन्द्रे च पद्मसङ्घे च निश्चितम्॥

सृष्टौ सृष्टिस्वरूपा च पालने परिपालिका। महामारी च संहारे जले च जलरूपिणी॥

क्षुत्त्‍‌वं दया त्वं निद्रा त्वं तृष्णा त्वं बुद्धिरूपिणी। तुष्टिस्त्वं चापि पुष्टिस्त्वं श्रद्धा त्वं च क्षमा स्वयम्॥

शान्तिस्त्वं च स्वयं भ्रान्ति: कान्तिस्त्वं कीर्तिरेव च। लज्जा त्वं च तथा माया भुक्ति मुक्ति स्वरूपिणी॥

सर्वशक्ति स्वरूपा त्वं सर्वसम्पत्प्रदायिनी। वेदेऽनिर्वचनीया त्वं त्वां न जानाति कश्चन॥

सहस्त्रवक्त्रस्त्वां स्तोतुं न च शक्ता: सुरेश्वरि। वेदा न शक्ता: को विद्वान् न च शक्ता: सरस्वती॥

स्वयं विधाता शक्तो न न च विष्णु: सनातन:। किं स्तौमि पञ्चवक्त्रेण रणत्रस्तो महेश्वरि॥

कृपां कुरु महामाये मम शत्रुक्षयं कुरु।

नर्मदा अष्टकम




सबिंदु सिन्धु सुस्खल तरंग भंग रंजितम
द्विषत्सु पाप जात जात कारि वारि संयुतम
कृतान्त दूत काल भुत भीति हारि वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 1

त्वदम्बु लीन दीन मीन दिव्य सम्प्रदायकम
कलौ मलौघ भारहारि सर्वतीर्थ नायकं
सुमस्त्य कच्छ नक्र चक्र चक्रवाक् शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 2

महागभीर नीर पुर पापधुत भूतलं
ध्वनत समस्त पातकारि दरितापदाचलम
जगल्ल्ये महाभये मृकुंडूसूनु हर्म्यदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 3

गतं तदैव में भयं त्वदम्बु वीक्षितम यदा
मृकुंडूसूनु शौनका सुरारी सेवी सर्वदा
पुनर्भवाब्धि जन्मजं भवाब्धि दुःख वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 4

अलक्षलक्ष किन्न रामरासुरादी पूजितं
सुलक्ष नीर तीर धीर पक्षीलक्ष कुजितम
वशिष्ठशिष्ट पिप्पलाद कर्दमादि शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 5

सनत्कुमार नाचिकेत कश्यपात्रि षटपदै
धृतम स्वकीय मानषेशु नारदादि षटपदै:
रविन्दु रन्ति देवदेव राजकर्म शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 6

अलक्षलक्ष लक्षपाप लक्ष सार सायुधं
ततस्तु जीवजंतु तंतु भुक्तिमुक्ति दायकं
विरन्ची विष्णु शंकरं स्वकीयधाम वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 7

अहोमृतम श्रुवन श्रुतम महेषकेश जातटे
किरात सूत वाड़वेषु पण्डिते शठे नटे
दुरंत पाप ताप हारि सर्वजंतु शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 8

इदन्तु नर्मदाष्टकम त्रिकलामेव ये सदा
पठन्ति ते निरंतरम न यान्ति दुर्गतिम कदा
सुलभ्य देव दुर्लभं महेशधाम गौरवम
पुनर्भवा नरा न वै त्रिलोकयंती रौरवम 9

त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
नमामि देवी नर्मदे, नमामि देवी नर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे

परशुरामकृतं दुर्गास्तात्रम्




परशुराम उवाच

श्रीकृष्णस्य च गोलोके परिपूर्णतमस्य च:आविर्भूता विग्रहत: पुरा सृष्ट्युन्मुखस्य च॥

सूर्यकोटिप्रभायुक्ता वस्त्रालंकारभूषिता। वह्निशुद्धांशुकाधाना सुस्मिता सुमनोहरा॥

नवयौवनसम्पन्ना सिन्दूरविन्दुशोभिता। ललितं कबरीभारं मालतीमाल्यमण्डितम्॥

अहोऽनिर्वचनीया त्वं चारुमूर्ति च बिभ्रती। मोक्षप्रदा मुमुक्षूणां महाविष्णोर्विधि: स्वयम्॥

मुमोह क्षणमात्रेण दृ त्वां सर्वमोहिनीम्। बालै: सम्भूय सहसा सस्मिता धाविता पुरा॥

सद्भि: ख्याता तेन राधा मूलप्रकृतिरीश्वरी। कृष्णस्त्वां सहसाहूय वीर्याधानं चकार ह॥

ततो डिम्भं महज्जज्ञे ततो जातो महाविराट्। यस्यैव लोमकूपेषु ब्रह्माण्डान्यखिलानि च॥

तच्छृङ्गारक्रमेणैव त्वन्नि:श्वासो बभूव ह। स नि:श्वासो महावायु: स विराड् विश्वधारक:॥

तव घर्मजलेनैव पुप्लुवे विश्वगोलकम्। स विराड् विश्वनिलयो जलराशिर्बभूव ह॥

ततस्त्वं पञ्चधाभूय पञ्चमूर्तीश्च बिभ्रती। प्राणाधिष्ठातृमूर्तिर्या कृष्णस्य परमात्मन:॥

कृष्णप्राणाधिकां राधां तां वदन्ति पुराविद:॥

वेदाधिष्ठातृमूर्तियां वेदाशास्त्रप्रसूरपि। तौ सावित्रीं शुद्धरूपां प्रवदन्ति मनीषिण:॥

ऐश्वर्याधिष्ठातृमूर्ति: शान्तिश्च शान्तरूपिणी। लक्ष्मीं वदन्ति संतस्तां शुद्धां सत्त्‍‌वस्रूपिणीम्॥

रागाधिष्ठातृदेवी या शुक्लमूर्ति: सतां प्रसू:। सरस्वतीं तां शास्त्रज्ञां शास्त्रज्ञा: प्रवदन्त्यहो॥

बुद्धिर्विद्या सर्वशक्ते र्या मूर्तिरधिदेवता। सर्वमङ्गलमङ्गल्या सर्वमङ्गलरूपिणी॥

सर्वमङ्गलबीजस्य शिवस्य निलयेऽधुना॥

शिवे शिवास्वरूपा त्वं लक्ष्मीर्नारायणान्तिके। सरस्वती च सावित्री वेदसू‌र्ब्रह्मण: प्रिया॥

राधा रासेश्वरस्यैव परिपूर्णतमस्य च। परमानन्दरूपस्य परमानन्दरूपिणी॥

त्वत्कलांशांशकलया देवानामपि योषित:॥

त्वं विद्या योषित: सर्वास्त्वं सर्वबीजरूपिणी। छाया सूर्यस्य चन्द्रस्य रोहिणी सर्वमोहिनी॥

शची शक्रस्य कामस्य कामिनी रतिरीश्वरी। वरुणानी जलेशस्य वायो: स्त्री प्राणवल्लभा॥

वह्ने: प्रिया हि स्वाहा च कुबेरस्य च सुन्दरी। यमस्य तु सुशीला च नैर्ऋतस्य च कैटभी॥

ईशानस्य शशिकला शतरूपा मनो: प्रिया। देवहूति: कर्दमस्य वसिष्ठस्याप्यरुन्धती॥

लोपामुद्राप्यगस्त्यस्य देवमातादितिस्तथा। अहल्या गौतमस्यापि सर्वाधारा वसुन्धरा॥

गङ्गा च तुलसी चापि पृथिव्यां या: सरिद्वरा:। एता: सर्वाश्च या ह्यन्या: सर्वास्त्वत्कलयाम्बिके॥

गृहलक्ष्मीगृहे नृणांराजलक्ष्मीश्च राजसु। तपस्विनां तपस्या त्वं गायत्री ब्राह्मणस्य च॥

सतां सत्त्‍‌वस्वरूपा त्वमसतां कलहाङ्कुरा। ज्योतीरूपा निर्गुणस्य शक्ति स्त्वं सगुणस्य च॥

सूर्ये प्रभास्वरूपा त्वं दाहिका च हुताशने। जले शैत्यस्वरूपा च शोभारूपा निशाकरे॥

त्वं भूमौ गन्धरूपा च आकाशे शब्दरूपिणी। क्षुत्पिपासादयस्त्वं च जीविनां सर्वशक्त य:॥

सर्वबीजस्वरूपा त्वं संसारे साररूपिणी। स्मूतिर्मेधा च बुद्धिर्वा ज्ञानशक्ति र्विपश्चिताम्॥

कृष्णेन विद्या या दत्ता सर्वज्ञानप्रसू: शुभा। शूलिने कृपया सा त्वं यतो मृत्युञ्जय: शिव:॥

सृष्टिपालनसंहारशक्त यस्त्रिविधाश्च या:। ब्रह्मविष्णुमहेशानां सा त्वमेव नमोऽस्तु ते॥

मधुकैटभभीत्या च त्रस्तो धाता प्रकम्पित:। स्तुत्वा मुमोच यां देवीं तां मूधनर् प्रणमाम्यहम्॥

मधुकैटभयोर्युद्धे त्रातासौ विष्णुरीश्वरीम्। बभूव शक्ति मान् स्तुत्वा तां दुर्गा प्रणमाम्यहम्॥

त्रिपुरस्य महायुद्धे सरथे पतिते शिवे। यां तुष्टुवु: सुरा: सर्वे तां दुर्गा प्रणमाम्यहम्॥

विष्णुना वृषरूपेण स्वयं शम्भु: समुत्थित: जघान त्रिपुरं स्तुत्वा तां दुर्गा प्रणमाम्यहम्॥

यदाज्ञया वाति वात: सूर्यस्तपति संततम्। वर्षतीन्द्रो दहत्यगिन्स्तां दुर्गा प्रणमाम्यहम्॥

यदाज्ञया हि कालश्च शश्वद् भ्रमति वेगत:। मृत्युश्चरति जन्त्वोघे तां दुर्गा प्रणमाम्यहम्॥

स्त्रष्टा सृजति सृष्टिं च पाता पाति यदाज्ञया। संहर्ता संहरेत् काले तां दुर्गा प्रणमाम्यहम्॥

ज्योति:स्वरूपो भगवाञ्छ्रीकृष्णो निर्गुण: स्वयम्। यया विना न शक्त श्च सृष्टिं कर्तु नमामि ताम्॥

रक्ष रक्ष जगन्मातरपराधं क्षमस्व ते। शिशूनामपराधेन कुतो माता हि कुप्यति॥

इत्युक्त्वा पर्शुरामश्च प्रणम्य तां रुरोद ह। तुष्टा दुर्गा सम्भ्रमेण चाभयं च वरं ददौ॥

अमरो भव हे पुत्र वत्स सुस्थिरतां व्रज। शर्वप्रसादात् सर्वत्र ज्योऽस्तु तव संततम्॥

सर्वान्तरात्मा भगवांस्तुष्टोऽस्तु संततं हरि:। भक्ति र्भवतु ते कृष्णे शिवदे च शिवे गुरौ॥

इष्टदेवे गुरौ यस्य भक्ति र्भवति शाश्वती। तं हन्तु न हि शक्ताष्श्च रुष्टाश्च सर्वदेवता:॥

श्रीकृष्णस्य च भक्त स्त्वं शिष्यो हि शंकरस्य च। गुरुपत्‍‌नीं स्तौषि यस्मात् कस्त्वां हन्तुमिहेश्वर:॥

अहो न कृष्णभक्त आनामशुभं विद्यते क्वचित्। अन्यदेवेषु ये भक्ता न भक्ता वा निरेङ्कुशा:॥

चन्द्रमा बलवांस्तुष्टो येषां भाग्यवतां भृगो। तेषां तारागणा रुष्टा: किं कुर्वन्ति च दुर्बला:॥

यस्य तुष्ट: सभायां चेन्नरदेवो महान् सुखी। तस्य किं वा करिष्यन्ति रुष्टा भृत्याश्च दुर्बला:॥

इत्युक्त्वा पार्वती तुष्टा दत्त्‍‌वा रामं शुभाशिषम्। जगामान्त:पुरं तूर्ण हरिशब्दो बभूव ह॥

स्तोत्रं वै काण्वशाखोक्तं पूजाकाले च य: पठेत्। यात्राकाले च प्रातर्वा वाञ्िछतार्थ लभेद्ध्रुवम॥

पुत्रार्थी लभते पुत्रं कन्यार्थी कन्यकां लभेत्। विद्यार्थी लभते विद्यां प्रजार्थी चाप्रुयात् प्रजाम्॥

भ्रष्टराज्यो लभेद् राज्यं नष्टवित्तो धनं लभेत्॥

यस्य रुष्टो गुरुर्देवो राजा वा बान्धवोऽथवा। तस्य तुष्टश्च वरद: स्तोत्रराजप्रसादत:॥

दस्युग्रस्तोऽहिग्रस्तश्च शत्रुग्रस्तो भयानक:। व्याधिग्रस्तो भवेन्मुक्त : स्तोत्रस्मरणमात्रत:॥

राजद्वारे श्मशाने च कारागारे च बन्धने। जलराशौ निमगन्श्च मुक्त स्तत्स्मृतिमात्रत:॥

स्वामिभेदे पुत्रभेदे मित्रभेदे च दारुणे। स्तोत्रस्मरणमात्रेण वाञ्िछतार्थ लभेद् ध्रुवम॥

कृत्वा हविष्यं वर्ष च स्तोत्रराजं श्रृणोति या। भक्त्या दुर्गा च सम्पूज्य महावन्ध्या प्रसूयते॥

लभते सा दिव्यपुत्रं ज्ञानिनं चिरजीविनम्। असौभाग्या च सौभाग्यं षण्मासश्रवणाल्लभेत्॥

नवमासं काकवन्ध्या मृतवत्सा च भक्ति त:। स्तोत्रराजं या श्रृणोति सा पुत्रं लभते धु्रवम्॥

कन्यामाता पुत्रहीना पञ्जमासं श्रृणोति या। घटे सम्पूज्य दुर्गा च सा पुत्रं लभते धु्रवम्॥

शिखा का महत्त्व

*चोटी का महत्व*

#चोटी (शिखा) का महत्त्व !
वैदिक धर्म में सिर पर शिखा (चोटी) धारण करने का असाधारण महत्व है। प्रत्येक बालक के जन्म के बाद मुण्डन संस्कार के पश्चात सिर के उस विशेष भाग पर गौ के नवजात बच्चे के खुर के प्रमाण आकार की चोटी रखने का विधान है।
यह वही स्थान होता है जहाँ सुषुम्ना नाड़ी पीठ के मध्य भाग में से होती हुई ऊपर की और आकर समाप्त होती है और उसमें से सिर के विभिन्न अंगों के वात संस्थान का संचालन करने को अनेक सूक्ष्म वात नाड़ियों का प्रारम्भ होता है।
सुषुम्ना नाड़ी सम्पूर्ण शरीर के वात संस्थान का संचालन करती है।
यदि इसमें से निकलने वाली कोई नाड़ी किसी भी कारण से सुस्त पड़ जाती है तो उस अंग को फालिज मारना कहते हैं। समस्त शरीर को शक्ति केवल सुषुम्ना नाड़ी से ही मिलती है।
सिर के जिस भाग पर चोटी रखी जाती है उसी स्थान पर अस्थि के नीचे लघुमस्तिष्क का स्थान होता है जो गौ के नवजात बच्चों के खुर के ही आकार का होता है और शिखा भी उतनी ही बड़ी उसके ऊपर रखी जाती है।
बाल गर्मी पैदा करते हैं। बालों में विद्युत का संग्रह रहता है जो सुषुम्ना नाड़ी को उतनी ऊष्मा हर समय प्रदान करते रहते हैं जितनी की उसे समस्त शरीर के वात-नाड़ी संस्थान को जागृत व उत्तेजित करने के लिए आवश्यकता होती है।
इससे मानव का वात नाड़ी संस्थान आवश्यकतानुसार जागृत रहते हुए समस्त शरीर को बल देता है। किसी भी अंग में *फालिज* पड़ने का भय नहीं रहता है और साथ ही लघुमस्तिष्क विकसित होता रहता है, जिसमें जन्म जन्मान्तरों के एवं वर्तमान जन्म के संस्कार संग्रहीत रहते हैं।
सुषुम्ना का जो भाग लघुमस्तिष्क को संचालित करता है, वह उसे शिखा द्वारा प्राप्त ऊष्मा से चैतन्य बनाता है, इससे स्मरण शक्ति भी विकसित होती है।
वेद में शिखा रखने का विधान कई स्थानों पर मिलता है, देखिये―
*शिखिभ्यः स्वाहा (अथर्ववेद १९-२२-१५)*
_*अर्थ*―चोटी धारण करने वालों का कल्याण हो।_
*यशसेश्रियै शिखा।-(यजु० १९-९२)*
*अर्थ*― _यश और लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए सिर पर शिखा धारण करें।_
*याज्ञिकैंगौर्दांणि मार्जनि गोक्षुर्वच्च शिखा।-(यजुर्वेदीय कठशाखा)*
*अर्थात्* _सिर पर यज्ञाधिकार प्राप्त को गौ के खुर के बराबर (गाय के जन्में बछड़े के खुर के बराबर) स्थान में चोटी रखनी चाहिये।_
*केशानां शेष करणं शिखास्थापनं।*
*केश शेष करणम् इति मंगल हेतोः ।।-(पारस्कर गृह्यसूत्र)*
*अर्थ*― _मुण्ड़़न संस्कार के बाद जब भी सिर के बाल कटावें, तो चोटी के बालों को छोड़कर शेष बाल कटावें, यह मंगलकारक होता है।_
और देखिये:-
*सदोपवीतिनां भाव्यं सदा वद्धशिखेन च ।*
*विशिखो व्युपवीतश्च यत् करोति न तत्कृतम् ।। ४ ।।*
-(कात्यायन स्मृति)
*अर्थ*― _यज्ञोपवीत सदा धारण करें तथा सदा चोटी में गाँठ लगाकर रखें। बिना शिखा व यज्ञोपवीत के कोई यज्ञ सन्ध्योपासनादि कृत्य न करें, अन्यथा वह न करने के ही समान है।_
बड़ी शिखा धारण करने से बल, आयु, तेज, बुद्धि, लक्ष्मी व स्मृति बढ़ती है।
एक अंग्रेज डाक्टर *विक्टर ई क्रोमर* ने अपनी पुस्तक _'विरिलकल्पक'_ में लिखा है,जिसका भावार्थ निम्न है:-
ध्यान करते समय ओज शक्ति प्रकट होती है। किसी वस्तु पर चिन्तन शक्ति एकाग्र करने से ओज शक्ति उसकी ओर दौडने लगती है।
यदि ईश्वर पर ध्यान एकाग्र किया जावे, तो मस्तिष्क के ऊपर शिखा के चोटी के मार्ग से ओज शक्ति प्रवेश करती है।
परमात्मा की शक्ति इसी मार्ग से मनुष्य के भीतर आया करती है।सूक्ष्म दृष्टि सम्पन्न योगी इन दोनों शक्तियों के असाधारण सुंदर रंग भी देख लेते हैं।
जिस स्थान पर शिखा होती है, उसके नीचे एक ग्रन्थि होती है जिसे पिट्टयूरी ग्रन्थि कहते हैं।इससे एक रस बनता है जो संपूर्ण शरीर व बुद्धि को तेज सम्पन्न तथा स्वस्थ एवं चिरंजीवी बनाता है। इसकी कार्य शक्ति चोटी के बड़े बालों व सूर्य की प्रतिक्रिया पर निर्भर करती है।
_डाक्टर क्लार्क ने लिखा है:-_
मुझे विश्वास हो गया है कि सनातनी  का हर एक नियम विज्ञान से भरा हुआ है। चोटी रखना हिन्दुओं का धार्मिक चिन्ह ही नहीं बल्कि सुषुम्ना की रक्षा के लिए ऋषियों की खोज का एक विलक्षण चमत्कार है।
शिखा गुच्छेदार रखने व उसमें गाँठ बांधने के कारण प्राचीन सनातनी  में तेज, मेधा बुद्धि, दीर्घायु तथा बल की विलक्षणता मिलती थी।
जब से अंग्रेजी कुशिक्षा के प्रभाव में भारतवासियों ने शिखा व सूत्र का त्याग कर दिया है उनमें यह शीर्षस्थ गुणों का निरन्तर ह्रास होता जा रहा है।
पागलपन, अन्धत्व तथा मस्तिष्क के रोग शिखाधारियों को नहीं होते थे, वे अब शिखाहीनों मैं बहुत देखे जा सकते हैं।
जिस शिखा व जनेऊ की रक्षा के लिए लाखों भारतीयों ने विधर्मियों के साथ युद्धों में प्राण देना उचित समझा, अपने प्राणों के बलिदान दिये।
महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, गुरु गोविन्दसिंह, आदि हजारों भारतीयों ने चोटी और जनेऊ की रक्षार्थ आत्म बलिदान देकर भी इनकी रक्षा मुस्लिम शासन के कठिन काल में की, उसी चोटी और जनेऊ को आज का मनुष्य बाबू टाईप का अंग्रेजीयत का गुलाम अपने सांस्कृतिक चिन्ह (चोटी और जनेऊ) को त्यागता चला जा रहा है, यह कितने दुःख की बात है।
उसे इस परमोपयोगी धार्मिक एवं स्वास्थयवर्धक प्रतीकों को धारण करने में ग्लानि व हीनता लगती है परन्तु अंग्रेजी गुलामी की निशानी ईसाईयत की वेषभूषा पतलून पहनकर खड़े होकर मूतने में उसे कोई शर्म महसूस नहीं होती है जो कि स्वास्थय की दृष्टि से भी हानिकारक है और भारतीय दृष्टि से घोर असभ्यता की निशानी है।
स्त्रियों के सिर पर लम्बे बाल होना उनके शरीर की बनावट तथा उनके शरीरगत विद्युत के अनुकूल रहने से उनको अलग से चोटी नहीं रखनी चाहिये। स्त्रियों को बाल नहीं कटाने चाहिए।
जय महादेव--!!

यज्ञोपवीत निर्माण विधिः*

*यज्ञोपवीत निर्माण विधिः*

यज्ञोपवीत किन्हीं परवर्ती ऋषियोंद्वारा निर्मित सूत्र नहीं था और न ही किसी सामाजिक या विद्याचिन्हके रूपमें स्थापित किया गया हैं | यज्ञोपवीत निर्माणकी जो विशेष प्रक्रिय् निश्चित की गयी हैं,वह स्पष्टतया यह प्रतिपादित करती हैं कि यज्ञोपवीत ईश्वरद्वारा द्विजातिको सौंपे गये उत्तरदायित्वोंके विर्वहणके लिये गुरुके सांनिध्यमें आवश्यक शिक्षा और योग्यता प्राप्त करने हेतु प्रस्थित होनेका उदात्त भावनाओंसे युक्त संकेत हैं | 
**यज्ञोपवीत निर्माण विधिः***-"  ग्रामाद्बहिस्तीर्थे गोष्ठे वा गत्वाऽनध्याय वर्जित पूर्वाह्णे"-( गाँवके बहार पवित्र जगह जहाँ पतितोंका अवागमन न हो(निर्जन),अथवा गोशालामें जाकर अनध्याय सूचित दिनोंको छोड़कर अन्य दिनोंमें पूर्वाह्नकालमें सुबह १०/४० से पहले(यज्ञोपवीत निर्माण करतें समय कमसे कम एक/सवा घंटा लगता हैं)-" कृतसंध्याष्टोत्तरशतं सहस्रं वा यथाशक्ति गायत्रीं जपित्वा"-( प्रातःसंध्यासमाप्तकर यज्ञोपवीत निर्माण अधिकार सिद्धिके लिये १०८/१००८ अथवा यथाशक्ति गायत्री मंत्रका संयमित होकर जप करैं)-" ब्राह्मणेन तत्कन्याया सुभगाया धर्मचारिण्या वा कृतं सूत्रमादाय"-( ब्राह्मण, ब्राह्मणकी कन्या,सौभाग्यवतीब्राह्मणी अथवा स्वधर्ममें श्रद्धा रखकर आचरण करनेवाली द्विज-स्त्री(अविच्छिन्न परम्परा कालक्रम से प्राप्त उपनयन-संस्कार से संस्कृत-द्विजों की पत्नी अर्थात् व्रात्यों की स्त्री नहीं ) से बना हुआ एकतारका सूत्र लें" *वर्त्तमानमें मिलना सम्भव न हों तो कहे गये सूत्रकारों से कुछ दक्षिणा देकर उनके हाथसे खरीदा हुआ सूत्र लें)-" भूरिति प्रथमां षष्णवतीं-"( बायें हाथकी चारों अंगुलीयोंके अँत्यपर्वोंपर ॐभूः -प्रथमव्याहृतिमंत्र पढकर ९६ बार वेष्टित कर वह चौआ ढाकके पत्तेपर रख दैं)-"भुवरितिद्वितीयां-"(ॐभुवः- द्वितीय व्याहृतिमंत्रपढकर पुनः दूसरीबार सूत्रसे ९६ चौआ लगायें वह भी दूसरे पलाशके पत्रमें रखें) -" स्वरितितृतीयांमीत्वा पृथक् पलाशपत्रे संस्थाप्य-"( ॐस्वः- तृतीय व्याहृतिमंत्र पढकर पुनः तीसरीबार सूत्रसे ९६ चौआ लगाकर वह भी  तीसरे ढाकके पत्तेपर रखें)-"आपोहिष्ठेति तिसृभिः,शं नो देवीत्यनेन सावित्र्या चाभिषिच्य"-( तीनोको तीर्थजल या शुद्धजलसे आपोहिष्ठा० १,जो वः शिवतमो ०२, तस्माऽअरङ्ग ०३… इन तीनोंमंत्रोसे शं नो देवी०मंत्रसे तथा गायत्रीमंत्रसे अभिषिक्त करैं)-" वामहस्ते कृत्वा त्रिः संताड्य"-( बायें हाथमें तीनों चौओंको लेकर दायें हाथसे तीनबार ताड़न करैं)-" व्याहृतिभिस्त्रिवणितं कृत्वा"-( ॐभूर्भुवःस्वः- इनतीन व्याहृति मंत्रोंसे तीनोके तारको एकजुट करकें तीनगुना करैं,-" इसमें दूसरे ब्राह्मण या खूटीकी आवश्यकता रहती हैं)-" पुनस्ताभिस्त्रिगुणितं कृत्वा"-( फिरसे उन तीनगुणे सूत्रको फिरसे तीनगुणा करनेसे नवतार हो जायेंगें इनको तकली(साधन)की मददसे  या दूसरे ब्राह्मणकी मददसे नवतारका एक दृढसूत्र बनायें )-" पुनस्त्रिवृतं कृत्वा"-( इस नवतारके सूत्रका " जिसको पहनाना हैं उनके कँधेसे कटीतकके माप अनुसार तीनगुना करैं)-" प्रणवेनग्रन्थिंकृत्वा"( ॐ इस प्रणवमंत्रसे ब्रह्मग्रन्थि लगावें(द्विरावृत्याथमध्ये वै अर्धवृत्यान्त देशतः ग्रन्थि प्रदक्षिणावर्ती सा ग्रन्थि ब्रह्मसंज्ञकः||- सूत्रके अन्त्यभागको सूत्रके अग्रभागके अँदरसे लेकर तीनों वृत्तोको प्रदक्षिणावत् दोबार लपैंटकर सूत्रकेअग्रभागमें आधी प्रदक्षिणवत् लपैटकर दृढगाँठ लगाना सूतके अग्रान्तभागपर दूसरी दो गाँठ लगायें), यह तीन धागेवालीं नवसूत्रकी एक जनेऊ हुई ऐसै ही दूसरी,तीसरी आदि जरुरीयात अनुसार बनाकर)-"ऑंकारमग्निं नागान् सोमं पितॄन् प्रजापतिं वायुं सूर्यं विश्वान् देवान् नवतन्तुषु क्रमेण विन्यस्य संपूजयेत् |-( ऑंकार,अग्नि,सोम,पितर,प्रजापति,वायु,सूर्य, विश्वेदेवों, का नवतन्तुओंमें तथा ग्रन्थिओंमें ब्रह्मा,विष्णु,रुद्रका क्रमसे न्यास करकें पूजन करैं)-" देवस्येत्युपवीतमादाय,-( देवस्यत्वा सवितुःइन आधे मंत्रसे यज्ञोपवीत को लेकर)-" उद्वयं तमसस्परीत्यादित्याय दर्शयित्वा-"( उद्वयं तम० इसमंत्रसे सूर्यनारायणको बताकर)-" यज्ञोपवीतमित्यनेन धारयेदित्याह भगवान्कात्यायनः||कात्यायनपरिशिष्ठ|| -"( यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं० इस मंत्रसे धारण करैं ऐसा भगवान् कात्यायन कहतें हैं| 

यह केवल यज्ञोपवीत निर्माणकी विधि बतायीं हैं- विस्तारसे यज्ञोपवीत-संस्कार का विधान अलगसे हैं| बाजारमें मिलतीं तैयार यज्ञोपवीतमें ऐसा कोई विधान नहीं हो सकता और न पवित्रता |


श्रीकालभैरवाष्टकं



 श्रीकालभैरवाष्टकं 

देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं
व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम् ।  var  बिन्दु
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ १॥

भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं
नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम् ।
कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ २॥

शूलटंकपाशदण्डपाणिमादिकारणं
श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् ।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ३॥

भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं
भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम् ।  var  स्थिरम्
विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं  var  निक्वणन्
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ४॥

धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकं  var  नाशनं
कर्मपाशमोचकं सुशर्मदायकं विभुम् ।
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभितांगमण्डलं  var  केशपाश, निर्मलं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ५॥

रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं
नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम् ।
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षदं  var  भूषणं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ६॥

अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं
दृष्टिपातनष्टपापजालमुग्रशासनम् ।
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ७॥

भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं
काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम् ।  var  काशिवासि
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ८॥

          ॥ फल श्रुति ॥

कालभैरवाष्टकं पठंति ये मनोहरं
ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम् ।
शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनं  var  लोभदैन्य
प्रयान्ति कालभैरवांघ्रिसन्निधिं नरा ध्रुवम् ॥

 var  ते प्रयान्ति कालभैरवांघ्रिसन्निधिं ध्रुवम् ॥

॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचर्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ
श्री कालभैरवाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

मूर्ति पूजा मोक्षप्रद

*मूर्ति पूजा मोक्षप्रद है*

============== *स्मार्त प्रतीकोपासना मोक्षप्रद है* ==============
स्मार्त प्रतीक अथवा प्रतिमा अवलंबन कर जो उपासना होती है, उसमें साधक शास्त्रनिर्दिष्ट आकृतिविशेष प्रतिमा में आरोपित करते है, यथा - शालग्राम में सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायण, शिवलिंग में रजतगिरिनिभ महेश्वर के आरोप इत्यादि ।
इस प्रकार आरोपद्वारा ध्यान श्रुति में भी विहित है -
// हिरण्मयः पुरुषः दृश्यते // ~ छान्दोग्य उप. १.६.६, इत्यादि ।
परमेश्वर एतादृश आकाररूप उपाधि अवलंबन कर उपासना करनेवाले जीव को दर्शनदानकरतः कृतार्थ करते है - यह भी श्रुति में प्रसिद्ध है, यथा -
// स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां हैमवतीं // ~ केन उप. ३.१२, इत्यादि ।
प्रवर्तक साधक प्रतिमादि प्रतीकावलंबन कर उपासना में प्रवृत्त हो तो प्रथमावस्था में उक्त प्रतिमारूप प्रतीक ही प्रधान रहता है, उसके बिना वह ईश्वरचिंतन करने में असमर्थ है । यही अधिष्ठानप्रधान #अध्यासोपासना है ।
चक्षु में अञ्जन प्रयुक्त होनेपर जैसे सूक्ष्मवस्तु प्रत्यक्ष करने का सामर्थ्य मिलता है - 
// यथाग्निना हेम मलं जहाति ध्मातं पुनः स्वं भजते च रूपम् । आत्मा च कर्मानुशयं विधूय मद्‍भक्तियोगेन भजत्यथो माम् ॥ २५ ॥ //
~ श्रीमद्भागवत ११.१४.२५-२६
तद्रूप उक्त प्रकार से उपासना द्वारा साधक के चित्त क्रमशः सूक्ष्मवस्तु की धारणा करने में समर्थ बनता है -
// जपस्तु त्रिविधः प्रोक्तो वाचिकोपांशुमानसः ।। त्रिविधेऽपि च विप्रेन्द्र पूर्वात्पूर्वात्परो वरः ।। ३३-९२ ।। मंत्रस्योच्चारणं सम्यक्स्फुटाक्षरपदं यथा ।।जपस्तु वाचिकः प्रोक्तः सर्वयज्ञफलप्रदः ।। ३३-९३ ।। मंत्रस्योच्चारणे किंचित्पदात्पदविवेचनम् । स तूपांशुर्जपः प्रोक्तः पूर्वस्माद्द्विगुणोऽधिकः ।। ३३-९४ ।। विधाय ह्यक्षरश्रेण्यां तत्तदर्थविचारणम् ।। स जपोमानसः प्रोक्तो योगसिद्धिप्रदायकः ।। ३३-९५ ।। जपेन देवता नित्यं स्तुवतः संप्रसीदति । //
~ नारदपुराण, पूर्वार्ध, अध्याय ३३, श्लोक ९२-९५
साधक के बाह्य जप क्रमशः मानस जप एवं बाह्य पूजा मानस पूजा में परिणत होती है । इसमें यह प्रमाण है -  
// योगाज्जितेंद्रियग्रामस्तानि हृत्वा दृढं हृदि ।। आत्मानं परमं ध्यायेत्सर्वधातारमच्युतम् ।। ३३-३३ ।। //
~ नारदपुराण, पूर्वार्ध, अध्याय ३३, श्लोक १३३-१३६
// प्रत्यक्षीकृत्य हृदये हृदिस्थां पूजयेच्छिवाम् । // ~ मुण्डमाला तन्त्र
// अन्तःपूजा महेशानि बाह्यात् कोटिगुणं भवेत् // ~ भूतशुद्धि तन्त्र
// नित्यान्तर्यजनं कृत्वा साक्षाद्ब्रह्ममयो भवेत् // ~ शाक्तानन्दतरंगिनी, इत्यादि
उपरोक्त अवस्था में उपनीत साधक देवता के तत्-तत् रूपविशेष का ध्यान में निविष्ट रहते है ; तब आरोप्य देवतारूप ही उनके निकट प्रधान एवं प्रतीक अप्रधान होता है । यही है आरोप्यप्रधान #सम्पदुपासना ।
इस तरह अंतर्यजन में प्रवृत्त साधक क्रमशः बाह्य प्रतिमादि प्रतीकनिरपेक्ष होकर स्वीय ह्रदयस्थ देवता के मानसयजन में तन्मय रहता है, बाह्य पूजा का पर्यवसान नाममात्र में होती है एवं वह उपासक के स्वान्तस्थः देवता का स्मारक एवं उद्दीपकरूप में ही अवस्थान करती है । तब वह -
// अष्टारे हृत्सरोजे तु द्वादशांगुलविस्तृते ।। ध्यायेदात्मानमव्यक्तं परात्परतरं विभुम् ।। ३३-३७ ।। श्रीवत्सवक्षसं देवं सुरासुरनमस्कृतम् ।। ३३-३६ ।। //
~ नारदपुराण, पूर्वार्ध, अध्याय ३३, श्लोक ९२-९५
स्वीय इष्टदेवता के -
// हृत्पद्मं आसनं दद्यात् , सहस्राराच्यूतामृतैः पाद्यं चरणयोः दद्यात् //
~ महानिर्वाणतन्त्र ५.१४३,
इत्यादि रीति से मानसपूजा में ही तन्मय रहते है । इस अवस्था में उपनीत साधक #प्रतीकोपासना_के_स्तर_का_अतिक्रमण करते है । तब -
// लोहमाकर्षको यथा // ~ विष्णु पुराण ६.७.३०
- चुम्बक जैसे लौह को आकर्षण करता है, तद्रूप साधक के चित्त सर्वतोभाव से स्वान्तस्थ देवता के प्रति आकृष्ट होता है ।
इस प्रकार परम प्रेमाष्पद के प्रति धावितचित्त साधक -
// तस्यैवाहं ममैवासौ स एवाहमिति त्रिधा । भगवच्छरणत्वं स्यात् साधनाभ्यास पाकतः ।। //
~ न्यायरत्नावली अष्टम श्लोक
इत्यादि शास्त्रप्रतिपादित रीति से सर्वप्रथम " हम उनके है ", अतःपर साधनाभ्यास की परिपक्क्वतावशतः " वह मेरा है " एवं अभ्यास और भी परिपक्क्व होनेपर अंत में " वह ही मैं और मैं ही वह " - इस प्रकार से श्रीभगवान् में ही निविष्टचित्त हो जाते है ।
शेषोक्त अवस्था में उपनीत साधक के प्रति शास्त्र #अहंग्रहोपासना का विधान करता है ।
यथा - // अहमेव परो विष्णुः मत्सर्वमिदं जगत् इति यः सततं पश्येत्तं विद्यादुत्तमोत्तमम् //
~ न्यायरत्नावली अष्टम श्लोक में उद्धृत बृहन्नारदीय पुराणवचन
तद्विषयक अन्य शास्त्रवाक्य यह है -
// यदा च धारणा तस्मिन्न् अवस्थानवती ततः। किरीटकेयूरमुखैर्भूषणै रहितं स्मरेत्॥ तदैकावयवं देवं सोऽहं चेति पुनर्बुधः। कुर्यात् ततोह्यsहमिति प्रणिधानपरो भवेत्॥ //
~ विष्णुपुराणम् , ६.७.८६-८८
यही अहंग्रहोपासना है इस साधना के अंत में साधक -
// भवेन्निरन्तरं ध्यानादभेदप्रतिपादनम् ।। ३३-४२ ।। //
~ नारदपुराण, पूर्वार्ध, अध्याय ३३, श्लोक १४२
- इस प्रकार से स्वीय इष्टदेवता के साथ स्वीय अभिन्नता का अनुभव करते है । भगवद्कृपा के प्रभाव से इस प्रकार के ध्यानसिद्ध साधक ही साधना में सिद्धिलाभ कर सकता है ।
शास्त्र में सिद्धावस्था का वर्णन इस प्रकार है -
// ब्रजतोस्तिष्ठतोऽन्यद् वा स्वेच्छया कर्म कुर्वतः। नापयाति यदा चित्तं सिद्धां मन्येत तां तदा //
~ विष्णुपुराणम् ६.७.७७.८५
एतादृश सिद्ध साधक की श्रौत दहरादि अहंग्रहोपासकों की तरह सायूज्यमुक्ति, देवयानमार्ग से ब्रह्मलोक में गति और क्रममुक्ति लब्ध होती है, क्योंकि श्रुतिमें अहंग्रहोपासकों के लिए ही इस प्रकार की गति कहा है ।
ध्यान देना चाहिए - ' #साधनाधिक्य_से_फलाधिक्य ' नियम युक्तिसंगत होनेसे सगुणपरब्रह्म की अहंग्रहोपासना ही ईश्वरसायूज्यद्वार से क्रममुक्ति में हेतु है ;
अतएव अपरिपक्क्व एवं न्यूनगुणयोग में अभ्यस्त श्रौत दहरादि उपासना के फलस्वरुप जिस प्रकार सालोक्यादि मुक्ति लब्ध होती है, सख्यदास्यादि भेदभावावगाही स्मार्त उपासना के फलस्वरुप उसी प्रकार सालोक्यादि मुक्ति ही लब्ध होगी, सायूज्य एवं क्रममुक्ति नहीं ।
इस प्रकार से प्रतीकावलंबनात्मक उपासना आरब्ध होनेपर भगवद्कृपा से साधक को ईश्वरसायूज्य एवं क्रममुक्ति लब्ध होती है । और निर्गुणब्रह्मविज्ञान का उदय होकर सद्योमुक्ति का लाभ भी हो सकता है - यह विष्णुपुराण ६.७.९२-९६, बृहन्नारदीय पुराण ३१.१४२-१४८ इत्यादि स्थलों पर द्रष्टव्य ।

प्रात: स्मरणम्


।। प्रात: स्मरणम् ।।

प्रात: स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं
सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम् ।
यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं
तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसंघ:।।1।।

प्रातर्भजामि मनसा वचसामगम्यं
वाचो विभान्ति निखिला यदनुग्रहेण।
यन्नेतिनेतिवचनैर्निगमा अवोचं-
स्तं देवदेवमजमच्युतमाहुरग्रय्म् ।।2।।

प्रातर्नमामि तमस:परमर्कवर्णं
पूर्णं सनातनपदं पुरुषोत्तमाख्यम् ।
यस्मिन्निदं जगदशेषमशेषमूर्तौ
रज्ज्वां भुजंगम इव प्रतिभासितं वै।।3।।

श्लोकत्रयमिदं पुण्यं लोकत्रयविभूषणम् ।
प्रात:काले पठेद्यस्तु स गच्छेत्परमं पदम् ।।4।।

।।इति श्रीमच्छंकरभगवत: कृतौ परब्रह्मण: प्रात:स्मरणस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

जगन्नाथाष्टकम्



 ।।जगन्नाथाष्टकम्।।

कदाचित् कालिन्दी तट विपिन सङ्गीतकवरो
मुदाभीरी नारी वदन कमला स्वाद मधुपः ।
रमाशम्भुब्रह्मामरपति गणेशार्च्चितपदो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥१॥

भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे
दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं विदधते ।
सदा श्रीमद्‍-वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥२॥

महाम्भोधेस्तीरे कनक रुचिरे नील शिखरे
वसन् प्रासादान्तः सहज बलभद्रेण बलिना ।
सुभद्रा मध्यस्थः सकलसुर सेवावसरदो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥३॥

कृपा पारावारः सजल जलद श्रेणिरुचिरो
रमा वाणी रामः स्फुरदमल पङ्केरुहमुखः ।
सुरेन्द्रैर् आराध्यः श्रुतिगण शिखा गीत चरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥४॥

रथारूढो गच्छन् पथि मिलित भूदेव पटलैः
स्तुति प्रादुर्भावम् प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः ।
दया सिन्धुर्बन्धुः सकल जगतां सिन्धु सुतया
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥५॥

परंब्रह्मापीड़ः कुवलय-दलोत्‍फुल्ल-नयनो
निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि ।
रसानन्दी राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥६॥

न वै याचे राज्यं न च कनक माणिक्य विभवं
न याचेऽहं रम्यां सकल जन काम्यां वरवधूम् ।
सदा काले काले प्रमथ पतिना गीतचरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥७॥

हर त्वं संसारं द्रुततरम् असारं सुरपते
हर त्वं पापानां विततिमपरां यादवपते ।
अहो दीनेऽनाथे निहित चरणो निश्चितमिदं
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥८॥

॥ इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं जगन्नाथाष्टकं संपूर्णम् ॥

संक्षिप्तयज्ञोपवीतधारणविधिः

*संक्षिप्तयज्ञोपवीतधारणविधिः*


आचम्य ! प्राणानायम्य ! संकल्पः अत्राद्य....मासे....पक्षे....तिथौ....वासरे एवं ग्रहगणविशेषेण विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ मम अमुकगोत्रोत्पन्नस्य अमुकशर्मणः (वर्मणः, गुप्तस्य वा) श्रौतस्मार्तकर्मानुष्ठानसिद्धयर्थं अमुक कर्मांगत्वेन नवीनं यज्ञोपवीतंधारणं अहं करिष्ये !

*यज्ञोपवीतप्रक्षालनम्*- ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता नSउर्जे दधातन ! महेरणाय चक्षसे !!

*यज्ञोपवीतं करसंपुटे धृत्वा *दशवारं गायत्रीं जपेत् !*

*तंतुदेवता-आवाहनम्-*
 
प्रथमतंतौ ॐ काराय नमः ॐ कारं आवाहयामि स्थापयामि !

द्वितीयतंतौ अग्नये नमः अग्निं आवाहयामि स्थापयामि !

तृतीयतंतौ नागेभ्यो नमः  नागान् आवाहयामि स्थापयामि !

चतुर्थतंतौ सोमाय नमः सोमं आवाहयामि स्थापयामि !

पंचमतंतौ पितृभ्यो नमः पितृन् आवाहयामि स्थापयामि !

षष्ठतंतौ प्रजापतये नमः प्रजापतिं आवाहयामि स्थापयामि !

सप्तमतंतौ अनिलाय नमः अनिलं आवाहयामि स्थापयामि !

अष्ठमतंतौ यमाय नमः यमं आवाहयामि स्थापयामि !

नवमतंतौ विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः विश्वान् देवान् आवाहयामि स्थापयामि !

पज्ञोपवीतग्रंथिमध्ये ब्रह्मविष्णुरूद्रेभ्यो नमः ब्रह्मविष्णुरूद्रान् आवाहयामि स्थापयामि !

ऋग्वेदं प्रथमदोरके न्यसामि !
यजूर्वेदं द्वितीयदोरके न्यसामि !
सामवेदं तृतीयदोरके न्यसामि !
अथर्ववेदं ग्रन्थौ न्यसामि !

आवाहितदेवताः सुप्रतिष्ठिताः वरदाः भवत ! पंचोपचारैः मानसोपचारैः वा पूजनम् !

*ध्यानम्-* प्रजापतेर्यत् सहजं पवित्रं कार्पाससूत्रोद्भवब्रह्मसूत्रम् !
ब्रह्मत्वसिद्धयै च यशःप्रकाशं जपस्य सिद्धिं कुरू ब्रह्मसूत्रम् !!

*सूर्याय दर्शयेत्-* 

  *मंत्र-*  तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् ! पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत घू शृणुयाम शरदः शतं प्र ब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् !!

       *यज्ञोपवीतधारणं*

विनियोगः - यज्ञोपवीतमिति मंत्रस्य परमेष्ठी ऋषिः लिंगोक्ता देवता त्रिष्टुप् छन्दः यज्ञोपवीतधारणे विनियोगः !

श्लोकं-

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात् !
आयुष्यमग्नं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः !!

यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि ! 

यज्ञोपवीतं धारयित्वा आचमनं ! 
द्वे त्रीणि वा धारयेत !

    *जीर्णयज्ञोपवीतत्यागः-*

एतावद्दिनपर्यंतं ब्रह्म त्वं धारितं मया !
जीर्णत्वात् त्वत्परित्यागो गच्छ सूत्र यथा सुखम् !!

शुद्धभूमौ निधाय यथाशक्तिं गायत्रीजपं कुर्यात् ! 

*अर्पणम्-*

अनेन गायत्रीजपकर्मणा श्रीसवितादेवता प्रीयताम् !

*संकल्प-*

अनेन कर्मणा मम श्रौतस्मार्तकर्म अनुष्ठान सिद्धिद्वारा श्री भगवान परमेश्वरः प्रीयतां न मम।।

द्वादशज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रम्

*श्रीमद आद्य शंकराचार्य विरचित स्तोत्र माला - स्तोत्र ६०*

|| द्वादशज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रम् ||

सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम् ।
भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये ॥ १॥

श्रीशैलशृङ्गे विबुधातिसङ्गे तुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा वसन्तम् ।
तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम् ॥ २॥

अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम् ।
अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम् ॥ ३॥

कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय ।
सदैवमान्धातृपुरे वसन्तमोङ्कारमीशं शिवमेकमीडे ॥ ४॥

पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम् ।
सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि ॥ ५॥

याम्ये सदङ्गे नगरेऽतिरम्ये विभूषिताङ्गं विविधैश्च भोगैः ।
सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये ॥ ६॥

महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः ।
सुरासुरैर्यक्ष महोरगाढ्यैः केदारमीशं शिवमेकमीडे ॥ ७॥

सह्याद्रिशीर्षे विमले वसन्तं गोदावरितीरपवित्रदेशे ।
यद्धर्शनात्पातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीडे ॥ ८॥

सुताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिखैरसंख्यैः ।
श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि ॥ ९॥

यं डाकिनिशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च ।
सदैव भीमादिपदप्रसिद्दं तं शङ्करं भक्तहितं नमामि ॥ १०॥

सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम् ।
वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये ॥ ११॥

इलापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन् समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम् ।
वन्दे महोदारतरस्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शरणम् प्रपद्ये ॥ १२॥

ज्योतिर्मयद्वादशलिङ्गकानां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण ।
स्तोत्रं पठित्वा मनुजोऽतिभक्त्या फलं तदालोक्य निजं भजेच्च ॥

  ॥ इति श्रीमद्शङ्कराचार्यविरचितं
द्वादशज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्री भगवान परशुराम चालीसा

●●ॐ●●
■ॐ■ श्री परशुराम चालीसा ■ॐ■
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दोहा --
श्री गुरु चरण सरोज छवि, निज मन मन्दिर धारि।
सुमरि गजानन शारदा, गहि आशिष त्रिपुरारि।।
बुद्धिहीन जन जानिये, अवगुणों का भण्डार।
बरणौं परशुराम सुयश, निज मति के अनुसार।।

चौपाई ---
जय प्रभु परशुराम सुख सागर, जय मुनीश गुण ज्ञान दिवाकर।
भृगुकुल मुकुट बिकट रणधीरा, क्षत्रिय तेज मुख संत शरीरा।
जमदग्नी सुत रेणुका जाया, तेज प्रताप सकल जग छाया।
मास बैसाख सित पच्छ उदारा, तृतीया पुनर्वसु मनुहारा।

प्रहर प्रथम निशा शीत न घामा, तिथि प्रदोष व्यापि सुखधामा।
तब ऋषि कुटीर रुदन शिशु कीन्हा, रेणुका कोखि जनम हरि लीन्हा।
निज घर उच्च ग्रह छः ठाढ़े, मिथुन राशि राहु सुख गाढ़े।
तेज-ज्ञान मिल नर तनु धारा, जमदग्नी घर ब्रह्म अवतारा।

धरा राम शिशु पावन नामा, नाम जपत लग लह विश्रामा।
भाल त्रिपुण्ड जटा सिर सुन्दर, कांधे मूंज जनेऊ मनहर।
मंजु मेखला कठि मृगछाला, रुद्र माला बर वक्ष विशाला।
पीत बसन सुन्दर तुन सोहें, कंध तुरीण धनुष मन मोहें।

वेद-पुराण-श्रुति-स्मृति ज्ञाता, क्रोध रूप तुम जग विख्याता।
दायें हाथ श्रीपरसु उठावा, वेद-संहिता बायें सुहावा।
विद्यावान गुण ज्ञान अपारा, शास्त्र-शस्त्र दोउ पर अधिकारा।
भुवन चारिदस अरु नवखंडा, चहुं दिशि सुयश प्रताप प्रचंडा।

एक बार गणपति के संगा, जूझे भृगुकुल कमल पतंगा।
दांत तोड़ रण कीन्ह विरामा, एक दन्द गणपति भयो नामा।
कार्तवीर्य अर्जुन भूपाला, सहस्रबाहु दुर्जन विकराला।
सुरगऊ लखि जमदग्नी पाही, रहिहहुं निज घर ठानि मन माहीं।

मिली न मांगि तब कीन्ह लड़ाई, भयो पराजित जगत हंसाई।
तन खल हृदय भई रिस गाढ़ी, रिपुता मुनि सौं अतिसय बाढ़ी।
ऋषिवर रहे ध्यान लवलीना, निन्ह पर शक्तिघात नृप कीन्हा।
लगत शक्ति जमदग्नी निपाता, मनहुं क्षत्रिकुल बाम विधाता।

पितु-बध मातु-रुदन सुनि भारा, भा अति क्रोध मन शोक अपारा।
कर गहि तीक्षण पराु कराला, दुष्ट हनन कीन्हेउ तत्काला।
क्षत्रिय रुधिर पितु तर्पण कीन्हा, पितु-बध प्रतिशोध सुत लीन्हा।
इक्कीस बार भू क्षत्रिय बिहीनी, छीन धरा बिप्रन्ह कहँ दीनी।

जुग त्रेता कर चरित सुहाई, शिव-धनु भंग कीन्ह रघुराई।
गुरु धनु भंजक रिपु करि जाना, तब समूल नाश ताहि ठाना।
कर जोरि तब राम रघुराई, विनय कीन्ही पुनि शक्ति दिखाई।
भीष्म द्रोण कर्ण बलवन्ता, भये शिष्य द्वापर महँ अनन्ता।

शस्त्र विद्या देह सुयश कमावा, गुरु प्रताप दिगन्त फिरावा।
चारों युग तव महिमा गाई, सुर मुनि मनुज दनुज समुदाई।
दे कश्यप सों संपदा भाई, तप कीन्हा महेन्द्र गिरि जाई।
अब लौं लीन समाधि नाथा, सकल लोक नावइ नित माथा।

चारों वर्ण एक सम जाना, समदर्शी प्रभु तुम भगवाना।
लहहिं चारि फल शरण तुम्हारी, देव दनुज नर भूप भिखारी।
जो यह पढ़ै श्री परशु चालीसा, तिन्ह अनुकूल सदा गौरीसा।
पूर्णेन्दु निसि बासर स्वामी, बसहुं हृदय प्रभु अन्तरयामी।

दोहा --
परशुराम को चारु चरित, मेटत सकल अज्ञान।
शरण पड़े को देत प्रभु, सदा सुयश सम्मान।।

श्लोक --
भृगुदेव कुलं भानुं, सहस्रबाहुर्मर्दनम्।
रेणुका नयनानंदं, परशुं वन्दे विप्रधनम्।।
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राज राजेश्वर भगवान परशुराम जी
           की जय जय जय ।।
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यग्योपवित माहात्म्य

जनेऊ:........
जनेऊ क्यों पहनते हैं, जानिए..

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥

जनेऊ क्या है :
आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। जनेऊ को संस्कृत भाषा में 'यज्ञोपवीत' कहा जाता है। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे।
तीन सूत्र क्यों : जनेऊ में मुख्‍यरूप से तीन धागे होते हैं। प्रथम यह तीन सूत्र त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं। द्वितीय यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं और तृतीय यह सत्व, रज और तम का प्रतीक है। चतुर्थ यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है। पंचम यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।

ब्रह्मसूत्र क्या है ? 
 
जनेऊ (यज्ञोपवीत) को ब्रह्मसूत्र, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध और बलबन्ध भी कहते हैं। वेदों में भी जनेऊ धारण करने की हिदायत दी गई है। इसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं। 'उपनयन' का अर्थ है, पास या निकट ले जाना। जनेऊ धारण करने वाला व्यक्ति ब्रह्मा(परमात्मा) के प्रति समर्पित हो जाता है | जनेऊ धारण करने के बाद व्यक्ति को विशेष नियम आचरणों का पालन करना पड़ता है |

नौ तार : यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्‍या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं। हम मुख से अच्छा बोले और खाएं, आंखों से अच्छा देंखे और कानों से अच्छा सुने।

पांच गांठ : 
यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक भी है।

जनेऊ की लंबाई : 
यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि।

जनेऊ धारण वस्त्र : 
जनेऊ धारण करते वक्त बालक के हाथ में एक दंड होता है। वह बगैर सिला एक ही वस्त्र पहनता है। गले में पीले रंग का दुपट्टा होता है। मुंडन करके उसके शिखा रखी जाती है। पैर में खड़ाऊ होती है। मेखला और कोपीन पहनी जाती है।कब पहने जनेऊ : जिस दिन गर्भ धारण किया हो उसके आठवें वर्ष में बालक का उपनयन संस्कार किया जाता है। जनेऊ पहनने के बाद ही विद्यारंभ होता है, लेकिन आजकल गुरु परंपरा के समाप्त होने के बाद अधिकतर लोग जनेऊ नहीं पहनते हैं तो उनको विवाह के पूर्व जनेऊ पहनाई जाती है। लेकिन वह सिर्फ रस्म अदायिगी से ज्यादा कुछ नहीं, क्योंकि वे जनेऊ का महत्व नहीं समझते हैं।

।।यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत।।

अर्थात : अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है। हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके ही इसे उतारें।

* किसी भी धार्मिक कार्य, पूजा-पाठ, यज्ञ आदि करने के पूर्व जनेऊ धारण करना जरूरी है।
* विवाह तब तक नहीं होता जब तक की जनेऊ धारण नहीं किया जाता है।
* जब भी मूत्र या शौच विसर्जन करते वक्त जनेऊ धारण किया जाता है।
जनेऊ संस्कार का समय : माघ से लेकर छ: मास उपनयन के लिए उपयुक्त हैं। प्रथम, चौथी, सातवीं, आठवीं, नवीं, तेरहवीं, चौदहवीं, पूर्णमासी एवं अमावस की तिथियां बहुधा छोड़ दी जाती हैं। सप्ताह में बुध, बृहस्पति एवं शुक्र सर्वोत्तम दिन हैं, रविवार मध्यम तथा सोमवार बहुत कम योग्य है। किन्तु मंगल एवं शनिवार निषिद्ध माने जाते हैं।

मुहूर्त :
नक्षत्रों में हस्त, चित्रा, स्वाति, पुष्य, घनिष्ठा, अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, श्रवण एवं रवती अच्छे माने जाते हैं। एक नियम यह है कि भरणी, कृत्तिका, मघा, विशाखा, ज्येष्ठा, शततारका को छोड़कर सभी अन्य नक्षत्र सबके लिए अच्छे हैं।

पुनश्च: : पूर्वाषाढ, अश्विनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, ज्येष्ठा, पूर्वाफाल्गुनी, मृगशिरा, पुष्य, रेवती और तीनों उत्तरा नक्षत्र द्वितीया, तृतीया, पंचमी, दसमी, एकादसी, तथा द्वादसी तिथियां, रवि, शुक्र, गुरु और सोमवार दिन, शुक्ल पक्ष, सिंह, धनु, वृष, कन्या और मिथुन राशियां उत्तरायण में सूर्य के समय में उपनयन यानी यज्ञोपवीत यानी जनेऊ संस्कार शुभ होता है।

जनेऊ के नियम :
1. यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए।
2. यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।
3. जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएं भी यज्ञोपवीत संभाल सकती हैं; किन्तु उन्हें हर मास मासिक शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है।
4.यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है।
5.देव प्रतिमा की मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए।

जनेऊ का वैज्ञानिक महत्व :
 वैज्ञानिक दृष्टि से जनेऊ पहनना बहुत ही लाभदायक है। यह केवल धर्माज्ञा ही नहीं, बल्कि आरोग्य का पोषक भी है, अत: इसको सदैव धारण करना चाहिए।

* ‍चिकित्सकों अनुसार यह जनेऊ के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।

* जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति नियमों में बंधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है। इसी कारण जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है।

* मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसें, जिनका संबंध पेट की आंतों से होता है, आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है, जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय के रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते।

* चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।

* वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।

* कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है।
* कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।

* माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है। जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।

* जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है। यह मन को बुरे कार्यों से बचाती है। कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से दूर रहने लगता है।

* विद्यालयों में बच्चों के कान खींचने के मूल में एक यह भी तथ्य छिपा हुआ है कि उससे कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है। इसलिए भी यज्ञोपवीत को दायें कान पर धारण करने का उद्देश्य बताया गया है।आप ने पूरी पोस्ट पढ़ी इसके लिए बहुत बहुत 

ये लेख जिस विद्वान ने लिखा हे उनका आभार 
जय माँ

शिवलिंग माहात्म्य

नमामि देवी नर्मदे
पारद शिब लिंग ही क्यों ?
शिव प्रसादेन बिना न बुद्धिः शिव प्रसादेन बिना न युक्तिः
शिव प्रसादेन बिना न सिद्धिः शिव प्रसादेन बिना न मुक्तिः
जब शिव की बात आयी है तो निश्चय ही शिव लिंग की आवस्यकता है ..और वोह शिव लिंग कोई ऐसा वैसा नहीं .. पारद शिवलिंग ही होना चाहिए साधना करने के लिए ..वर्ना ...(..<>..)
किन्तु ..
पारद शिब लिंग ही क्यों ?
और कोई लिंग क्यों नहीं ?
सर्व श्रेष्ठ शिव लिंग पारद शिवलिंग ही क्यों है ?
मेरे आत्मन !
पारद शिवलिंग ,पारद विग्रह ,पारद गुटिका .. आजकल के साधना लगता है इन्ही सामग्रियो में ही सिमट के रह गया है ..
सब लगे हुए है साधना करने में .. पूर्व जन्म साधना .. लक्ष्मी साधना , भैरव साधना , महा विद्या साधना , यह साधना वोह साधना .. साधना साधना और बस साधना ...इनको देख कर ऐसा लगता है जैसे की साधको का बाड़ आ गया है मेरे भारत में ...
मै यह नहीं कहता की साधना नहीं करना चाहिए ..किन्तु साधना किसे कहते है इसे समझ कर ही करना श्रेष्ठ है .. अन्यथा समय की बर्बादी के सिवा और कुछ नहीं ...
साध लेना ही साधना है .. किसे साध ना है ? अपने साध्य आराध्य अपने इष्ट को साध ना होता है साधना द्वारा ..
किन्तु ज्यादातर लोगो देखता हूँ आज एक साधना शुरू कर दिया जाप ख़त्म तो दूसरी साधना शुरू ..
आज माँ तारा की साधना कर के उठे तो दुसरे दिन किसी भुत प्रेत की करने लग जाते है ..
बड़ा ही अजीव प्राणी होते है ऐसे लोग ..
यह लोग अपने अराध्य का साधना करने के बाद (कुछ दिन जिव्हा से बस मंत्र उच्चारण ) ऐसा भाव दिखाते है जैसे की वेह इंद्र की गद्दी पे बैठ गए है ..
मैंने पूछा किसी से की भाई कैसे चल रहा है सब कुछ ?
उधर से जवाब आया ..अरे आचार्य जी कल ही मैंने अघोर लक्ष्मी की साधना संपन्न करके उठा ...
लो भाई मैंने उस से पूछा था क्या की साधना कर रहे हो की नहीं ?
किन्तु यह लोग फिर भी बताते रहते है मुझे ..आज यह किया कल का यह प्लान है ..
साला साधना भी अब प्लान करके होने लगा ..
हाहाहा हंसी आता है मुझे इन सब को देख कर .(अब आप मुझे अहंकारी समझ सकते हो मेरा बोलने का ढंग देख कर) ..
और सब बड़े मजे की बात बताऊ ?
इन लोगो को अपने आप से ज्यादा अपने गुरु ,इष्ट से ज्यादा इन तथाकथित "साधना सामग्रियो" पर ज्यादा बिश्वास है ..
इन्हें शुद्ध अष्ट संस्कारो से युक्त स्वर्ण ग्रास करने वाला पारद से बना लिंग चाहिए साधना करने के लिए ..
अबे सालो खुद के लिंग का तो सम्मान कर नहीं पाते ..तुम लोग क्या खाक शिवलिंग पर साधनाए करोगे .. (मुझे इसी भाषा में बात करने की आदत है )
चलिए जाने दीजिये इन सब बातो को भैंस के आगे नागिन डांस करके कोई फायदा नहीं ..
तो कहाँ था मै?
हां ..पारद शिवलिंग ...
शास्त्रों अनुसार इस ब्रह्माण्ड में अगर कोई शिव लिंग सर्व श्रेष्ठ है तो वेह द्वादश ज्योतिर लिंग ही है .. और कोई भी शिव लिंग द्वादश ज्योतिर्लिंग का मुकाबला कर ही नहीं सकता ..( यह लाइन आप के बुद्धि को देख कर बुद्धि से कहा )
अगर पारद से बना लिंग ही सर्व श्रेष्ठ होता तो द्वादश ज्योतिलिंग भी पारद के ही बने होते पत्थर के नहीं ..(इस लाइन को ध्यान से समझो ) ..क्या जरुरत था शिव जी को पत्थर के लिंग देने की भगवान रावण को .. ?
राम जी भी रावण वध हेतु मिटटी से क्यों बनाया लिंग ? अगर वेह चाहते तो पारद का ही लिंग बना लेते ? तब यूँ ही बार बार समुद्र में बह तो नहीं जाता ?
उन्होंने इस लिए नहीं बनाया क्योंकि उन्हें पता था की लिंग चाहे किसी से भी बना हो यदि उस पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास हो तो अघोरेश्वर अवस्य अमोघ कवच से कवचित करेंगे ही करेंगे ..
किन्तु हम लोग लगे हुए है पारद पारद चिल्लाने में ...मुझे इतने तोले का चाहिए .मुझे इतने पैसे में चाहिए ..कोई कहता है मुझे इतने किलो का चाहिए .. सबको शिवलिंग चाहिए ..क्यों चाहिए क्योंकि अभी के ज्ञानी जनों ने कहा है एक मात्र इसी लिंग पर ही साधना फलीभूत होगा .. (भाड़ में जाय ऐसे भ्रम ज्ञानी)
अरे मै खुला चैलेंज देता हु "आप' जैसे साधको की कितनी भी संस्कारो वाला ले आओ कुछ भी मिलने वाला नहीं ..
अरे शिव जी तो इतने दानी है की क्या बताये ..केवल मात्र पार्थिव लिंग पर भक्ति से एक अंजुली जल चढ़ा देने से ही आप को शिव लोक में स्थान दे देते है ..और आप है की अब भी लगे हुए है ?
अब आप पूछेंगे की ..तो हम कहाँ जाय ? क्या करे ? किस शिवलिंग पर साधना करे ?
मेरा उत्तर है .."नर्मदेश्वर शिवलिंग"
क्योंकि एक मात्र इस ब्रह्माण्ड में माँ नर्मदे को ही वरदान मिला है शिव को जन्म देने का ..
और इसी कारण ही ज्ञानी जनों ने कहा है ..
"नर्मदा नदी के हर एक कंकर में शंकर विराजमान है" ..
यह वोही नर्मदा है जहाँ पर आदि गुर श्रील शंकराचार्य जी ने अपने गुरु भगवत्पाद स्वामी गोविन्द जी से दीक्षा ग्रहण किया था ..यह वोही नर्मदा है जहाँ पर शंकराचार्य जी का नाम उनके गुरु ने भगवत पूज्यपादाचार्य रखा ...
यह वोही नर्मदे है जहाँ ऋषि दुर्वासा ने ब्रह्म को जाना था ..
यह वोही नर्मदे है जहाँ मेरी माँ तारा और पिता देवाधिदेव महादेव विचरण व साधको का कल्याण हेतु सदा पधारते रहते है ...
यह वोही नार्मदेश्री है जहाँ से शंकराचार्य जी को "तत्व" का ज्ञान प्राप्त हुआ था ..
यही वोह नर्मदे है जहाँ समस्त अप्सरा ,योगिनी ,यक्षिणी , बेताल ,गंधर्व साधको का मनोरंजन हेतु सदा ही उपस्थित रहते है ..
यह वोही नर्मदे है जहाँ पारस पत्थर मिला था ..
यह वोही नर्मदे है जहाँ से द्रोणाचार्य जी को मणि प्राप्त हुआ था अपनी ताप की बल से ...
कितना लिखू मै माँ नर्मदे की गुण ?
बाकि आप खुद समझदार हो ..समझ जाओ बस ...
शंकराचार्य जी ने नर्मदेश्वर शिवलिंग पर शून्य साधना से शुरू कर समस्त शैव साधना सम्पन्न कर सिद्दी प्राप्त किया और इसी कारण अघोर मार्ग के कुछ लोग उनके विरोध पर भी उतर आये थे ..
समस्त साधू संत .. समस्त योनी नर्मदेश्वर पर ही अपनी अपनी साधना सम्पन्न करते है ..
मै स्वम् भी पारद की संस्कार जनता हूँ .. किन्तु मै जब मंडल अभिषेक करता हूँ तो नर्मदेश्वर पर ही करता हूँ .. क्योंकि मेरे द्वारा या किसी भी मनुष्य द्वरा बनाया गया प्राण प्रतिष्ठा किया गया शिवलिंग में कोई न कोई कमी ,त्रुटी अवस्य होगी ही ..किन्तु नर्मदेश्वर में कभी नहीं ..असंभव है यह ..बस यही कारण है ...
जरा देखिये तो सही नर्मदाष्टकम में कितनी ही खूबसूरती से इसका वर्णन किया है ..
अलक्ष लक्ष लक्ष पाप लक्ष सारसायुधं
ततस्तु जीव जंतु तंतु भुक्ति मुक्ति दायकं
विरंची शंकर विष्णु स्वकीयधामवर्मदे
तदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
अर्थात ....
ब्रह्मा विष्णु शंकर को निज निज पद व शक्ति देने वाली हे माँ नर्मदे !
अनगणित दृष्ट अदृष्ट पापो का लक्ष भेद करने में अमोघ शास्त्र के समान
और तुम्हारी तट पर बसने वाली छोटी बड़ी सभी जीवो को भोग व मोक्ष देने वाली हे नर्मदे तेरी पदपंकज को नमस्कार करता हूँ ...
यही तो है लिंग रहस्य .. यही तो है शिव तंत्र ..यही तो है स्व रचित आगम तंत्र ..
अगर आप को मेरी बाते समझ में आ गया हो तो आगे की विधान स्पष्ट कर रहा हूँ ...
नर्मदेश्वर लिंग को अपने पूजन स्थान में स्थापित कर उसका जल से अभिषेक करे व बिल्बपत्र श्वेतार्क के फुल अर्पित करे .. फिर लिंग पार पांच बिंदी लगाये मंत्र पढ़ते हुए एक एक कर ...(बिंदी आप किसी से भी लगा सकते हो )
1 ॐ सद्धोजातं प्रपद्धामी सद्धोजाताय वै नमो नमः भवे भवे नाती भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः
2 ॐ बाम देवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकर्णाय नमो बलविकर्णाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्व भूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ..
3 ॐ अघोरेभ्योथ घोरेभ्यो घोर घोर तरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्व सर्वेभ्यो नमस्तेअस्तु रुद्र रुपेभ्य
4 ॐ तत् पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात
5 ॐ ईशान सर्व विद्या नामिश्वर सर्व भूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोधिपतिर्ब्रहमा शिवो मे अस्तु सदा शिवोम
आप के जानकारी के लिए बता दू की यही पांच मंत्र शिव के पांचो मुखो के मंत्र है .. इन्ही पाचो मुखो से महादेव ने तंत्र का ज्ञान दिया है ...
इसके बाद आप .. रूद्र अभिषेक सम्पन्न करे फिर रुद्राष्टकम शिवमहिम्न स्तोत्र का पाठ करे ..
और पूर्ण भक्ति भाव से शिव जी के आरती सम्पन्न कर अपने साधना स्थल में लिंग की स्थापना कर दीजिये .. फिर देखिये कमाल ..
इसके बाद आप दुनिया की कोई भी साधना जो शिव लिंग पर सम्पन्न होता है इस सिद्ध लिंग पर करके पूर्ण लाभ प्राप्त कर सकते हो .. यह मेरा शिव संकल्प है .. मिथ्या नहीं हो सकता ..
विश्वास ही सब कुछ है .. क्योंकि यह विश्वास अँधा होता है .. किन्तु इसी अंध विश्वास द्वारा जो हमे अनुभूति होता है वोह शाश्वत सत्य होता है ...
जय माँ 
 जय गुरुदेव

श्री दुर्गा सप्तशती माहात्म्य

जय माँ
सनातन धर्म में मुख्यत: पांच उपास्य-देव माने गए हैं- सूर्य, गणेश, दुर्गा, शंकर और विष्णु, परंतु कलियुग में दुर्गा और गणेश का विशेष महत्व है, 'कलौ चण्डी विनायकै।' मां दुर्गा परमेश्वर की उन प्रधान शक्तियों में से एक हैं जिनको आवश्यकतानुसार उन्होंने समय-समय पर प्रकट किया है।
उसी दुर्गा शक्ति की उत्पत्ति तथा उनके ‍चरित्रों का वर्णन मार्कण्डेय पुराणांतर्गत देवी माहात्म्य में है। यह देवी माहात्म्य 700 श्लोकों में वर्णित है। यह माहात्म्य 'दुर्गा सप्तशती' के नाम से जाना जाता है।
दुर्गा शक्ति का रूप है -
या देवि सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।
दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं, जिसमें 700 श्लोकों में देवी-चरित्र का वर्णन है। मुख्य रूप से ये तीन चरित्र हैं, प्रथम चरित्र (प्रथम अध्याय), मध्यम चरित्र (2-4 अध्याय) और उत्तम ‍चरित्र (5-13 अध्याय)। प्रथम चरित्र की देवी महाकाली, मध्यम चरित्र की देवी महालक्ष्मी और उत्तम ‍चरित्र की देवी महासरस्वती मानी गई है। यहां दृष्टव्य है कि महाकाली की स्तुति मात्र एक अध्याय में, महालक्ष्मी की स्तुति तीन अध्यायों में और महासरस्वती की स्तुति नौ अध्यायों में वर्णित है, जो सरस्वती की वरिष्ठता, काली (शक्ति) और लक्ष्मी (धन) से अधिक सिद्ध करती है।
प्रथम चरित्र :-
बहुत पहले सुरथ नाम के राजा राज्य करते थे। शत्रुओं और दुष्ट मंत्रियों के कारण उनका राज्य, कोष सब कुछ हाथ से निकल गया। वह निराश होकर वन से चले गए, जहां समाधि नामक एक वैश्य से उनकी भेंट हुई। उनकी भेंट मेधा नामक ऋषि के आश्रम में हुई। इन दोनों व्यक्तियों ने ऋषि से पूछा कि यद्यपि हम दोनों के साथ अपने लोगों (पुत्र, मंत्रियों आदि) ने दुर्व्यवहार किया है फिर भी उनकी ओर हमारा मन लगा रहता है। मुनिवर, क्या कारण है कि ज्ञानी व्यक्तियों को भी मोह होता है।
ऋषि ने कहा कि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, भगवान विष्णु की योगनिद्रा ज्ञानी पुरुषों के चित्त को भी बलपूर्वक खींचकर मोहयुक्त कर देती है, वहीं भगवती भक्तों को वर देती है और 'परमा' अर्थात ब्रह्म ज्ञानस्वरूपा मुनि ने कहा, 'नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिद ततम्' अर्थात वह देवी नित्या है और उसी में सारा विश्व व्याप्त है।
प्रलय के पश्चात भगवान विष्णु योगनिद्रा में निमग्न थे तब उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो असुर उत्पन्न हुए। उन्होंने ब्रह्माजी को आहार बनाना चाहा। ब्रह्माजी उनसे बचने के लिए योगनिद्रा की स्तुति करने लगे। योगनिद्रा से मुक्त होकर भगवान विष्णु उठे और असुरों से युद्ध करने लगे। दोनों असुरों ने योगनिद्रा के कारण विमोहित होकर भगवान विष्णु से वर मांगने को कहा। अंत में उसी वरदान के कारण उन दोनों असुरों की मृत्यु हुई।
मध्यम चरित्र :-
FILE
इस चरित्र में मेधा नामक ऋषि ने राजा सुरथ और समाधि वैश्य के प्रति मोहजनित कामोपासना द्वारा अर्जित फलोपभोग के निराकरण के लिए निष्काम उपासना का उपदेश दिया है।
प्राचीनकाल में ‍महिषासुर सभी देवताओं को हराकर स्वयं इन्द्र बन गया और सभी देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। वे सभी देवता- ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के पास सहायतार्थ गए। उनकी करुण कहानी सुनकर विष्णु और शंकर के मुख से तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार का तेज अन्य देवताओं के शरीर से भी निकला। यह सब एक होकर देवी रूप में परिणित हुआ। इस देवी ने महिषासुर और उनकी सेना का नाश किया। देवताओं ने अपना अभीष्ट प्राप्त कर, देवी से वर मांगा।
' जब-जब हम लोगों पर विपत्तियां आएं, तब-तब आप हमें आपदाओं से विमुक्त करें और जो मनुष्य आपके इस चरित्र को प्रेमपूर्वक पढ़ें या सुनें वे संपूर्ण सुख और ऐश्वर्यों से संपन्न हों।'
उत्तम चरित्र :-
उत्तम चरित्र में परानिष्ठा ज्ञान के बाधक आत्म-मोहन, अहंकार आदि के निराकरण का वर्णन है। पूर्व काल में शुंभ और निशुंभ नामक दो असुर हुए। उन्होंने इन्द्र आदि देवताओं पर आधिपत्य कर लिया। बार-बार होते इस अत्याचार के निराकरण के लिए देवता दुर्गा देवी की प्रार्थना हिमालय पर्वत पर जाकर करने लगे।
देवी प्रकट हुई और उन्होंने देवताओं से उनकी प्रार्थना करने का कारण पूछा। कारण जानकर देवी ने परम सुंदरी 'अंबिका' रूप धारण किया। इस सुंदरी को शुंभ-निशुंभ के भृत्यों (चंड और मुंड) ने देखा। इन भृत्यों से शुंभ-निशुंभ को सुंदरी के बारे में जानकारी मिली और उन्होंने सुग्रीव नामक असुर को अंबिका को लाने के लिए भेजा। देवी ने सुग्रीव से कहा, 'जो व्यक्ति युद्ध में मुझ पर विजय प्राप्त करेगा, उसी से मैं विवाह करूंगी।'
दूत के द्वारा अपने स्वामी की शक्ति का बार-बार वर्णन करने पर देवी उस असुर के साथ नहीं गई। तब शुंभ-निशुंभ ने सुंदरी को बलपूर्वक खींचकर लाने के लिए धूम्रलोचन नामक असुर को आदेश दिया। धूम्रलोचन देवी के हुंकार मात्र से भस्म हो गया। फिर चंड-मुंड दोनों एक बड़ी सेना लेकर आए तो देवी ने असुर की सेना का विनाश किया और चंड-मुंड का शीश काट दिया, जिसके कारण देवी का नाम 'चामुंडा' पड़ा।
असुर सेना का विनाश करने के बाद देवी ने शुंभ-निशुंभ को संदेश भेजा कि वे देवताओं को उनके छीने अधिकार दे दें और पाताल में जाकर रहें, परंतु शुंभ-निशुंभ मारे गए। रक्तबीज की विशेषता थी कि उसके शरीर से रक्त की जितनी बूंदें पृथ्वी पर गिरती थीं, उतने ही रक्तबीज फिर से उत्पन्न हो जाते थे। देवी ने अपने मुख का विस्तार करके रक्तबीज के शरीर का रक्त को अपने मुख में ले लिया और असुर का सिर काट डाला। इसके पश्चात शुंभ और निशुंभ भी मारे गए। देवताओं ने स्तुति की-
सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरी विनाशम्।।
राजा सुरथ और समाधि वैश्य दोनों ने देवी की आराधना की। देवी की कृपा से सुरथ को उनका खोया राज्य और वैश्य का मनोरथ पूर्ण हुआ। उसी प्रकार जो व्यक्ति भगवती की आराधना करते हैं उनका मनोरथ पूर्ण होता है। ऐसी मान्यता है कि दुर्गा सप्तशती के केवल 100 बार पाठ करने से सर्वार्थ सिद्धि प्राप्त होती है।
जय माँ

मेरा विचार

जय माँ 
बहोत साधक शिद्धि के पीछे भाग ते हे उने मेरी ऐक सलाह हे की आप अपने गुरु मन्त्र के जितने बने उतने जप करते रहो अनेक प्रकार की शिद्धया शिद्ध होजाये गी आपको पता भी नहीं चलेगा और जबतक अपना पूर्व पाप कर्म क्षय नहीं होगा तबतक शिद्धि नहीं मिलिगि और दूसरी बात महाविद्या में शिद्धि प्राप्त करने के लिए योग्य गुरु या पर्व जन्म की साधना जरुरी हे।और साधना में सुरुवात में ग्रह समय मुर्हत देखना आवश्यक हे। 
जय माँ
श्री गुरुचरण कमलेभ्यो नमः

तंत्र योग है। सेक्स या शराब नही

तंत्र एक योग है- सेक्स या शराब नहीं
 
 
एक अरसे से तंत्र की बड़ी गलत व्याख्या की जा रही है, खास तौर से पश्चिमी देशों में, और इसे उन्मुक्त सेक्स के रूप में पेश किया जा रहा है। सद्‌गुरु स्पष्ट कर रहे हैं कि तंत्र वास्तव में क्या है और क्या नहीं। 

 सद्‌गुरु:
दुर्भाग्य से पश्चिमी देशों में तंत्र को इस प्रकार पेश किया जा रहा है कि इसका अर्थ उन्मुक्त सेक्स है। इसका बहुत गलत मतलब निकाला गया है। ऐसा इसलिए हुआ है, क्योंकि तंत्र के बारे में ज्यादातर पुस्तकें उन लोगों ने लिखी हैं, जिनका मकसद बस किताबें बेचना है। वे किसी भी अर्थ में तांत्रिक नहीं हैं। तंत्र का शाब्दिक अर्थ होता है तकनीक या टेक्नालाजी। यह इंसान की अंदरूनी टेक्नालाजी है। तंत्र की विधियां व्यक्तिपरक (सब्जेक्टीव) होती हैं, विषयपरक (ऑब्जेक्टीव) नहीं। लेकिन आज-कल समाज में यह समझा जा रहा है कि तंत्र शब्द का अर्थ है परंपरा के विरुद्ध या समाज को मंजूर ना होने वाली विधियां। मगर बात बस इतनी है कि तंत्र में कुछ खास पहलुओं का खास तरीकों से इस्तेमाल किया जाता है। यह योग से कतई अलग नहीं है।  दरअसल योग के एक छोटे-से अंग को तंत्र-योग कहा जाता है।

लोगों की यह सोच कि “मेरे लिए सेक्‍स जरूरी है, इसलिए मैं तांत्रिक रास्ता अपनाऊंगा”, बिलकुल बेवकूफी भरा है। ऐसा नहीं है कि तंत्र में आगे बढ़ने के लिए लोग सिर्फ सेक्स का उपयोग करते हैं। 
लोगों की यह सोच कि “मेरे लिए सेक्‍स जरूरी है, इसलिए मैं तांत्रिक रास्ता अपनाऊंगा”, बिलकुल बेवकूफी भरा है। ऐसा नहीं है कि तंत्र में आगे बढ़ने के लिए लोग सिर्फ सेक्स का उपयोग करते हैं। वे आगे बढ़ने के लिए हर पहलू का उपयोग करते हैं। दुर्भाग्य से कुछ लोग ऐसे हैं, जो इस रास्ते की ओर गलत मकसद से आकर्षित होते हैं। वे इस रास्ते पर इसलिए आते हैं, क्योंकि वे अपनी सेक्स की भूख को आध्यात्मिक जामा पहनाना चाहते हैं। आप अघ्‍यात्‍म के नाम पर खुद के साथ ऐसी बेहूदी चीजें क्‍यों कर रहे हैं? अपनी बायोलाजी को बायोलाजी की तरह ही लें, उसको दूसरा नाम देने की जरूरत नहीं!

तंत्र-योग का सरल सिद्धांत यह है कि जो कुछ आपको नीचे गिरा सकता है, वह आपको ऊपर भी उठा सकता है। कोई इंसान आम तौर पर जिन कारणों से अपनी जिंदगी में डूबा रहता है, वह है- भोजन, शराब और सेक्स। तंत्र-योग इंसान को ऊपर उठाने के लिए इन्हीं तीन साधनों का उपयोग करता है। लेकिन एक बार कुछ विशेष पदार्थों का सेवन शुरू कर लेने के बाद लोगों को एक विशेष अवस्था में होना होता है, वरना इनकी लत लगते देर नहीं लगती। इसके लिए कड़ा अनुशासन चाहिए, इतना कड़ा अनुशासन कि ज्यादातर लोगों के लिए इसकी कोशिश करना तक मुमकिन नहीं होता। लोग जब ऐसा रास्ता अपनाते हैं, तो अपनाने वाले 100 में से 99 लोग पियक्कड़ बन जाते हैं।

बहरहाल, इसको लेफ्ट-हैंड तंत्र कहा जाता है, जोकि एक अपरिपक्व टेक्नालाजी है जिसमें अनेक कर्मकांड होते हैं। एक राइट-हैंड तंत्र भी होता है, जो अत्यंत परिष्कृत टेक्नालाजी है। इन दोनों की प्रकृति बिलकुल अलग है। राइट-हैंड तंत्र ज्यादा आंतरिक और ऊर्जा आधरित होता है, यह पूरी तरह से आपके बारे में है। इससे कोई विधि या बाहरी काम नहीं जुड़ा होता। क्या यह तंत्र है? एक तरह से है, लेकिन योग शब्द में ये सब एक साथ शामिल हैं। जब हम योग कहते हैं, तो किसी भी संभावना को नहीं छोड़ते – इसके अंदर सब कुछ है। बस इतना है कि कुछ विकृत लोगों ने एक खास तरह का तंत्र अपनाया है, जो विशुद्ध रूप से लेफ्ट-हैंड तंत्र है और जिसमें शरीर का एक विशेष उपयोग होता है। उन्होंने बस इस हिस्से को ले कर उसे बढ़ा-चढ़ा दिया और उसमें तरह-तरह की अजीबोगरीब सेक्स क्रियाएं जोड़ कर किताबें लिख डालीं और कहा, “यही तंत्र है।” नहीं, यह तंत्र नहीं है।

 तो तंत्र कोई उटपटांग अजूबा नहीं है। तंत्र एक खास तरह की काबिलियत है। उसके बिना कोई संभावना नहीं हो सकती।
तंत्र का मतलब होता है कि आप कामों को अंजाम देने के लिए अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर आप अपने दिमाग को इतना धारदार बना लें कि वह हर चीज को आरपार देख-समझ सके, तो यह भी एक प्रकार का तंत्र है। अगर आप सबसे प्रेम करने योग्य बनने की खातिर अपनी ऊर्जा को अपने दिल पर असर करने दें और आपमें इतना प्यार उमड़ सके कि आप हर किसी को उसमें सराबोर कर दें, तो वह भी तंत्र है। अगर आप अपने भौतिक शरीर को कमाल के करतब करने की खातिर तीव्र शक्तिशाली बना लें, तो यह भी तंत्र है। या अगर आप अपनी ऊर्जा को इस काबिल बना लें कि शरीर, मन या भावना का उपयोग किए बिना ये खुद काम कर सके, तो यह भी तंत्र है।

तो तंत्र कोई उटपटांग अजूबा नहीं है। तंत्र एक खास तरह की काबिलियत है। उसके बिना कोई संभावना नहीं हो सकती। इसलिए सवाल यह है कि आपका तंत्र कितना परिष्कृत है? अगर आप अपनी ऊर्जा को आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो आपको या तो दस हजार कर्मकांड करने पड़ेंगे या आप यहीं बैठे ऐसा कर सकते हैं। सबसे बड़ा अंतर यही है। सवाल सिर्फ हल्की या ऊंची टेक्नालॉजी का है, लेकिन तंत्र वह विज्ञान है, जिसके बिना कोई आध्यात्मिक प्रक्रिया नहीं हो सकती ।
।। जयति ब्रम्हास्त्रविद्या ।।

गुरु वचन

गुरुवाणी
" साधना के प्रमुख अंग "

1 सद्गुरु 
2 एकाग्र मन
3 शांतमन 
4 एकांत
5 शुद्धचित्त 
6 अभयबुद्धि 
7 चैतन्यमंत्र
8 लघुआहार
9 जितेन्द्रियता
10 शुचिता 
11 अलोभ
12 सत्यभाषण

समर्पण के साथ ईष्ट देव के समर्पणभाव ।।

गुरु वचन

गुरुवाणी
" साधना के प्रमुख अंग "

1 सद्गुरु 
2 एकाग्र मन
3 शांतमन 
4 एकांत
5 शुद्धचित्त 
6 अभयबुद्धि 
7 चैतन्यमंत्र
8 लघुआहार
9 जितेन्द्रियता
10 शुचिता 
11 अलोभ
12 सत्यभाषण

समर्पण के साथ ईष्ट देव के समर्पणभाव ।।

यज्ञादि कर्मों में अग्नि के नाम एवं वेदों में अग्नि की महत्ता

अग्नि की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पौराणिक गाथा इस प्रकार है-सर्वप्रथम धर्म की वसु नामक पत्नी से अग्नि उत्पन्न हुआ। उसकी पत्नी स्वाहा से उसके तीन पुत्र हुए-

पावक

पवमान

शुचि


छठे मन्वन्तर में वसु की वसुधारा नामक पत्नी से द्रविणक आदि पुत्र हुए, जिनमें 45 अग्नि-संतान उत्पन्न हुए। इस प्रकार सब मिलाकर 49 अग्नि हैं। विभिन्न कर्मों में अग्नि के भिन्न-भिन्न नाम हैं। लौकिक कर्म में अग्नि का प्रथम नाम पावक है। गृहप्रवेश आदि में निम्नांकित अन्य नाम प्रसिद्ध हैं-

अग्नेस्तु मारुतो नाम गर्भाधाने विधीयते।
पुंसवने चन्द्रनामा शुगांकर्मणि शोभन:।।
सीमन्ते मंगलो नाम प्रगल्भो जातकर्मणि।
नाग्नि स्यात्पार्थिवी ह्यग्नि: प्राशने च शुचिस्तथा।।
सत्यनामाथ चूडायां व्रतादेशे समुद्भव:।
गोदाने सूर्यनामा च केशान्ते ह्यग्निरुच्यते।।
वैश्वानरो विसर्गे तु विवाहे योजक: स्मृत:।
चतुर्थ्यान्तु शिखी नाम धृतिरग्निस्तथा परे।।
प्रायश्चित्ते विधुश्चैव पाकयज्ञे तु साहस:।
लक्षहोमे तु वह्नि:स्यात कोटिहोमे हुताश्न:।।
पूर्णाहुत्यां मृडो नाम शान्तिके वरदस्तथा।
पौष्टिके बलदश्चैव क्रोधाग्निश्चाभिचारिके।।
वश्यर्थे शमनी नाम वरदानेऽभिदूषक:।
कोष्ठे तु जठरी नाम क्रव्यादो मृतभक्षणे।।

अर्थात

गर्भाधान में अग्नि को "मारुत" कहते हैं। पुंसवन में "चन्द्रमा
शुगांकर्म में "शोभन
सीमान्त में "मंगल
जातकर्म में 'प्रगल्भ
नामकरण में "पार्थिव
अन्नप्राशन में 'शुचि
चूड़ाकर्म में "सत्य
व्रतबन्ध (उपनयन) में "समुद्भव
गोदान में "सूर्य
केशान्त (समावर्तन) में "अग्नि
विसर्ग (अर्थात् अग्निहोत्रादिक्रियाकलाप) में "वैश्वानर
विवाह में "योजक
चतुर्थी में "शिखी
धृति में "अग्नि
प्रायश्चित (अर्थात् प्रायश्चित्तात्मक महाव्याहृतिहोम) में "विधु
पाकयज्ञ (अर्थात् पाकांग होम, वृषोत्सर्ग, गृहप्रतिष्ठा आदि में) 'साहस
लक्षहोम में "वह्नि
कोटि होम में "हुताशन
पूर्णाहुति में "मृड
शान्ति में "वरद
पौष्टिक में "बलद
आभिचारिक में "क्रोधाग्नि
वशीकरण में "शमन
वरदान में "अभिदूषक
कोष्ठ में "जठर
और मृत भक्षण में "क्रव्याद" कहा गया है।

ऋग्वेद के अनुसार

हिन्दू देवमण्डल का प्राचीनतम सदस्य, वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। अग्नि के तीन स्थान और तीन मुख्य रूप हैं-

व्योम से सूर्य
अन्तरिक्ष (मध्याकाश) में विद्युत
पृथ्वी पर साधारण अग्नि

अग्नि की तुलना बृहस्पति और ब्रह्मणस्पति से भी की गई है। वह मंत्र, धी (बुद्धि) और ब्रह्म का उत्पादक है। इस प्रकार का अभेद सूक्ष्मतम तत्त्व से दर्शाया गया है। वैदिक साहित्य में अग्नि के जिस रूप का वर्णन है, उससे विश्व के वैज्ञानिक और दार्शनिक तत्त्वों पर काफ़ी प्रकाश पड़ता है। जैमिनी ने मीमांसासूत्र के "हवि:प्रक्षेपणाधिकरण" में अग्नि के छ: प्रकार बताये हैं-

गार्हपत्य
आहवनीय
दक्षिणाग्नि
सभ्य
आवसथ्य
औपासन

'अग्नि शब्द का व्युत्पत्त्यर्थ इस प्रकार है : जो ऊपर की ओर जाता है'(अगि गतौ, अंगेनलोपश्च, अंग्+नि और नकार का लोप)।

वैदिक धर्म के अनुसार

अवेस्ता में अग्नि को पाँच प्रकार का माना गया है। परन्तु अग्नि की जितनी उदात्त तथा विशद कल्पना वैदिक धर्म में है, उतनी अन्यंत्र कहीं पर भी नहीं है। वैदिक कर्मकाण्ड का श्रौत भाग और गृह्य का मुख्य केन्द्र अग्निपूजन ही है। वैदिक देवमण्डल में इन्द्र के अनन्तर अग्नि का ही दूसरा स्थान है। जिसकी स्तुति लगभग दो सौ सूक्तों में वर्णित है। अग्नि के वर्णन में उसका पार्थिव रूप ज्वाला, प्रकाश आदि वैदिक ऋषियों के सामने सदा विद्यमान रहता है। अग्नि की तुलना अनेक पशुओं से की गई है। प्रज्वलित अग्नि गर्जनशील वृषभ के समान है। उसकी ज्वाला सौर किरणों के तुल्य, उषा की प्रभा तथा विद्युत की चमक के समान है। उसकी आवाज़ आकाश की गर्जन जैसी गम्भीर है। अग्नि के लिए विशेष गुणों को लक्ष्य कर अनेक अभिधान प्रयुक्त करके किए जाते हैं। अग्नि शब्द का सम्बन्ध लातोनी 'इग्निस्' और लिथुएनियाई 'उग्निस्' के साथ कुछ अनिश्चित सा है, यद्यपि प्रेरणार्थक अज् धातु के साथ भाषा शास्त्रीय दृष्टि से असम्भव नहीं है। प्रज्वलित होने पर धूमशिखा के निकलने के कारण धूमकेतु इस विशिष्टिता का द्योतक एक प्रख्यात अभिधान है। अग्नि का ज्ञान सर्वव्यापी है और वह उत्पन्न होने वाले समस्त प्राणियों को जानता है। इसलिए वह 'जातवेदा:' के नाम से विख्यात है। अग्नि कभी द्यावापृथिवी का पुत्र और कभी द्यौ: का सूनु (पुत्र) कहा गया है। उसके तीन जन्मों का वर्णन वेदों में मिलता है। जिनके स्थान हैं-स्वर्ग, पृथ्वी तथा जल। स्वर्ग, वायु तथा पृथ्वी अग्नि के तीन सिर, तीन जीभ तथा तीन स्थानों का बहुत निर्देश वेद में उपलब्ध होता है। अग्नि के दो जन्मों का भी उल्लेख मिलता है-भूमि तथा स्वर्ग। अग्नि के आनयन की एक प्रख्यात वैदिक कथा ग्रीक कहानी से साम्य रखती है। अग्नि का जन्म स्वर्ग में ही मुख्यत: हुआ, जहाँ से मातरिश्वा ने मनुष्यों के कल्याणार्थ उसका इस भूतल पर आनयन किया। अग्नि प्रसंगत: अन्य समस्त वैदिक देवों में प्रमुख माना गया है। अग्नि का पूजन भारतीय संस्कृति का प्रमुख चिह्न है और वह गृहदेवता के रूप में उपासना और पूजा का एक प्रधान विषय है। इसलिए अग्नि 'गृहा', 'गृहपति' (घर का स्वामी) तथा 'विश्वपति' (जन का रक्षक) कहलाता है।

रूप का वर्णन

अग्नि के रूप का वर्णन इस प्रकार है-

पिंगभ्रूश्मश्रुकेशाक्ष: पीनांगजठरोऽरुण:।
छागस्थ: साक्षसूत्रोऽग्नि: सप्तार्चि: शक्तिधारक:।।

भौहें, दाढ़ी, केश और आँखें पीली हैं। अंग स्थूल हैं और उदर लाल है। बकरे पर आरूढ़ हैं, अक्षमाला लिये है। इसकी सात ज्वालाएँ हैं और शक्ति को धारण करता है।

शुभ लक्षण

होम योग्य अग्नि के शुभ लक्षण निम्नांकित हैं-
अर्चिष्मान् पिण्डितशिख: सर्पि:काञ्चनसन्निभ:।
स्निग्ध: प्रदक्षिणश्चैव वह्नि: स्यात् कार्यसिद्धये।।

ज्वालायुक्त, पिण्डितशिख, घी एवं सुवर्ण के समान, चिकना और दाहिनी ओर गतिशील अग्नि सिद्धिदायक होता है।

शब्द उत्पादन

देहजन्य अग्नि में शब्द उत्पादन की शक्ति होती है, जैसा कि "संगीतदर्पण" में कहा है-

आत्मना प्रेरितं चित्तं वह्निमाहन्ति देहजम्।
ब्रह्मग्रन्थिस्थितं प्राणं स प्रेरयति पावक:।।
पावकप्रेरित: सोऽथ क्रमदूर्ध्वपथे चरन्।
अतिसूक्ष्मध्वनि नाभौ हृदि सूक्ष्मं गले पुन:।।
पुष्टं शीर्षे त्वपुष्टञ्च कृत्रिमं वदने तथा।
आविर्भावयतीत्येवं पञ्चधा कीर्त्यते बुधै:।।
नकारं प्राणनामानं दकारमनलं विंदु:।
जात: प्राणाग्निसंयोगात्तेन नादोऽभिधीयते।।

आत्मा के द्वारा प्रेरित चित्त देह में उत्पन्न अग्नि को आहत करता है। ब्रह्मग्रन्थि में स्थित प्रेरित वह प्राण क्रम से ऊपर चलता हुआ नाभि में अत्यन्त सूक्ष्म ध्वनि करता है तथा गले और हृदय में भी सूक्ष्म ध्वनि करता है। सिर में पुष्ट और अपुष्ट तथा मुख में कृत्रिम प्रकाश करता है। विद्वानों ने पाँच प्रकार का अग्नि बताया है। नकार प्राण का नाम है, दकार अग्नि का नाम है। प्राण और अग्नि के संयोग से नाद की उत्पत्ति होती है। सब देवताओं में इसका प्रथम आराध्यत्व ऋग्वेद के सर्वप्रथम मंत्र "अग्निमीले पुरोहितम्" से प्रकट होता है।

विष्णु कौन है?

इस चित्रण में विष्णु को एक इंसान के रूप बनाया गया था, या भारतीय प्राचीन ऋषियों द्वारा मानव जाति के लिए इस परम निरपेक्ष चेतना को समझने के लिए यह चित्र नियोजित किया गया था, । हम इस चित्रण के प्रत्येक पहलू का विश्लेषण करते हैं:

  1. विष्णु लीलाधर हैं - सत् (विष्णु -परम निरपेक्ष चेतना) स्वयं को चित् (शिव - कूटस्थ चेतना ) और आनंद (ब्रम्हा - ब्रम्ह चेतना) में विभाजित करता है, अतः विष्णु और शिव दोनो ही पारब्रम्ह हैं, परन्तु अन्तर इतना ही है कि वह सत् जो ब्रम्ह (ॐ) में निहित होते हुए भी असलंग्न है कूटस्थ कहलाता है और जो ब्रम्ह की परिधि में नही है, परम कहलाता है। सच तो यह है कि सर्वस्व भेदरहित चैतन्य है। सत् ही लीला का जनक है इसलिए पुराणों में विष्णु को लीलाधर का नाम भी मिला है।
  2. विष्णु के दो हाथ आगे एवं दो पीछे - अर्थात परम चेतना द्वारा सम्पन्न द्वंदरूपी कार्य (सृष्टि) प्राकट्य (सामने) और अप्राकट्य (पीछे) भी हैं। यानि अपरा एवं परा प्रकृति।
  3. विष्णु – अर्थात सर्वव्यापी।
  4. विष्णु का नीला वर्ण - अर्थात ब्रम्ह तत्व को धारण करना। इसलिए सनातन धर्म में भगवान का वर्ण नीला या श्यामल दिखाते हैं। नीले, स्याही और बैंगनी रंग की आवृत्तियां इद्रंधनुष में सूक्ष्मतर होती हैं। अतः इनको देवत्व दर्शाने में प्रयोग करते हैं। जीव के भ्रूमध्य में जब नीली ज्योति का दर्शन होने लगता है तो वह सच्चिदानंद के द्वार पर पहुँच जाता है यानि आनंदमय स्वरूप को प्राप्त होता है।
  5. विष्णु का हाथ के सहारे नेत्र मूंदे लेटना - अर्थात परमेश्वर की चेतना ही लीला रचती है। वह चेतना कभी सोती नही है अपितु सदैव जागरुक रहती है।. समस्त दृश्रयम् और अदृश्रयम्, परम निराकार चेतना की ही अभिव्यक्ति है, जो हर साकार रुपी सक्षम अणु में व्याप्त है।
  6. विष्णु का अनन्त या शेषनाग की कुडंलिनी पर लेटना - अर्थात परमेश्वर की चेतना में निहित माया ही अनन्त लीला है एवं उसके ऊपर ही चेतना का वास है। उस परम निराकार चेतना की सृष्टिकल्प-अभिव्यक्ति के अंत में, शेष रहती है मात्र सुप्तावस्थित मायाशक्ति, जो भावी सृष्टिकल्प के प्रतिपादन हेतु, अभिन्न चेतनारूपी कुंडलित स्थितज शक्ति होती है।
  7. शेषनाग का सहस्त्रमुखी फन विष्णु के ऊपर - सृष्टिकल्प के आरम्भ में सहस्त्रमुखी (अनंतरूपी) माया पुनः चैतन्यावस्था में आकर विष्णु का आवरण बन जाती है।
  8. विष्णु का वाहन गरुड़ पक्षी - गरुड़ सर्पों (माया के अनन्तरूप) का विनाशक एवं पक्षीराज माना जाता है। परम निराकार चेतना गरुड़ पर विराजमान होती है, अर्थात जो व्यक्ति मायाजनित अज्ञान का नाश कर, उसके ऊपर ऊँची स्थायी उड़ान भरना सीख जाता है, परम चेतना उसपर सवार रहती है।
  9. विष्णु अर्धनारीश्वर नही हैं - अर्थात परम निरपेक्ष चेतना का अविभाजित सत् एवं अव्यक्त मूर्तरूप।
  10. विष्णु के अवतार होना - अर्थात परम निरपेक्ष और निराकार चेतना साकार रूप में अवतरित होती है। वह परमेश्वर दोनों, निराकार और साकार है।
  11. विष्णु की पत्नी लक्ष्मी - अर्थात चैतन्यता का “स्थिर भाव” जो सृष्टि का पालनकर्ता है और सृष्टि का यथोचित् “पालना” है।
  12. विष्णु का क्षीरसागर के मध्य वैकुंठ में वास करना - परम चेतना से उद्भूत होती है माया और उससे उद्भूत होता है परम ज्योतिर्मय सागर या एैसा समझे कि ज्योतिर्मय सागर ही माया का मूलतः आधार है; प्रकाश ही हर पदार्थ का मूल है।, जिस पर माया प्रकट होती है; और परम एकल चेतना सबके मध्य में, यानि सबकी जनक है। वैकुंठ यानि मन, बुद्धि और अहम् के परे, अचिन्त्य “विषय-विकार रहित” अवस्था।
  13. विष्णु के पीछे वाले हाथों में पंचजन्य शंख और सुदर्शन चक्र - अर्थात पंचप्राण,पंचतन्मंत्र एवं पंचमहाभूत और सुदर्शन चक्र अर्थात सृष्टिचक्र का आनंद स्वरूप। विष्णु के आगे वाले हाथों में गदा और कमल - अर्थात शक्ति और नित्यशुद्ध-आत्मा।
  14. विष्णु के दो कर्णफूल - द्वंद से ही चेतना की प्रकृति सुशोभित है।
  15. विष्णु के गले में बनफूलों की माला और कौस्तुभ - प्रकृति ही चेतना को सुशोभित करती है एवं कौस्तुभ यानि हमारी हर शुद्ध इच्छा परम चेतना के हृदय में वास करती है और उसका पूर्ण होना सुनिश्चित है।
  16. विष्णु के सतांन नही - अर्थात चित् और आनंद, सत् से उत्पन्न नही होते हैं, अपितु सत् के विभाज्य स्वरूप हैं।

ॐ जय जगदीश

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